वास्तु: घर, दिशा और सुख-शांति
वास्तु शास्त्र क्या कहता है, वास्तु पुरुष की कथा, आठ दिशाओं के देवता, घर के हर कमरे की दिशा, और बिना तोड़-फोड़ के सरल उपाय। अपने घर का नक्शा भेजिए, पंडित जी देखकर बताएँगे।
वास्तु क्या है
‘वास्तु’ शब्द संस्कृत की ‘वस्’ धातु से बना है, जिसका अर्थ है रहना या बसना। वास्तु शास्त्र घर बनाने की प्राचीन भारतीय विद्या है: कैसी भूमि चुनें, घर किस दिशा में हो, कौन-सा कमरा कहाँ बने, और धूप, हवा और पानी का रास्ता कैसा हो।
इसका सार बहुत सरल है: सुबह की धूप पूर्व से आए, उत्तर-पूर्व हल्का और साफ़ रहे, भारी चीज़ें दक्षिण-पश्चिम में हों, और घर के बीच का भाग खुला रहे। आम तौर पर माना जाता है कि ईशान में जल, आग्नेय में अग्नि, नैऋत्य में पृथ्वी, वायव्य में वायु और बीच में आकाश तत्व का स्थान है।
वास्तु के प्रमुख ग्रंथ
- मत्स्य पुराण: वास्तु पुरुष की उत्पत्ति की कथा और भवन-निर्माण के अध्याय।
- बृहत्संहिता: आचार्य वराहमिहिर (छठी शताब्दी) का ग्रंथ; इसका वास्तुविद्या अध्याय घर की योजना बताता है।
- मयमतम्: परंपरा में इसके रचयिता मय माने जाते हैं; दक्षिण भारत की भवन और मंदिर-परंपरा का प्रमुख ग्रंथ।
- मानसार: गाँव, नगर, भवन और मूर्ति-निर्माण का विस्तृत ग्रंथ।
- समरांगण सूत्रधार: धारा नगरी के राजा भोज (11वीं शताब्दी) का विशाल ग्रंथ।
- विश्वकर्मा प्रकाश: देव-शिल्पी विश्वकर्मा की परंपरा का ग्रंथ, घर बनाने के नियमों के साथ।
वास्तु पुरुष की कथा
मत्स्य पुराण में कथा आती है कि भगवान शिव और अंधकासुर के युद्ध के समय शिव जी के शरीर से पसीने की एक बूँद धरती पर गिरी। उससे एक विशाल प्राणी उत्पन्न हुआ, जिसकी भूख शांत ही नहीं होती थी। शिव जी से वर पाकर वह तीनों लोकों को खाने लगा।
तब ब्रह्मा जी के कहने पर सब देवताओं ने मिलकर उसे पकड़ा और धरती पर औंधे मुँह गिरा दिया। जो देवता जहाँ था, वहीं उसके शरीर पर बैठ गया, कुल 45 देवता। उसका सिर ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में रहा, पैर नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) में, और दोनों हाथ आग्नेय और वायव्य की ओर। बीच में ब्रह्मा जी स्वयं विराजे; इसीलिए घर का बीच का भाग ब्रह्मस्थान कहलाता है।
उस प्राणी ने ब्रह्मा जी से विनती की कि मैंने तो वही किया जिसकी मुझे आज्ञा मिली थी, अब मेरा भोजन क्या होगा? ब्रह्मा जी ने वरदान दिया: जो भी घर, मंदिर, कुआँ, बाग़ या नगर बनाएगा, वह बनाते समय और उसमें रहने से पहले तुम्हारा पूजन करेगा और तुम्हें भोग देगा। तभी से उसे वास्तु पुरुष कहा जाता है।
इसीलिए भूमि पूजन, गृह प्रवेश और वास्तु शांति में वास्तु पुरुष और इन देवताओं की पूजा होती है। यह पूजा डर की नहीं, आदर की है: जिस धरती पर घर बना, उसके देवता को धन्यवाद।
आठ दिशाएँ और उनके देवता
नक्शे की तरह ऊपर उत्तर है। किसी भी दिशा को दबाइए, उसकी पूरी बात नीचे मिलेगी।
‘सिर’ और ‘पैर’: वास्तु पुरुष का सिर ईशान में और पैर नैऋत्य में माने गए हैं।
वायव्य (उत्तर-पश्चिम)
