वक्रतुण्ड महाकाय
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
परंपरागत गणेश स्तुति
अर्थ:हे टेढ़ी सूँड़ वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी गणेश जी! मेरे सब कामों को सदा बिना किसी विघ्न (रुकावट) के पूरा कीजिए।
जप: 1 या 3 बार; चाहें तो 11 बार।
कब और कैसे: हर पूजा, पढ़ाई, यात्रा या नए काम की शुरुआत में।
गजाननं भूतगणादि
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
परंपरागत गणेश स्तुति
अर्थ:जिनका मुख हाथी का है, जिनकी सेवा भूतगण आदि करते हैं, जो कैथ और जामुन के फल प्रेम से खाते हैं, जो माँ उमा (पार्वती) के पुत्र हैं और शोक का नाश करते हैं — उन विघ्नेश्वर गणेश जी के चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।
जप: 3 या 11 बार।
कब और कैसे: बुधवार, गणेश चतुर्थी और संकष्टी चतुर्थी को; रोज़ की पूजा में भी।
मनोजवं मारुततुल्यवेगं
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
श्री राम रक्षा स्तोत्र
अर्थ:जिनकी गति मन के समान तेज़ और पवन के समान वेगवान है, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जो पवन देव के पुत्र और वानर सेना के प्रमुख हैं — उन श्री राम के दूत हनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।
जप: 3, 11 या 21 बार।
कब और कैसे: यात्रा पर निकलने से पहले, परीक्षा या कठिन काम से पहले; मंगलवार और शनिवार को।
अतुलितबलधामं
अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड (मंगलाचरण) — गोस्वामी तुलसीदास
अर्थ:जो अतुलनीय बल के धाम हैं, जिनका शरीर सोने के पर्वत (सुमेरु) जैसा चमकता है, जो दैत्य रूपी वन को जलाने वाली आग हैं, जो ज्ञानियों में सबसे आगे हैं, जो सब गुणों के भंडार और वानरों के स्वामी हैं, जो श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त हैं — उन पवनपुत्र हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ।
जप: 3 या 11 बार।
कब और कैसे: सुंदरकांड या हनुमान चालीसा के पाठ से पहले; मंगलवार और शनिवार को।
कर्पूरगौरं करुणावतारं
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
परंपरागत शिव स्तुति
अर्थ:जो कपूर के समान गोरे हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं और जिन्होंने सर्पराज का हार पहना है, जो सदा भक्तों के हृदय-कमल में निवास करते हैं — उन भगवान शिव को माता भवानी (पार्वती) सहित मैं नमन करता हूँ।
जप: 1 या 3 बार।
कब और कैसे: आरती के बाद — हर आरती के अंत में यह श्लोक बोलने की परंपरा है; सोमवार और प्रदोष को विशेष।
शान्ताकारं भुजगशयनं
शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥
परंपरागत विष्णु ध्यान श्लोक
अर्थ:जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर विराजते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी हैं, जो पूरे संसार का आधार हैं, आकाश की तरह सर्वत्र फैले हैं, बादल जैसे साँवले और सुंदर अंगों वाले हैं, जो लक्ष्मी जी के पति हैं, कमल जैसे नेत्रों वाले हैं और योगी जिन्हें ध्यान से पाते हैं — संसार के भय को हरने वाले, सब लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान विष्णु को मैं वंदन करता हूँ।
जप: 1 या 3 बार।
कब और कैसे: सुबह की पूजा में, गुरुवार और एकादशी को; जब मन घबराए तब भी।
रामाय रामभद्राय
रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥
श्री राम रक्षा स्तोत्र
अर्थ:श्री राम को, कल्याण करने वाले रामभद्र को, चंद्रमा जैसे शीतल रामचंद्र को, सृष्टि के विधाता को, रघुकुल के स्वामी को, सबके नाथ को और माता सीता के पति को मेरा नमस्कार है।
जप: 3, 11 या 108 बार।
कब और कैसे: सुबह-शाम, राम नवमी पर, और हनुमान जी की पूजा से पहले।
कृष्णाय वासुदेवाय
कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणतक्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नमः॥
श्रीमद्भागवत पुराण
अर्थ:श्री कृष्ण को, वसुदेव जी के पुत्र को, हरि को, परमात्मा को — जो शरण में आए लोगों के कष्ट मिटा देते हैं — उन गोविंद को बार-बार नमस्कार है।
जप: 3, 11 या 108 बार।
कब और कैसे: सुबह की पूजा, जन्माष्टमी और एकादशी पर; जब मन दुखी हो तब भी।
वसुदेवसुतं देवं
वसुदेवसुतं देवं कंसचाणूरमर्दनम्। देवकीपरमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्॥
श्री कृष्णाष्टकम् (परंपरागत)
अर्थ:वसुदेव जी के पुत्र, दिव्य स्वरूप, कंस और चाणूर का अंत करने वाले, माता देवकी को परम आनंद देने वाले, पूरे जगत के गुरु श्री कृष्ण को मैं वंदन करता हूँ।
