सालासर बालाजी के दर्शन को आने वाले बहुत से श्रद्धालु इसी यात्रा में शेखावटी और आसपास के दूसरे धामों के दर्शन भी करते हैं। माता अंजनी का मंदिर सालासर के पास ही है, और बाकी धाम सड़क मार्ग से जुड़े हैं। यात्रा से पहले रास्ता और दूरी देख लें।
जयपुर-बीकानेर राजमार्ग पर बसे सालासर में हनुमान जी ‘सालासर बालाजी’ के रूप में विराजते हैं, जहाँ उनके दर्शन दाढ़ी-मूँछ वाले रूप में होते हैं। कथा है कि प्रतिमा असोटा गाँव में खेत जोतते समय निकली और भक्त मोहनदास जी को मिले स्वप्न-संकेत के बाद सालासर लाई गई।
विशेष पर्व
चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती) और आश्विन पूर्णिमा पर बड़े मेले भरते हैं; मंगलवार और शनिवार को विशेष भीड़।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुहावना रहता है; गर्मियों में दोपहर की धूप बहुत तेज़ होती है।
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन सुजानगढ़ (लगभग 27 किमी), लक्ष्मणगढ़ (लगभग 31 किमी)। नज़दीकी हवाई अड्डा जयपुर (लगभग 180 किमी)।
सालासर-लक्ष्मणगढ़ मार्ग, सालासर, ज़िला चूरू, राजस्थान
सालासर धाम से लक्ष्मणगढ़ की ओर लगभग 2 किमी पर हनुमान जी की माता अंजनी का मंदिर है, जहाँ चतुर्भुज माता अंजनी की गोद में बाल हनुमान विराजमान हैं। बहुत से श्रद्धालु बालाजी के साथ माता अंजनी के दर्शन भी करते हैं। सुहागिनें सुखी दांपत्य की कामना से यहाँ पूजा करती हैं।
विशेष पर्व
हनुमान जयंती मुख्य पर्व है; सुहागिनें नारियल और सुहाग की सामग्री चढ़ाती हैं।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुहावना रहता है।
कैसे पहुँचें
सालासर से लगभग 2 किमी (लक्ष्मणगढ़ मार्ग पर)। नज़दीकी रेलवे स्टेशन सुजानगढ़, हवाई अड्डा जयपुर।
खाटू में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की ‘श्याम’ रूप में पूजा होती है। कथा है कि बर्बरीक ने श्रीकृष्ण के माँगने पर अपना शीश दान किया, और कृष्ण ने उन्हें कलियुग में श्याम नाम से पूजे जाने का वरदान दिया। मान्यता है कि उनका शीश श्याम कुंड से प्रकट हुआ।
विशेष पर्व
फाल्गुन मास में विशाल लक्खी मेला भरता है; बहुत से भक्त रींगस से निशान लेकर पैदल आते हैं।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुहावना रहता है; फाल्गुन मेले में बहुत भारी भीड़ होती है।
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन रींगस जंक्शन (लगभग 17 किमी)। हवाई अड्डा जयपुर (लगभग 90 किमी)।
ध्यान दें: फाल्गुन मेले में लंबी कतारें लगती हैं और काफ़ी पैदल चलना पड़ता है।
जीणमाता गाँव, अरावली की पहाड़ियाँ, ज़िला सीकर, राजस्थान
सीकर से लगभग 29 किमी दक्षिण में अरावली की पहाड़ियों पर जीण माता का प्राचीन मंदिर है; इन्हें शक्ति का रूप माना जाता है। लोककथा है कि जीण अपने भाई हर्ष से रूठकर काजल शिखर पर तप करने लगीं, और हर्ष ने पास के पर्वत पर भैरव की तपस्या की।
विशेष पर्व
चैत्र और आश्विन के नवरात्र में सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं।
कब जाएँ
नवरात्र के समय, या अक्टूबर से मार्च।
कैसे पहुँचें