वायु देव की दिशा। अतिथि कक्ष, अनाज का भंडार, गाड़ी या बच्चों के कमरे के लिए अच्छी मानी जाती है। रसोई आग्नेय में न बन सके, तो दूसरा विकल्प यही है।
उत्तर
धन के स्वामी कुबेर की दिशा। इस ओर खुली जगह, खिड़कियाँ और बैठक अच्छी मानी जाती है। तिजोरी ऐसे रखें कि उसका दरवाज़ा उत्तर की ओर खुले।
ईशान (उत्तर-पूर्व)
वास्तु पुरुष का सिर इसी कोने में माना गया है, इसलिए यह घर का सबसे पवित्र कोना है। पूजा घर, भूमिगत पानी की टंकी या बोरिंग के लिए उत्तम। यहाँ शौचालय, भारी सामान और कबाड़ न हो; यह कोना सबसे साफ़, खुला और हल्का रहे।
पश्चिम
जल के देवता वरुण की दिशा। भोजन कक्ष, बच्चों का कमरा, सीढ़ी या छत की पानी की टंकी के लिए ठीक मानी जाती है।
ब्रह्मस्थान (घर का बीच)
घर का बीच का भाग, जहाँ वास्तु मंडल में ब्रह्मा जी का स्थान है। पुराने घरों का आँगन यही था। इसे खुला, साफ़ और हल्का रखें; यहाँ भारी खंभा, सीढ़ी या शौचालय न हो।
पूर्व
सूर्योदय की दिशा, देवराज इंद्र की। इस ओर खिड़कियाँ और खुली जगह रखें, ताकि सुबह की धूप घर में आए। पूजा और पढ़ाई के समय मुख पूर्व की ओर रखना अच्छा माना गया है।
नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)
वास्तु पुरुष के पैर इसी कोने में माने गए हैं। घर के मुखिया का शयनकक्ष, भारी अलमारी और भारी सामान यहाँ रखना अच्छा माना जाता है। यह कोना ऊँचा और भरा रहे; यहाँ गड्ढा या बोरिंग ठीक नहीं माना जाता।
दक्षिण
धर्मराज यम की दिशा, जो अशुभ नहीं है। भारी फ़र्नीचर, सीढ़ी और मोटी दीवारें इस ओर अच्छी मानी जाती हैं। दक्षिण मुखी घर भी सही योजना से उतना ही शुभ है।
आग्नेय (दक्षिण-पूर्व)
अग्नि देव की दिशा, इसलिए रसोई के लिए सबसे उत्तम। बिजली का मीटर, इन्वर्टर या जनरेटर भी इसी ओर रखे जाते हैं। खाना बनाते समय मुख पूर्व की ओर रहे।
घर के कमरे: कौन-सा कहाँ
ये परंपरा की सामान्य बातें हैं; अलग-अलग ग्रंथों और क्षेत्रों में थोड़ा अंतर मिलता है। जो कमरा पहले से बना है, उसे तोड़ने की जगह नीचे के उपाय देखिए।
मुख्य द्वार
उत्तम: पूर्व, उत्तर या ईशानइन दिशाओं का द्वार परंपरा में शुभ माना गया है। पर द्वार की असली जगह दीवार के ‘पद’ (हिस्से) से तय होती है, इसलिए दक्षिण या पश्चिम मुखी घर भी अशुभ नहीं। द्वार साफ़, रोशन और बिना टूट-फूट के रहे।
पूजा घर
उत्तम: ईशान; या पूर्व, उत्तरपूजा करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे। अलग कमरा न हो, तो ईशान की ओर एक साफ़ अलमारी या ताक भी पूरा पूजा स्थान है। सीढ़ी के नीचे या शौचालय की दीवार से सटा न हो।
रसोई
उत्तम: आग्नेय; दूसरा विकल्प वायव्यखाना बनाते समय मुख पूर्व की ओर रहे। चूल्हा और पानी का सिंक ठीक पास-पास या आमने-सामने न हों, थोड़ी दूरी रखें।
मुख्य शयनकक्ष
उत्तम: नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम)घर के मुखिया का कमरा। सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व की ओर रहे; उत्तर की ओर सिर करके सोना परंपरा में मना है।