जप: 1, 3 या 11 बार।
कब और कैसे: गीता-पाठ से पहले, जन्माष्टमी पर, और रोज़ की पूजा में।
महालक्ष्मी मंत्र
ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः
परंपरागत बीज मंत्र
अर्थ:‘श्रीं’ माँ लक्ष्मी का बीज अक्षर है। अर्थ है — मैं माँ महालक्ष्मी को नमन करता हूँ। लक्ष्मी केवल धन नहीं — सुख, सौभाग्य, शोभा, अन्न और घर की बरकत का भी नाम हैं।
जप: रोज़ 1 माला (108); कमलगट्टे या स्फटिक की माला से।
कब और कैसे: शुक्रवार की संध्या, दीपावली और पूर्णिमा पर; घर में शाम का दीपक जलाते समय।
लक्ष्मी वहीं टिकती हैं जहाँ मेहनत, ईमानदारी और स्वच्छता हो। विधि-विधान से अनुष्ठान पंडित जी के मार्गदर्शन में।
नमस्तेऽस्तु महामाये
नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥
महालक्ष्म्यष्टकम् (पद्म पुराण, इंद्र-कृत)
अर्थ:हे महामाया! हे श्रीपीठ पर विराजने वाली, देवताओं से पूजित माँ! आपके हाथों में शंख, चक्र और गदा हैं। हे महालक्ष्मी, आपको मेरा नमस्कार है।
जप: 3 या 11 बार।
कब और कैसे: शुक्रवार को, दीपावली की पूजा में, और रोज़ संध्या-दीप के समय।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
दुर्गा सप्तशती, अध्याय 11
अर्थ:हे माँ! आप सब मंगलों का भी मंगल हैं, कल्याण करने वाली शिवा हैं, सब कामनाओं को पूरा करने वाली हैं, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी हैं। हे नारायणी, आपको मेरा नमस्कार है।
जप: 3, 11 या 108 बार।
कब और कैसे: नवरात्रि में, हर शुभ काम से पहले, और माँ की आरती के बाद।
या देवी सर्वभूतेषु
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
दुर्गा सप्तशती, अध्याय 5
अर्थ:जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में बसी हुई हैं, उन्हें नमस्कार है, उन्हें नमस्कार है, उन्हें बार-बार नमस्कार है। दुर्गा सप्तशती में इसी तरह देवी को बुद्धि, क्षमा, शांति, श्रद्धा, लक्ष्मी और माता — हर रूप में नमन किया गया है।
जप: 3, 11 या 108 बार।
कब और कैसे: नवरात्रि में, शुक्रवार और अष्टमी को; रोज़ की पूजा में भी।
‘शक्तिरूपेण’ की जगह ‘मातृरूपेण’, ‘शान्तिरूपेण’, ‘लक्ष्मीरूपेण’ आदि बोलकर देवी के अलग-अलग रूपों का स्मरण किया जाता है।
या कुन्देन्दु (सरस्वती वंदना)
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥
परंपरागत सरस्वती स्तुति
अर्थ:जो कुंद के फूल, चंद्रमा, बर्फ़ और मोतियों के हार जैसी उजली हैं, जो सफ़ेद वस्त्र पहनती हैं, जिनके हाथ श्रेष्ठ वीणा से सुशोभित हैं, जो सफ़ेद कमल पर विराजती हैं, ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवता भी जिनकी सदा वंदना करते हैं — वे भगवती सरस्वती मेरी रक्षा करें और मेरी हर तरह की जड़ता (आलस्य और अज्ञान) को पूरी तरह दूर करें।
जप: 1 या 3 बार।
कब और कैसे: पढ़ाई शुरू करने से पहले, परीक्षा के दिन, और बसंत पंचमी पर।
सूर्य मंत्र
ॐ घृणि सूर्याय नमः
परंपरागत सूर्य मंत्र
अर्थ:‘घृणि’ का अर्थ है किरणों से दमकने वाला, तेजस्वी। अर्थ है — मैं प्रकाश देने वाले सूर्य देव को नमन करता हूँ। सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा जाता है — जिन्हें हम रोज़ अपनी आँखों से देखते हैं, और जिनसे जीवन, ऊर्जा और स्वास्थ्य मिलता है।
जप: 11 बार या 1 माला (108)।
कब और कैसे: सुबह सूर्योदय के समय, ताँबे के लोटे से जल चढ़ाते हुए; रविवार को विशेष।
शनि देव मंत्र
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
नवग्रह स्तोत्र — महर्षि वेदव्यास
अर्थ:जिनकी आभा नीले काजल जैसी है, जो सूर्य देव के पुत्र और यमराज के भाई हैं, जो माता छाया और सूर्य देव से जन्मे हैं — उन धीरे-धीरे चलने वाले शनि देव को मैं नमन करता हूँ।
जप: 11 बार या 1 माला (108)।
कब और कैसे: शनिवार को, विशेषकर संध्या के समय; पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाते हुए।
शनि देव न्याय के देवता हैं, डरने के नहीं। ईमानदारी, मेहनत और कमज़ोर लोगों की सेवा — यही शनि देव की सबसे बड़ी पूजा है।
त्वमेव माता
त्वमेव माता च पिता त्वमेव त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव त्वमेव सर्वं मम देव देव॥
परंपरागत प्रार्थना
अर्थ:हे देवों के देव! आप ही मेरी माता हैं, आप ही पिता हैं; आप ही मेरे भाई-बंधु और आप ही मित्र हैं; आप ही मेरी विद्या हैं और आप ही मेरा धन; हे प्रभु, आप ही मेरे सब कुछ हैं।
जप: 1 या 3 बार।
कब और कैसे: पूजा के अंत में, आरती के बाद, या जब भी मन भगवान से जुड़ना चाहे।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।