॥ आरती ॥ श्री हनुमान

श्री हनुमान जी की आरती

मंगलवार और शनिवार को, हनुमान चालीसा या सुंदरकांड पाठ के बाद; सालासर बालाजी के दर्शन-पूजन में यही आरती गूँजती है।

रचनापरंपरागत; कई संस्करणों की ‘तुलसीदास प्रभु कीरति गाई’ पंक्ति के कारण गोस्वामी तुलसीदास जी से जोड़ी जाती है

फ़ोन पूरा पाठ बोलकर सुनाएगा; जो पंक्ति चल रही है, वह चमकेगी।

॥ श्री हनुमान जी की आरती ॥

आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

जाके बल से गिरिवर काँपे।रोग दोष जाके निकट न झाँके॥

अंजनि पुत्र महा बलदाई।संतन के प्रभु सदा सहाई॥

दे बीरा रघुनाथ पठाए।लंका जारि सिया सुधि लाए॥

लंका सो कोट समुद्र सी खाई।जात पवनसुत बार न लाई॥

लंका जारि असुर संहारे।सियारामजी के काज सँवारे॥

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे।आनि सजीवन प्रान उबारे॥

पैठि पाताल तोरि जम-कारे।अहिरावण की भुजा उखारे॥

बाएँ भुजा असुर दल मारे।दाहिने भुजा संतजन तारे॥

सुर नर मुनि आरती उतारें।जय जय जय हनुमान उचारें॥

कंचन थार कपूर लौ छाई।आरती करत अंजना माई॥

लंक विध्वंस किए रघुराई।तुलसीदास प्रभु कीरति गाई॥

जो हनुमानजी की आरती गावे।बसि बैकुंठ परम पद पावे॥

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सरल भाव

टेक का भाव: आइए, दुष्टों का नाश करने वाले और रघुनाथ जी की शक्ति के अंश, प्यारे हनुमान लला की आरती करें। ‘लला’ लाड़ का शब्द है; भक्त हनुमान जी को उतने ही प्रेम से पुकारता है, जितने प्रेम से माँ अपने बच्चे को।

पहले पद: जिनके बल से बड़े-बड़े पर्वत काँप उठते हैं, उनके पास रोग और दोष झाँकने तक नहीं आते। अंजनी माता के पुत्र महाबली हैं और संतों के सदा सहायक हैं। रघुनाथ जी ने उन्हें बीड़ा देकर, यानी ज़िम्मेदारी सौंपकर भेजा; वे लंका जलाकर सीता माता की सुध ले आए।

बीच के पद: लंका जैसा मज़बूत किला और समुद्र जैसी गहरी खाई भी पवनपुत्र को रोक नहीं सकी; जाने में उन्हें ज़रा देर न लगी। उन्होंने असुरों का संहार करके सिया-राम जी के काम सँवारे। जब लक्ष्मण जी मूर्छित पड़े थे, तो सवेरा होने से पहले (‘सकारे’) संजीवनी लाकर उनके प्राण बचाए। पाताल में घुसकर उन्होंने यमराज जैसे भयानक असुरों को पछाड़ा और अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ दीं।

अंतिम पद: उनकी बाईं भुजा ने असुरों के दल को मारा और दाहिनी भुजा ने संतों को तारा। देवता, मनुष्य और मुनि उनकी आरती उतारते हैं और जय-जयकार करते हैं। सोने की थाली में कपूर की लौ जल रही है और स्वयं माता अंजना आरती कर रही हैं। प्रभु श्री राम ने लंका का विध्वंस किया और तुलसीदास जी ने उनकी कीर्ति गाई। जो हनुमान जी की यह आरती गाता है, वह वैकुंठ में परम पद पाता है।

मंगलवार और शनिवार को हनुमान चालीसा या सुंदरकांड के बाद यह आरती गाने की परंपरा है। आरती के बाद ‘पवनसुत हनुमान की जय’ का जयकारा लगाया जाता है।

आरती की विधि

घी का दीपक या कपूर जलाकर, घंटी बजाते हुए आरती करें। पारंपरिक क्रम है: भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार, और फिर पूरे विग्रह पर 7 बार आरती घुमाएँ। अंत में आरती पर जल घुमाकर सबको आरती दें।

आरती की पूरी विधि पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।