बच्चों का कमरा, पढ़ाई
उत्तम: पश्चिम या वायव्यपढ़ाई की मेज़ ऐसे रखें कि पढ़ते समय मुख पूर्व या उत्तर की ओर रहे।
अतिथि कक्ष
उत्तम: वायव्य (उत्तर-पश्चिम)मेहमानों के लिए यह दिशा अच्छी मानी जाती है।
शौचालय और स्नानघर
उत्तम: पश्चिम या वायव्यईशान कोने और घर के बीच (ब्रह्मस्थान) में न हो। पहले से वहाँ बना हो तो तोड़ने की ज़रूरत नहीं: उसे साफ़, सूखा और दरवाज़ा बंद रखें।
सीढ़ी
उत्तम: दक्षिण, पश्चिम या नैऋत्यईशान कोने और घर के बीच में नहीं। ऊपर चढ़ते समय घड़ी की सुई की दिशा में घूमे, तो अच्छा माना जाता है।
तिजोरी, अलमारी
उत्तम: दक्षिण या नैऋत्य की दीवार से सटीऐसे रखें कि दरवाज़ा उत्तर की ओर, कुबेर की दिशा में खुले।
पानी की टंकी, बोरिंग
उत्तम: ज़मीन में: ईशान या उत्तर; छत पर: नैऋत्य या पश्चिमज़मीन के नीचे का पानी उत्तर-पूर्व में, और ऊँचाई पर रखा भारी पानी दक्षिण-पश्चिम की ओर।
बिना तोड़-फोड़ के उपाय
- सफ़ाई और रोशनी: ईशान कोना और मुख्य द्वार घर में सबसे साफ़ रहें। टूटा सामान, बंद घड़ियाँ और बरसों का कबाड़ हटाइए।
- भारी और हल्का: भारी अलमारी और सामान दक्षिण-पश्चिम की ओर; उत्तर-पूर्व हल्का और खुला। अक्सर इतने से ही घर हल्का लगने लगता है।
- दिशा बदलिए, दीवार नहीं: जहाँ कमरा नहीं बदल सकते, वहाँ बैठने और सोने की दिशा बदलिए: पूजा, पढ़ाई और खाना बनाते समय मुख पूर्व या उत्तर; सोते समय सिर दक्षिण या पूर्व।
- पानी का रिसाव: टपकते नल, सीलन और रुकी नालियाँ तुरंत ठीक करवाइए। यह वास्तु भी है और समझदारी भी।
- धूप और हवा: सुबह खिड़कियाँ खोलिए; पूर्व और उत्तर से धूप और हवा आने दीजिए।
- दीपक और मंगल चिह्न: शाम को मुख्य द्वार और पूजा स्थान पर दीपक। द्वार पर स्वस्तिक या शुभ-लाभ, और आम के पत्तों का तोरण।
- वास्तु शांति पूजा: नए घर में, बड़ी मरम्मत के बाद, या जब मन बार-बार अशांत रहे। वह भी तभी, जब नक्शा देखकर ज़रूरत लगे। पूजा की पूरी जानकारी
वास्तु के नाम पर कोई घर तुड़वाने, महँगे यंत्र-पिरामिड ख़रीदवाने या ‘वरना अनर्थ होगा’ जैसा डर दिखाए, तो रुकिए और दूसरी राय लीजिए। शास्त्र सुख के लिए है, डर के लिए नहीं।
नींव से गृह प्रवेश तक
घर बनने की हर सीढ़ी पर एक पूजा: नींव रखते समय भूमि पूजन, रहने से पहले गृह प्रवेश, और नए घर या बड़ी मरम्मत के बाद वास्तु शांति।
भूमि पूजन (शिलान्यास)
घर, दुकान या किसी भी निर्माण की नींव रखने से पहले धरती माता, वास्तु पुरुष और दिशाओं के देवताओं का पूजन, और नींव में शिला या कलश की स्थापना।
पढ़ेंगृह प्रवेश पूजा
नए घर में पहली बार प्रवेश से पहले वास्तु-पूजन, गणेश-लक्ष्मी पूजन, कलश और हवन, ताकि घर में सुख, शांति और अपनापन बसे।
पढ़ेंवास्तु शांति पूजा
घर, दुकान या ऑफ़िस के देवता वास्तु पुरुष और आठों दिशाओं के स्वामियों का पूजन और हवन, ताकि स्थान रहने वालों के लिए सुखद, स्वस्थ और शांत हो।
पढ़ेंवास्तु मंत्र
वास्तु पूजन में ऋग्वेद के वास्तोष्पति सूक्त का पाठ होता है। यह उसका पहला मंत्र है, जिसमें घर के स्वामी देवता से परिवार के सुख और आरोग्य की प्रार्थना है।
