- कब
- हर शनिवार। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष के शनिवार से, या किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले शनिवार से आरंभ करना शुभ माना जाता है। संकल्प के अनुसार 7, 11 या 19 शनिवार, या पूरे वर्ष व्रत रखा जाता है।
- पूजनीय
- शनिदेव और श्री हनुमान जी
- संबंधित ग्रह
- शनि ग्रह
शनिवार व्रत का महत्व
शनिदेव सूर्य देव और माता छाया के पुत्र हैं। उन्हें कर्मों का न्यायाधीश कहा जाता है। वे किसी से बैर नहीं रखते, बस हर व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसलिए शनिदेव से डरने की नहीं, उन्हें समझने की ज़रूरत है। ईमानदारी, परिश्रम, धैर्य और दूसरों की सेवा, यही उनकी सबसे बड़ी पूजा है।
ज्योतिष में शनि की साढ़ेसाती और ढैया का नाम सुनकर लोग घबरा जाते हैं। सच यह है कि यह समय मेहनत, धैर्य और सीख का होता है, और कई लोगों के लिए यही समय सबसे बड़ी उन्नति भी लाता है। शनिवार का व्रत इस समय में मन को धैर्य और शक्ति देता है।
शनिवार को हनुमान जी की पूजा का भी विशेष महत्व है। कथा आती है कि रावण ने शनिदेव को बंदी बना रखा था और हनुमान जी ने लंका में उन्हें मुक्त कराया। तब शनिदेव ने वचन दिया कि जो हनुमान जी का भक्त होगा, उसे वे कष्ट नहीं देंगे। इसीलिए शनिवार को हनुमान चालीसा पढ़ने और सालासर बालाजी जैसे धामों में दर्शन की परंपरा है।
इस दिन पीपल के पेड़ की पूजा, सरसों के तेल का दीपक और ज़रूरतमंदों, श्रमिकों तथा बुज़ुर्गों की सेवा को सबसे बड़ा पुण्य माना गया है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें। काले या नीले वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
- हाथ में जल-अक्षत लेकर शनिवार व्रत का संकल्प लें।
- शनि मंदिर में जाकर शनिदेव को सरसों का तेल चढ़ाएँ और काले तिल, उड़द तथा नीले फूल अर्पित करें। घर में हों तो शनिदेव का स्मरण करके तिल के तेल या सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
- शनिदेव के मंत्र ‘ॐ शं शनैश्चराय नमः’ की एक माला जप करें।
- पीपल के पेड़ की जड़ में जल (थोड़ा दूध मिलाकर) चढ़ाएँ और परिक्रमा करें।
- हनुमान जी को सिंदूर का तिलक करें, लाल फूल और लड्डू अर्पित करें और हनुमान चालीसा का पाठ करें।
- शनिवार व्रत कथा (राजा विक्रमादित्य की कथा) पढ़ें या सुनें।
- “आरती कीजै हनुमान लला की” से आरती करें।
- किसी ज़रूरतमंद, श्रमिक या बुज़ुर्ग को काले तिल, उड़द, तेल, कंबल, जूते-चप्पल या भोजन दान करें।
- दिन में एक बार सात्त्विक भोजन करें। परंपरा में उड़द की दाल की खिचड़ी या तिल-गुड़ से बनी चीज़ें ली जाती हैं।
- सूर्यास्त के बाद पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
- रात को सोने से पहले शनिदेव से प्रार्थना करें कि आपके कर्म शुद्ध रहें और जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा माँगें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- उड़द की खिचड़ी, तिल-गुड़
- फल, दूध
- दिन में एक बार सात्त्विक भोजन
क्या न खाएँ
- मांस, मदिरा, तंबाकू और हर नशा
- प्याज़, लहसुन
- किसी का हक़ मारकर कमाया गया अन्न
अन्य नियम
- किसी को धोखा न दें, कटु वचन न बोलें। शनिदेव न्याय के देवता हैं।
- अपने अधीन काम करने वालों, सफ़ाईकर्मियों, श्रमिकों और बुज़ुर्गों का सम्मान करें, उनकी मज़दूरी समय पर दें।
- परंपरा है कि शनिदेव की मूर्ति के ठीक सामने खड़े होकर उनकी आँखों में नहीं देखते, थोड़ा बगल से दर्शन करते हैं।
- आलस छोड़ें। परिश्रम ही शनिदेव को सबसे प्रिय है।
मंत्र
