- कब
- हर मंगलवार। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार से आरंभ करना शुभ माना जाता है। अधिकतर भक्त 21 मंगलवार का संकल्प लेते हैं। कुछ 45 मंगलवार या पूरे वर्ष भी रखते हैं।
- पूजनीय
- श्री हनुमान जी (और मंगल देव)
- संबंधित ग्रह
- मंगल ग्रह
मंगलवार व्रत का महत्व
मंगलवार हनुमान जी का दिन है। हनुमान जी संकटमोचन हैं। वे बल, बुद्धि और विद्या देने वाले हैं, और रामभक्ति के सबसे बड़े उदाहरण हैं। तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा में लिखा है, “संकट तें हनुमान छुड़ावै, मन क्रम बचन ध्यान जो लावै।” यानी जो मन, कर्म और वचन से हनुमान जी का ध्यान करता है, उसे वे हर संकट से छुड़ा लेते हैं।
यह व्रत भय दूर करने, आत्मबल बढ़ाने, रोगों से रक्षा, कर्ज़ और मुकदमे जैसी परेशानियों में धैर्य पाने, और संतान-सुख की कामना से किया जाता है। ज्योतिष में मंगल ग्रह साहस, ऊर्जा, भूमि और भाइयों के कारक हैं। मंगल ग्रह की शांति के लिए भी हनुमान जी की उपासना सबसे सरल उपाय मानी जाती है।
सालासर बालाजी धाम में मंगलवार को देश भर से हज़ारों भक्त दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि इस दिन बालाजी के दर्शन, सिंदूर-चोला और हनुमान चालीसा के पाठ से मन का हर भय दूर हो जाता है।
इस व्रत में सबसे बड़ा नियम है ब्रह्मचर्य और संयम। हनुमान जी स्वयं बाल-ब्रह्मचारी हैं, इसलिए व्रत के दिन मन, वाणी और शरीर की पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और लाल या केसरिया वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल-अक्षत लेकर मंगलवार व्रत का संकल्प लें, और कितने मंगलवार करेंगे, यह भी तय करें।
- पूजा-स्थान पर हनुमान जी की मूर्ति या चित्र के साथ भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी का भी स्मरण करें। हनुमान जी राम-नाम से सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं।
- हनुमान जी को सिंदूर का तिलक करें, लाल फूल, जनेऊ और तुलसी दल अर्पित करें।
- मंदिर में जाकर सिंदूर और चमेली के तेल का चोला चढ़वा सकते हैं। यह कार्य मंदिर के पुजारी जी के माध्यम से करवाना उचित है।
- घी या चमेली के तेल का दीपक और धूप जलाएँ।
- हनुमान चालीसा का पाठ करें। समय हो तो सुंदरकांड का पाठ करें।
- मंगलवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “आरती कीजै हनुमान लला की” से आरती करें।
- गुड़-चना, बूँदी या लड्डू का भोग लगाएँ। भोग पर एक तुलसी दल अवश्य रखें।
- दिन में एक बार भोजन करें। परंपरा में इस दिन गेहूँ और गुड़ से बना भोजन (जैसे गुड़ की रोटी, आटे का हलवा या चूरमा) लिया जाता है और नमक नहीं खाया जाता।
- शाम को फिर दीपक जलाकर हनुमान चालीसा पढ़ें और प्रसाद बाँटें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- गेहूँ और गुड़ से बना भोजन, दिन में एक बार
- गुड़-चना, फल, दूध
- हनुमान जी का प्रसाद
क्या न खाएँ
- नमक (परंपरा के अनुसार)
- प्याज़, लहसुन
- मांस, मदिरा, तंबाकू और हर नशा
अन्य नियम
- ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करें।
- क्रोध, झूठ और किसी को सताने से बचें। हनुमान जी निर्बलों के रक्षक हैं।
- भाइयों और साथियों से मधुर संबंध रखें।
- लाल रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
मंत्र
ॐ हं हनुमते नमः
अर्थ:श्री हनुमान जी को नमस्कार।
जप: रोज़ 1 माला (108 बार)
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
अर्थ:जो मन जैसी गति वाले और वायु के समान वेगवान हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं, उन पवनपुत्र, वानर-सेना के प्रमुख, श्रीराम के दूत की मैं शरण लेता हूँ।
जप: पूजा के आरंभ में 1 या 3 बार
ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः
अर्थ:बीजाक्षरों सहित भूमिपुत्र मंगल देव को नमस्कार। यह मंगल ग्रह की शांति का मंत्र है।
जप: रोज़ 1 माला; पूरा अनुष्ठान 10,000 जप, पंडित जी के मार्गदर्शन में
मंगलवार व्रत कथा: ब्राह्मणी की निष्ठा और बालक मंगल
प्राचीन समय में एक नगर में एक ब्राह्मण दंपति रहते थे। उनके पास सब कुछ था, पर कोई संतान नहीं थी। इसी दुख में ब्राह्मण वन में जाकर हनुमान जी की पूजा करने लगा और पुत्र के लिए प्रार्थना करने लगा।
घर पर उसकी पत्नी भी हर मंगलवार व्रत रखती थी। दिन के अंत में वह भोजन बनाती, पहले हनुमान जी को भोग लगाती और उसके बाद ही स्वयं अन्न ग्रहण करती।