वास्तोष्पते प्रति जानीह्यस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवा नः। यत्त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्व शं नो भव द्विपदे शं चतुष्पदे॥
ऋग्वेद 7.54.1, ऋषि वसिष्ठ
अर्थ:हे वास्तु के स्वामी, हमें अपना जानिए। यह घर हमारे लिए सुख से प्रवेश करने योग्य और रोग-रहित हो। हम आपसे जो माँगते हैं, उसे स्वीकार कीजिए, और हमारे परिवार के लोगों तथा पशुओं के लिए कल्याणकारी होइए।
ॐ वास्तुपुरुषाय नमः॥
अर्थ:वास्तु पुरुष को नमस्कार। घर में शाम का दीपक जलाते समय 11 बार श्रद्धा से बोल सकते हैं।
पंडित जी से परामर्श कैसे लें
- नक्शा: घर, दुकान, फ़्लैट या प्लॉट का नक्शा। आर्किटेक्ट का नक्शा न हो, तो काग़ज़ पर हाथ से बना कच्चा नक्शा भी चलेगा; हर कमरे का नाम लिख दें।
- दिशा: घर के अंदर, मुख्य द्वार पर खड़े होकर बाहर की ओर देखिए और फ़ोन के कंपास ऐप का स्क्रीनशॉट लीजिए। लोहे और बिजली के सामान के पास कंपास ग़लत दिखा सकता है, इसलिए दो जगह से मिला लें।
- फ़ोटो (चाहें तो): मुख्य द्वार, रसोई और पूजा स्थान की एक-एक फ़ोटो।
- सवाल: दो पंक्तियों में: नया घर ले रहे हैं, बनवा रहे हैं, या कोई परेशानी है।
- भेजिए: नीचे का बटन दबाइए। WhatsApp पर संदेश पहले से लिखा मिलेगा; नक्शा और स्क्रीनशॉट साथ जोड़ दीजिए। पंडित जी देखकर सरल सुझाव देंगे।
WhatsApp: +91 98281 29585 · केवल संदेश, उत्तर 24 घंटे में · दक्षिणा इच्छा अनुसार
सवाल-जवाब
क्या दक्षिण मुखी घर अशुभ होता है?
नहीं। वास्तु में हर दिशा के घर के नियम हैं। दक्षिण मुखी घर में द्वार की जगह, रसोई और शयनकक्ष ठीक हों, तो वह उतना ही शुभ है। केवल दिशा देखकर घर छोड़ने या डरने की ज़रूरत नहीं।
फ़्लैट में वास्तु कैसे देखें?
फ़्लैट के अपने मुख्य द्वार, रसोई, पूजा स्थान और शयनकक्ष की दिशा देखी जाती है। बिल्डिंग की दीवारें नहीं बदल सकते, इसलिए सामान की जगह, मुख की दिशा और सफ़ाई से ही अधिकतर बात संभल जाती है।
किराए के घर में भी वास्तु देखना चाहिए?
जितने दिन रहें, वह आपका घर है। तोड़-फोड़ नहीं, बस सामान की जगह, सफ़ाई और रोज़ शाम का दीपक। चाहें तो छोटी वास्तु शांति भी करवा सकते हैं।
दुकान या ऑफ़िस में क्या देखें?
मालिक की बैठक दक्षिण-पश्चिम की ओर, और बैठते समय मुख उत्तर या पूर्व की ओर। तिजोरी या कैश का दराज़ उत्तर की ओर खुले, और ईशान कोना साफ़ और हल्का रहे। बाक़ी नक्शा देखकर।
नया प्लॉट ख़रीदने से पहले क्या देखें?
प्लॉट का आकार (चौकोर या आयताकार अच्छा माना जाता है), ज़मीन की ढलान (उत्तर या पूर्व की ओर ढलान अच्छी मानी जाती है), और सामने की सड़क। ख़रीदने से पहले ही नक्शा भेज दें, बाद में बदलना कठिन होता है।
क्या नक्शा देखकर ही सलाह हो सकती है?
हाँ, अधिकतर बातें नक्शे और दिशा से ही हो जाती हैं। ज़रूरत हो, तो आगे की बात पंडित जी स्वयं बताएँगे।
वास्तु परामर्श की दक्षिणा कितनी है?
इच्छा अनुसार। वास्तु परामर्श की भी कोई तय रेट नहीं है।