नीलाञ्जनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्॥
अर्थ:जो नीले काजल जैसी कांति वाले हैं, सूर्य देव के पुत्र और यमराज के बड़े भाई हैं, जो माता छाया और सूर्य देव से उत्पन्न हुए हैं, उन धीमी गति से चलने वाले शनिदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
जप: पूजा में 1, 3 या 11 बार
ॐ शं शनैश्चराय नमः
अर्थ:‘शं’ बीजाक्षर सहित शनिदेव को नमस्कार।
जप: रोज़ 1 माला (108 बार)
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
अर्थ:बीजाक्षरों सहित शनिदेव को नमस्कार। यह शनि ग्रह की शांति का मंत्र है।
जप: रोज़ 1 माला; पूरा अनुष्ठान 23,000 जप, पंडित जी के मार्गदर्शन में
शनिवार व्रत कथा: राजा विक्रमादित्य और शनिदेव
एक बार स्वर्गलोक में नौ ग्रहों के बीच विवाद छिड़ गया कि उनमें सबसे बड़ा कौन है। सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु, सब अपने-अपने को श्रेष्ठ बताने लगे। निर्णय के लिए वे देवराज इंद्र के पास पहुँचे। इंद्र किसी को नाराज़ नहीं करना चाहते थे, इसलिए बोले, “पृथ्वी पर उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य बहुत न्यायप्रिय हैं। आप सब उन्हीं से निर्णय करवाइए।”
नौ ग्रह राजा विक्रमादित्य के दरबार में पहुँचे। राजा भी उलझन में पड़ गए, क्योंकि किसी को छोटा कहना उसे नाराज़ करना था। उन्होंने एक उपाय सोचा। उन्होंने नौ धातुओं के नौ आसन बनवाए: सोना, चाँदी, कांसा, पीतल, सीसा, रांगा, जस्ता, अभ्रक और लोहा। उन्हें इसी क्रम में रखवाकर कहा, “आप अपने-अपने आसन पर विराजिए। जिसका आसन जितना आगे, उसका स्थान उतना बड़ा।”
लोहे का आसन सबसे पीछे था, और वह शनिदेव को मिला। शनिदेव क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा, “राजन, तुमने मुझे सबसे पीछे बैठाकर मेरा अपमान किया है। तुम मेरी शक्ति नहीं जानते। सूर्य एक राशि पर एक महीना, चंद्रमा सवा दो दिन रहते हैं, पर मैं एक राशि पर ढाई वर्ष रहता हूँ। जब मेरी साढ़ेसाती आती है, तो बड़े-बड़े देवता भी डगमगा जाते हैं। अब तुम भी मेरा प्रभाव देखोगे।” यह कहकर शनिदेव चले गए। बाकी ग्रह प्रसन्न होकर लौट गए।
समय बीता और राजा विक्रमादित्य पर शनि की साढ़ेसाती आई। एक दिन शनिदेव घोड़ों के व्यापारी का रूप धरकर बहुत सुंदर घोड़ों के साथ उज्जयिनी पहुँचे। राजा को एक घोड़ा बहुत पसंद आया और वे उसकी परख के लिए उस पर सवार हुए। सवार होते ही घोड़ा हवा की तरह भागा और राजा को दूर घने जंगल में छोड़कर गायब हो गया।
राजा भूखे-प्यासे भटकते हुए एक अनजान नगर में पहुँचे। वहाँ वे एक सेठ की दुकान पर थोड़ी देर बैठ गए। संयोग से उस दिन सेठ की बिक्री बहुत बढ़ गई। सेठ ने सोचा, यह व्यक्ति भाग्यवान है, और उसे भोजन के लिए अपने घर ले गया। सेठ के घर के एक कमरे में खूँटी पर एक कीमती हार टँगा था। राजा उस कमरे में अकेले थे, तभी उन्होंने आश्चर्य से देखा कि खूँटी धीरे-धीरे वह हार निगल रही है।
सेठ ने हार गायब पाया तो राजा पर चोरी का आरोप लगा दिया। राजा कुछ समझा न सके। उस नगर के राजा ने उन्हें चोर मानकर कठोर दंड दिया: उनके हाथ-पैर कटवाकर उन्हें नगर से बाहर छुड़वा दिया। एक दयालु तेली ने उनकी यह दशा देखी, उन्हें अपने घर ले आया और कोल्हू पर बैठा दिया। राजा वहीं बैठे-बैठे आवाज़ से बैलों को हाँकते और किसी तरह दिन काटते।
इसी तरह बहुत समय बीता। साढ़ेसाती पूरी होने को आई। वर्षा ऋतु की एक रात राजा ने मन बहलाने के लिए दीपक राग गाया। उनका स्वर इतना मधुर था कि उस नगर की राजकुमारी ने महल से वह गायन सुना और मोहित हो गई। उसने हठ ठान लिया कि वह उसी गायक से विवाह करेगी। माता-पिता ने बहुत समझाया, पर राजकुमारी अडिग रही। अंत में राजा को विवाह के लिए मानना पड़ा।