एक बार किसी कारण से मंगलवार के दिन वह भोजन नहीं बना सकी और हनुमान जी को भोग नहीं लगा पाई। उसे बहुत दुख हुआ। उसने मन में प्रण किया, “अब अगले मंगलवार हनुमान जी को भोग लगाकर ही अन्न ग्रहण करूँगी।” पूरे छह दिन वह भूखी-प्यासी रही और सातवें दिन, मंगलवार को, कमज़ोरी से मूर्छित होकर गिर पड़ी।
उसकी निष्ठा देखकर हनुमान जी प्रसन्न हुए और उसे दर्शन देकर बोले, “उठो, मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें एक सुंदर बालक देता हूँ, जो तुम्हारी बहुत सेवा करेगा।” इतना कहकर उन्होंने एक बालक दिया और अंतर्धान हो गए। ब्राह्मणी की खुशी का ठिकाना न रहा। मंगलवार को मिला था, इसलिए उसने बालक का नाम ‘मंगल’ रखा।
कुछ समय बाद ब्राह्मण घर लौटा। बालक को देखकर उसने पूछा, “यह कौन है?” पत्नी ने सारी बात बताई कि हनुमान जी ने प्रसन्न होकर यह बालक दिया है। पर ब्राह्मण को विश्वास नहीं हुआ। उसके मन में संदेह आ गया कि पत्नी कुछ छिपा रही है।
एक दिन ब्राह्मण कुएँ पर पानी भरने जा रहा था। पत्नी ने कहा, “मंगल को भी साथ ले जाइए।” रास्ते में संदेह की आग में अंधे होकर ब्राह्मण ने एक भयानक भूल कर दी: उसने बालक को कुएँ में धकेल दिया और अकेला घर लौट आया।
घर पहुँचते ही पत्नी ने पूछा, “मंगल कहाँ है?” ब्राह्मण कुछ बोल पाता, उससे पहले ही मंगल मुस्कुराता हुआ पीछे से दौड़ता हुआ आ गया। ब्राह्मण के होश उड़ गए।
उसी रात हनुमान जी ने ब्राह्मण को स्वप्न में दर्शन दिए और कहा, “यह बालक मैंने ही तुम्हें दिया है। तुम्हारी पत्नी पवित्र है और उसी की निष्ठा से तुम्हें यह पुत्र मिला है।” ब्राह्मण को अपनी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। सुबह उसने पत्नी से क्षमा माँगी और दोनों मिलकर हर मंगलवार व्रत करने लगे। हनुमान जी की कृपा से उनका जीवन सुख-शांति से भर गया।
कथा आती है कि जो भी श्रद्धा से मंगलवार का व्रत करता है और यह कथा पढ़ता या सुनता है, हनुमान जी उसके सारे संकट हर लेते हैं।
कथा का सार: संदेह घर को तोड़ता है और विश्वास जोड़ता है। यह निष्ठा की कथा है, कठोर उपवास की नहीं। भगवान भूख से नहीं, भाव से प्रसन्न होते हैं, इसलिए आज के समय में अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए ही व्रत करें।
हनुमान जी को चोला क्यों चढ़ाते हैं
एक प्रसिद्ध लोक-कथा है। एक दिन हनुमान जी ने माता सीता को माँग में सिंदूर लगाते देखा और पूछा, “माता, आप यह क्यों लगाती हैं?” सीता जी ने स्नेह से कहा, “इससे तुम्हारे स्वामी श्रीराम की आयु लंबी होती है और वे प्रसन्न रहते हैं।” यह सुनकर हनुमान जी ने सोचा, जब थोड़ा-सा सिंदूर इतना शुभ है, तो पूरे शरीर पर लगाने से प्रभु कितने प्रसन्न होंगे! उन्होंने पूरे शरीर पर सिंदूर लगा लिया। श्रीराम उनका यह निश्छल प्रेम देखकर हँस पड़े और उन्हें हृदय से लगा लिया।
तभी से हनुमान जी को सिंदूर और चमेली के तेल का चोला चढ़ाने की परंपरा है। सालासर बालाजी का स्वरूप भी सिंदूर से ही सजा रहता है।
- चोला प्रायः मंगलवार या शनिवार को चढ़ाया जाता है।
- चोला मंदिर में पुजारी जी के माध्यम से चढ़वाना उचित है। घर में चित्र पर सिंदूर का तिलक कर सकते हैं।
- चोले के साथ लाल वस्त्र, जनेऊ और भोग अर्पित किया जाता है।
उद्यापन
21 मंगलवार (या जितने का संकल्प हो) पूरे होने पर अगले मंगलवार को उद्यापन करें। उस दिन हनुमान जी को चोला चढ़वाएँ, सुंदरकांड का पाठ करें या करवाएँ और हवन करवाएँ।
- सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों या ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ।
- लाल वस्त्र, गुड़, चना, मसूर की दाल और दक्षिणा दान करें।
- उद्यापन की पूरी विधि के लिए पंडित जी से सलाह लें।
सावधानी
इस व्रत में परंपरा से नमक नहीं लिया जाता। ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ या किसी नियमित दवा वाले लोग डॉक्टर की सलाह से सेंधा नमक या फलाहार के साथ व्रत करें। कथा की ब्राह्मणी की तरह कई दिन भूखे रहना अनुकरण की बात नहीं है। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ और बुज़ुर्ग केवल हनुमान चालीसा और पूजा से भी पूरा व्रत कर सकते हैं। दवा कभी न छोड़ें।
पूजा के अंत में आरती
श्री हनुमान जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।