55 मंत्र, अर्थ के साथ, और डिजिटल माला
महामंत्र, देवी-देवताओं के मंत्र, सुबह से रात तक के दैनिक मंत्र, कामना अनुसार मंत्र और शांति पाठ। हर मंत्र संस्कृत में, सरल हिंदी अर्थ के साथ। फ़ोन पर ही जप गिनने के लिए डिजिटल माला।
जप गिनिए, मन मंत्र पर रखिए
मंत्र चुनिए और हर जप पर बड़ा बटन दबाइए। 108 पूरे होते ही एक माला गिन ली जाएगी। गिनती इसी फ़ोन में सहेजी रहती है।
ॐ हं हनुमते नमः
मंत्रों की श्रेणियाँ
महामंत्र
ये वे मंत्र हैं जिन्हें सदियों से हर घर में जपा जाता रहा है — छोटे, सरल और बहुत गहरे। इनमें से कोई एक मंत्र चुनकर रोज़ 1 माला का नियम बना लें; यही साधना की सबसे सुंदर शुरुआत है।
मंत्र देखेंदेवी-देवताओं के मंत्र
हर देवी-देवता के लिए परंपरा में कुछ प्रिय श्लोक और मंत्र हैं, जो उनके रूप और गुणों का ध्यान कराते हैं। पूजा या आरती से पहले इनका पाठ करने से मन उसी देव में टिकता है। जो श्लोक सबसे अच्छा लगे, उसे याद कर लें — वही आपकी रोज़ की प्रार्थना बन जाएगा।
मंत्र देखेंदैनिक जीवन के मंत्र
हमारी परंपरा में दिन का हर काम — जागना, नहाना, खाना, पढ़ना, सोना — एक छोटे-से मंत्र से जुड़ा है। ये मंत्र याद दिलाते हैं कि साधारण दिन भी पूजा बन सकता है। इन्हें दिन के क्रम में दिया गया है; बच्चों को ये मंत्र ज़रूर सिखाएँ।
मंत्र देखेंकामना अनुसार मंत्र
मन में कोई कामना हो, तो उसके भाव के अनुसार मंत्र चुनें। पर याद रखें — मंत्र मन को शक्ति, भरोसा और धैर्य देता है; कामना पूरी करने के लिए प्रयास, सही इलाज और समय भी चाहिए। हर मंत्र के साथ लिखी सलाह ज़रूर पढ़ें।
मंत्र देखेंशांति पाठ
शांति पाठ वेदों और उपनिषदों के वे मंत्र हैं जो पूजा, पढ़ाई या किसी शुभ काम की शुरुआत और अंत में बोले जाते हैं। इनमें केवल अपने लिए नहीं, पूरी सृष्टि के लिए शांति माँगी गई है। अंत में तीन बार ‘शान्तिः’ बोलने का भाव है — अपने मन-शरीर के, दूसरे प्राणियों से आने वाले, और प्रकृति के — तीनों तरह के कष्टों की शांति।
मंत्र देखेंनवग्रह बीज मंत्र
| ग्रह | बीज मंत्र | वार | |
|---|---|---|---|
| सूर्य | ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः | रविवार | माला से जपें |
| चंद्र | ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः | सोमवार | माला से जपें |
| मंगल | ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः | मंगलवार | माला से जपें |
| बुध | ॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः | बुधवार | माला से जपें |
| गुरु (बृहस्पति) | ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः | गुरुवार (बृहस्पतिवार) | माला से जपें |
| शुक्र | ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः | शुक्रवार | माला से जपें |
| शनि | ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः | शनिवार | माला से जपें |
| राहु | ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः | शनिवार (मान्यता अनुसार) | माला से जपें |