विवाह की रात शनिदेव ने राजा विक्रमादित्य को स्वप्न में दर्शन दिए और पूछा, “राजन, देखा मेरा प्रभाव?” राजा ने हाथ जोड़कर क्षमा माँगी और विनती की, “हे शनिदेव, आपने जैसा कष्ट मुझे दिया, वैसा किसी और को न देना।” शनिदेव प्रसन्न हुए और बोले, “जो मेरी यह कथा सुनेगा और मेरा व्रत करेगा, उसे मेरी दशा में ऐसा कष्ट नहीं होगा।” यह कहकर शनिदेव ने राजा के हाथ-पैर लौटा दिए।
सुबह राजकुमारी ने अपने पति को पूरे स्वस्थ रूप में देखा तो चकित रह गई। तब राजा ने बताया कि वे उज्जयिनी के राजा विक्रमादित्य हैं। यह समाचार पूरे नगर में फैल गया। सेठ दौड़ा आया और क्षमा माँगने लगा। उसी समय सेठ के घर की खूँटी ने वह हार भी उगल दिया। सेठ ने राजा का बहुत सम्मान किया।
राजा विक्रमादित्य राजकुमारी के साथ उज्जयिनी लौटे, जहाँ प्रजा ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया। राजा ने समझ लिया था कि हर ग्रह का अपना स्थान है और शनिदेव कर्मों के न्यायाधीश हैं। उन्होंने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि सब लोग शनिवार का व्रत करें और शनिदेव की कथा सुनें। कथा आती है कि उस दिन से प्रजा सुख और शांति से रहने लगी।
कथा का सार: कठिन समय सदा नहीं रहता। धैर्य, विनम्रता और सच्ची क्षमा-प्रार्थना से सबसे बुरा समय भी बीत जाता है। शनिदेव दंड नहीं, सीख देते हैं।
पीपल पूजा और छाया दान
शनिवार को पीपल की पूजा
पीपल को वृक्षों का राजा कहा गया है और मान्यता है कि इसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश, तीनों का वास है। शनिवार को पीपल की पूजा शनिदेव को प्रसन्न करने वाली मानी जाती है।
- सुबह स्नान के बाद पीपल की जड़ में जल चढ़ाएँ, चाहें तो उसमें थोड़ा दूध और गुड़ मिला लें।
- तने पर रोली-अक्षत लगाएँ और प्रणाम करें।
- पीपल की 7 परिक्रमा करें।
- शाम को सूर्यास्त के बाद पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ।
- ध्यान रखें: पीपल की टहनी या पत्ते न तोड़ें।
छाया दान
यह शनिवार का एक पुराना और सरल उपाय है। एक लोहे या स्टील की कटोरी में सरसों का तेल लें। उसमें अपना चेहरा (छाया) देखें, फिर कटोरी सहित वह तेल किसी ज़रूरतमंद को या शनि मंदिर में दान कर दें। मान्यता है कि इससे मन का भारीपन और कष्ट हल्के होते हैं।
सबसे बड़ा उपाय: शनिदेव मेहनत करने वालों के देवता हैं। किसी श्रमिक, सफ़ाईकर्मी या बुज़ुर्ग की सेवा और सम्मान, किसी भी पूजा से बढ़कर शनिदेव को प्रसन्न करता है।
उद्यापन
संकल्प के शनिवार पूरे होने पर अगले शनिवार को उद्यापन करें। शनिदेव और हनुमान जी की विधिवत पूजा करें और शनि मंत्र से हवन करवाएँ। परंपरा में शनि के हवन में शमी की लकड़ी का प्रयोग होता है।
- सामर्थ्य के अनुसार ज़रूरतमंदों, श्रमिकों और बुज़ुर्गों को भोजन कराएँ।
- काले तिल, उड़द, सरसों का तेल, कंबल, लोहे का पात्र, जूते-चप्पल दान करें।
- हनुमान जी को चोला चढ़वाएँ और सुंदरकांड का पाठ करें या करवाएँ।
- विधि के लिए पंडित जी से सलाह लें।
सावधानी
साढ़ेसाती या ढैया के डर से कठोर उपवास करने की ज़रूरत नहीं है। शनिदेव का सबसे बड़ा व्रत अच्छा आचरण है। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग फलाहार या एक समय भोजन के साथ व्रत करें, या केवल पूजा, दान और हनुमान चालीसा से व्रत पूरा करें। डॉक्टर की सलाह लें और दवा कभी न छोड़ें। दीपक जलाते समय आग से सावधानी रखें।
पूजा के अंत में आरती
श्री हनुमान जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।