चंद्र देव की स्तुति
दधिशङ्खतुषाराभं क्षीरोदार्णवसम्भवम्। नमामि शशिनं सोमं शम्भोर्मुकुटभूषणम्॥
नवग्रह स्तोत्र — महर्षि वेदव्यास
अर्थ:दही, शंख और बर्फ़ के समान उज्ज्वल आभा वाले, क्षीर-सागर से प्रकट हुए, भगवान शिव के मुकुट के आभूषण — शशी, सोम (चंद्रमा) — को मैं नमस्कार करता हूँ।
दक्ष का शाप और सोमनाथ की कृपा
चंद्रमा की उत्पत्ति की दो कथाएँ प्रसिद्ध हैं। एक के अनुसार वे महर्षि अत्रि और माता अनसूया के पुत्र हैं। दूसरी के अनुसार वे समुद्र-मंथन से प्रकट हुए — इसीलिए स्तोत्र में उन्हें ‘क्षीर-सागर से जन्मे’ कहा गया है। उनकी शीतल किरणें औषधियों में रस भरती हैं, इसलिए वे ‘ओषधीश’ — वनस्पतियों के स्वामी — भी कहलाते हैं।
प्रजापति दक्ष की सत्ताईस कन्याएँ थीं — अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा… यही आकाश के सत्ताईस नक्षत्र हैं। दक्ष ने इन सबका विवाह चंद्रमा से किया। चंद्रमा हर रात लगभग एक नक्षत्र के साथ रहते हैं — यही इस कथा का आकाशीय रूप है।
पर चंद्रमा का मन रोहिणी में ही रमता था। रोहिणी सुंदर थीं, गुणवती थीं, और चंद्रमा अधिकतर समय उन्हीं के साथ बिताते। बाकी छब्बीस बहनें उपेक्षित महसूस करने लगीं। दुखी होकर उन्होंने पिता दक्ष से शिकायत की।
दक्ष ने चंद्रमा को समझाया, ‘सबके साथ समान व्यवहार करो।’ चंद्रमा ने वचन दिया, पर निभा न सके। दूसरी बार भी यही हुआ। तब क्रोधित दक्ष ने शाप दिया — ‘तुम्हें क्षय रोग हो, तुम्हारी कांति दिन-ब-दिन घटती जाए।’
शाप लगते ही चंद्रमा का तेज घटने लगा। उनके क्षीण होने से औषधियाँ सूखने लगीं, रातें अँधेरी हो गईं, जीव-जंतु बेचैन हो उठे। देवता चिंतित होकर चंद्रमा को ब्रह्मा जी के पास ले गए। ब्रह्मा जी ने कहा, ‘इस शाप से केवल भगवान शिव ही उबार सकते हैं। प्रभास क्षेत्र में जाकर उनकी आराधना करो।’
चंद्रमा ने समुद्र के किनारे प्रभास क्षेत्र में शिवलिंग स्थापित किया और कठोर तप किया। मान्यता है कि उन्होंने महामृत्युंजय मंत्र का जप किया। भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
शिव जी बोले, ‘दक्ष का शाप पूरी तरह मिटाया नहीं जा सकता, पर मैं उसे संतुलित कर देता हूँ। एक पक्ष में तुम्हारी कलाएँ घटेंगी और दूसरे पक्ष में फिर बढ़ेंगी।’ यही कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष है — अमावस्या से पूर्णिमा, और पूर्णिमा से अमावस्या।
शिव जी ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। इसीलिए वे ‘चंद्रशेखर’ कहलाए, और चंद्रमा (सोम) के नाथ होने से ‘सोमनाथ’। जहाँ यह हुआ, वहीं आज गुजरात में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग है — बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला।
यह कथा दो बातें सिखाती है। पहली — अपनों के साथ समान व्यवहार और दिए वचन का पालन। दूसरी, और बहुत सुंदर — मन (चंद्रमा) घटता-बढ़ता रहता है। उदासी के दिन स्थायी नहीं होते; अमावस्या के बाद पूर्णिमा फिर आती है।
जीवन और कुंडली में चंद्र
- चंद्र किन बातों का कारक है
- मन, माता, भावनाएँ, मानसिक शांति, नींद, कल्पना-शक्ति, स्मरण-शक्ति, जल, यात्रा, जनता से जुड़ाव
- धातु
- चाँदी
- रत्न
- मोती