सीकर से लगभग 29 किमी, जयपुर से लगभग 108 किमी। नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन सीकर, हवाई अड्डा जयपुर।
उदयपुरवाटी के पास अरावली की घाटी में सकराय गाँव में शाकम्भरी माता का प्राचीन मंदिर है, जिसे सकराय माता भी कहते हैं। गर्भगृह में ब्रह्माणी और रुद्राणी की आठ भुजाओं वाली जुड़वाँ प्रतिमाएँ हैं, जिनमें देवी सिंह पर सवार होकर महिषासुर का वध करती दिखाई गई हैं।
विशेष पर्व
दोनों नवरात्रों में विशेष भीड़ रहती है; भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को मेला भरता है।
कब जाएँ
नवरात्र के समय, या अक्टूबर से मार्च।
कैसे पहुँचें
उदयपुरवाटी के पास। नज़दीकी रेलवे स्टेशन सीकर या झुंझुनूं, हवाई अड्डा जयपुर।
मान्यताओं में अंतर: जयपुर ज़िले में सांभर झील के पास शाकम्भरी माता का एक अलग प्राचीन मंदिर है; दोनों अलग स्थान हैं।
सीकर के पास अरावली के हर्ष पर्वत पर भगवान शिव के ‘हर्षनाथ’ रूप का 10वीं सदी का मंदिर है, जिसका शिलालेख 973 ई. का है। पुराना मंदिर अब खंडहर है और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) का संरक्षित स्मारक है। उसके पास 1718 में बना शिव मंदिर है, जहाँ आज भी पूजा होती है।
विशेष पर्व
पर्वत पर हर्ष भैरव का स्थान भी है, जहाँ भक्त दर्शन करते हैं।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; गर्मियों में पहाड़ी पर धूप बहुत तेज़ होती है।
कैसे पहुँचें
सीकर से लगभग 14 किमी, पहाड़ी की चोटी पर। नज़दीकी रेलवे स्टेशन सीकर, हवाई अड्डा जयपुर।
ध्यान दें: पुराना मंदिर संरक्षित स्मारक है; अवशेषों और मूर्तियों को नुकसान न पहुँचाएँ।
लोहार्गल, उदयपुरवाटी के पास, ज़िला झुंझुनूं, राजस्थान
अरावली की घाटी में बसे लोहार्गल का अर्थ है ‘जहाँ लोहा गल जाए’। कथा है कि महाभारत युद्ध के बाद पांडवों ने यहाँ सूर्य कुंड में स्नान किया और उनके अस्त्र-शस्त्र गल गए। कुंड के सामने प्राचीन सूर्य मंदिर है, और पास की पहाड़ी पर मालकेतु जी का मंदिर है।
विशेष पर्व
भाद्रपद में जन्माष्टमी से अमावस्या तक 24 कोस की मालकेतु परिक्रमा होती है; अमावस्या पर सूर्य कुंड में स्नान।
कब जाएँ
भाद्रपद की परिक्रमा के समय, या अक्टूबर से मार्च। वर्षा में यहाँ झरना बहता है।
कैसे पहुँचें
उदयपुरवाटी से लगभग 10 किमी, नवलगढ़ से लगभग 30 किमी, झुंझुनूं से लगभग 70 किमी। हवाई अड्डा जयपुर।
ध्यान दें: मालकेतु जी के मंदिर तक लगभग 400 सीढ़ियाँ हैं; परिक्रमा पहाड़ी रास्तों पर पैदल होती है।
झुंझुनूं शहर के इस मंदिर में नारायणी देवी की ‘रानी सती दादी’ के नाम से पूजा होती है। मारवाड़ी परिवारों में इनकी विशेष मान्यता है, और अनेक परिवार इन्हें कुलदेवी मानते हैं। सफ़ेद संगमरमर से बने मंदिर में देवी का प्रतीक त्रिशूल पूजा जाता है; परिसर में हनुमान, गणेश, शिव और ठाकुर जी के मंदिर भी हैं।
विशेष पर्व
भाद्रपद अमावस्या को मंदिर में विशेष पूजन होता है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुहावना रहता है।
कैसे पहुँचें
झुंझुनूं शहर में; नज़दीकी रेलवे स्टेशन झुंझुनूं। हवाई अड्डा जयपुर (झुंझुनूं से लगभग 190 किमी)।
ध्यान दें: भारत में सती प्रथा और उसका महिमामंडन कानून द्वारा प्रतिबंधित है।