| केतु | ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः | शनिवार (कई परंपराओं में मंगलवार भी) | माला से जपें |
जप की विधि
जप का अर्थ है किसी मंत्र या भगवान के नाम को बार-बार, ध्यान से दोहराना। जैसे पानी की बूँदें धीरे-धीरे पत्थर पर भी निशान बना देती हैं, वैसे ही रोज़ का थोड़ा-सा जप मन को शांत, स्थिर और मज़बूत बनाता है। जप के लिए बड़ी विद्या या बड़ा ख़र्च नहीं चाहिए — श्रद्धा, नियम और रोज़ के कुछ मिनट चाहिए।
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥
श्रीमद्भगवद्गीता 10.25
अर्थ:भगवान श्री कृष्ण कहते हैं — महर्षियों में मैं भृगु हूँ, वाणी में एक अक्षर ‘ॐ’ हूँ, सब यज्ञों में जप-यज्ञ मैं हूँ, और न हिलने वाली चीज़ों में हिमालय हूँ। यानी भगवान ने जप को सब यज्ञों में अपना स्वरूप बताया है — और यह यज्ञ हर कोई, हर घर में कर सकता है।
माला: 108 मनके और सुमेरु
जप की माला में 108 मनके होते हैं और एक बड़ा मनका अलग होता है, जिसे सुमेरु कहते हैं। जप सुमेरु के पास वाले मनके से शुरू करें। एक माला पूरी होने पर जब सुमेरु आ जाए, तो उसे लाँघें नहीं — माला को पलटकर उसी मनके से वापस जप शुरू करें। सुमेरु को गुरु का स्थान माना जाता है, इसलिए उसे पार नहीं किया जाता। माला न हो, तो उँगलियों के पोरों पर गिनकर भी जप किया जाता है — इसे कर-माला कहते हैं।
माला कैसे पकड़ें
- माला दाहिने हाथ में, हृदय के पास पकड़ें। माला ज़मीन पर न लटके।
- मनके अंगूठे से आगे खिसकाएँ और माला को मध्यमा (बीच वाली उँगली) पर टिकाएँ।
- तर्जनी (अंगूठे के पास वाली उँगली) से माला को न छुएँ — परंपरा में इसे वर्जित माना गया है।
- चाहें तो गोमुखी (माला रखने की कपड़े की थैली) में हाथ डालकर जप करें, ताकि माला ढकी रहे।
- अपनी जप की माला दूसरों को न दें और उसे साफ़, ऊँचे स्थान पर रखें।
आसन, दिशा और समय
- आसन: सीधे ज़मीन पर न बैठें। कुश, ऊन या साफ़ कपड़े का आसन बिछाएँ। कमर और गर्दन सीधी रखें।
- दिशा: पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके जप करना शुभ माना जाता है।
- समय: ब्रह्ममुहूर्त (सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले) सबसे उत्तम माना जाता है। सुबह हो या संध्या — जो समय आप रोज़ निभा सकें, वही आपके लिए सही है।
- स्थान: रोज़ एक ही शांत जगह बैठें। धीरे-धीरे वह जगह ही मन को शांत करने लगती है।
- घुटनों या कमर में दर्द हो, तो कुर्सी पर बैठकर भी जप कर सकते हैं — भगवान भाव देखते हैं, आसन नहीं।
जप के तीन प्रकार
- वाचिक जप: मंत्र इतनी आवाज़ में बोलना कि पास बैठा व्यक्ति सुन सके। शुरुआत के लिए यही सबसे सरल है।
- उपांशु जप: होंठ हिलते हैं, पर आवाज़ इतनी धीमी कि केवल आप ही सुन पाएँ।
- मानसिक जप: होंठ भी नहीं हिलते, मंत्र केवल मन में चलता है। इसे सबसे ऊँचा माना गया है, पर इसमें मन भटकता भी जल्दी है।
शास्त्रों में कहा गया है कि वाचिक से उपांशु जप का, और उपांशु से मानसिक जप का फल कहीं अधिक है। फिर भी शुरुआत वाचिक जप से करें। जब मन टिकने लगे, तो धीरे-धीरे उपांशु और फिर मानसिक जप की ओर बढ़ें।
108 ही क्यों?
हमारी परंपरा में 108 की संख्या बहुत पवित्र मानी गई है। इसके कई अर्थ बताए जाते हैं — जैसे 27 नक्षत्रों के 4-4 चरण मिलकर 108 होते हैं, और 12 राशियों को 9 ग्रहों से गुणा करने पर भी 108 बनते हैं। अर्थ चाहे जो मानें, किसी छोटे मंत्र की एक माला में लगभग 5 से 10 मिनट लगते हैं — रोज़ के लिए यह एक सुंदर और निभाने लायक नियम है।
संख्या से बड़ी है नियमितता
एक दिन 11 माला और फिर दस दिन कुछ नहीं — इससे कहीं अच्छा है रोज़ 1 माला। जप का असली फल नियम से आता है। उतना ही संकल्प लें जितना रोज़ निभा सकें। बीमारी, यात्रा या किसी मजबूरी में नियम टूट जाए, तो डरें नहीं — अगले दिन फिर से शुरू कर दें। भगवान हिसाब नहीं, भाव देखते हैं।
शुद्ध उच्चारण
संस्कृत मंत्र धीरे और साफ़ बोलें — जल्दी पूरा करने के चक्कर में शब्द न काटें। कोई नया मंत्र शुरू करें, तो एक बार पंडित जी से उसका उच्चारण ज़रूर सुन लें। वैदिक मंत्रों में स्वर का भी महत्व होता है। उच्चारण पर भरोसा न हो, तो भगवान का नाम-जप — ‘राम’, ‘ॐ नमः शिवाय’, ‘हरे कृष्ण’ — सबसे सरल और पूर्ण साधना है।
किस देव के लिए कौन-सी माला
- रुद्राक्ष की माला: भगवान शिव के मंत्रों के लिए — जैसे ‘ॐ नमः शिवाय’ और महामृत्युंजय मंत्र।
- तुलसी की माला: भगवान विष्णु, श्री राम और श्री कृष्ण के नाम-जप के लिए।
- कमलगट्टे या स्फटिक की माला: माँ लक्ष्मी के मंत्रों के लिए।
- लाल चंदन की माला: माँ दुर्गा और शक्ति-उपासना के लिए मानी जाती है।
- रुद्राक्ष की माला को सर्वमान्य भी माना जाता है — विशेष माला न हो, तो इससे किसी भी देव का जप कर सकते हैं।
जप से पहले और बाद में
- हाथ-मुँह धोकर या स्नान करके साफ़ आसन पर बैठें।
- संभव हो तो दीपक जलाएँ और एक क्षण अपने इष्टदेव का ध्यान करें।
- मन में संकल्प करें — आज कितनी माला और किस भाव से जप करेंगे।
- जप पूरा होने पर माला को माथे से लगाएँ और कुछ पल आसन पर ही शांत बैठें।
- जप भगवान को अर्पित करें और जाने-अनजाने हुई भूल के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।
- आसन से उठने से पहले आसन के नीचे की धरती पर थोड़ा जल छिड़ककर उसे माथे से लगाने की भी परंपरा है।
गुह्यातिगुह्यगोप्ता त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्। सिद्धिर्भवतु मे देव त्वत्प्रसादान्महेश्वर॥
परंपरागत जप-समर्पण श्लोक
अर्थ:हे प्रभु! आप गुप्त से भी गुप्त रहस्यों के रक्षक हैं। मेरे किए हुए इस जप को स्वीकार कीजिए। आपकी कृपा से मेरा जप सफल हो। (देवी के जप के बाद इसी श्लोक को ‘गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं… सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादान्महेश्वरि’ के रूप में पढ़ा जाता है।)
जप कोई जादू नहीं, साधना है। मंत्र मन को शांत, साफ़ और मज़बूत बनाता है — और ऐसा मन ही जीवन की उलझनें सुलझाता है। किसी कामना से जप कर रहे हों, तो साथ में मेहनत, इलाज और धैर्य भी रखें। कोई बड़ा अनुष्ठान (जैसे सवा लाख जप) करना हो, तो उसकी विधि पंडित जी से पूछ लें।