चंद्रमा मन का कारक है। वेद का पुरुष सूक्त कहता है कि चंद्रमा परम पुरुष के मन से प्रकट हुआ:
चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत।
ऋग्वेद 10.90.13 (पुरुष सूक्त)
अर्थ:(परम पुरुष के) मन से चंद्रमा उत्पन्न हुआ और नेत्रों से सूर्य।
चंद्रमा माता, घर का सुख, भावनाएँ, नींद, कल्पना, स्मरण-शक्ति, जल-तत्त्व, यात्रा और जनता से जुड़ाव का कारक है। वैदिक ज्योतिष में आपकी ‘राशि’ वास्तव में जन्म के समय चंद्रमा की राशि होती है। साढ़ेसाती और ढैया भी इसी चंद्र-राशि से गिनी जाती हैं।
चंद्रमा सबसे तेज़ चलने वाला ग्रह है — लगभग सवा दो दिन में राशि बदल लेता है। इसीलिए मन भी सबसे जल्दी बदलता है। बलवान चंद्रमा शांत मन, अच्छी याददाश्त, लोगों का प्रेम, कल्पनाशीलता और माँ का आशीर्वाद देता है। ऐसे लोग दूसरों का दुख जल्दी समझ लेते हैं।
कमज़ोर या पीड़ित चंद्र के संकेत
परंपरा में माना जाता है कि जब कुंडली में चंद्रमा कमज़ोर या पीड़ित हो, तो ये बातें अधिक देखने में आती हैं:
- मन बेचैन रहना, बार-बार घबराहट या उदासी
- नींद ठीक से न आना
- माता के स्वास्थ्य की चिंता, या माँ से दूरी
- छोटी बातों पर भावुक हो जाना, बार-बार निर्णय बदलना
- सर्दी-ज़ुकाम, कफ़ या जल से जुड़ी तकलीफ़ें
- भीड़ में भी अकेलापन महसूस होना
- एकाग्रता और याददाश्त में कमी
मन की उदासी के कई कारण होते हैं — थकान, अकेलापन, चिंता या कोई बीमारी। उदासी या घबराहट लंबे समय तक रहे, तो डॉक्टर या परामर्शदाता से बात करना भी उतना ही ज़रूरी है जितना जप-पूजा। चंद्रमा का सही आकलन पूरी कुंडली देखकर ही होता है।
आचरण: जो रोज़ कर सकते हैं
- माता की सेवा करें — उनके पैर छुएँ, उनके साथ समय बिताएँ। चंद्रमा का सबसे बड़ा उपाय माँ का आशीर्वाद है।
- सोमवार को शिवलिंग पर जल, या जल में थोड़ा कच्चा दूध मिलाकर चढ़ाएँ।
- प्यासे को पानी पिलाएँ, हो सके तो गर्मियों में प्याऊ लगवाएँ।
- रात को देर तक जागने से बचें; सोने से पहले कुछ मिनट ध्यान या प्राणायाम करें।
- पूर्णिमा को चंद्रमा के दर्शन करें और चाँदनी में कुछ देर शांत बैठें।
- बहस के समय तुरंत उत्तर न दें — पहले मन को शांत होने दें।
- अपनी भावनाएँ किसी भरोसेमंद से खुलकर कहें; मन में दबाकर न रखें।
मंत्र और जप
ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चन्द्रमसे नमः
अर्थ:बीज-अक्षरों की शक्ति सहित चंद्र देव को नमस्कार।
जप: पूरे अनुष्ठान में 11000 जप (पंडित जी के मार्गदर्शन में)। घर पर सोमवार से शुरू करके रोज़ 1 माला पर्याप्त है।
ॐ इमं देवा असपत्नं सुवध्वं महते क्षत्राय महते ज्यैष्ठ्याय महते जानराज्यायेन्द्रस्येन्द्रियाय। इमममुष्य पुत्रममुष्यै पुत्रमस्यै विश एष वोऽमी राजा सोमोऽस्माकं ब्राह्मणानां राजा॥
अर्थ:हे देवताओ! इस (यजमान) को शत्रु-रहित बनाओ — बड़ी रक्षा-शक्ति, श्रेष्ठता, जन-कल्याणकारी नेतृत्व और इंद्र जैसी तेजस्वी इंद्रियों के लिए। हे प्रजाजनो! यह तुम्हारा राजा है; और सोम (चंद्रमा) हम ज्ञान-साधकों के राजा हैं।
जप: विधिवत् अनुष्ठान में, पंडित जी के साथ।
शुक्ल यजुर्वेद — स्वर-सहित शुद्ध उच्चारण आवश्यक; घर पर बीज या नाम मंत्र सरल है।
ॐ सों सोमाय नमः
अर्थ:अमृत-स्वरूप, मन को शीतलता देने वाले सोम (चंद्र) देव को नमस्कार।
जप: सोमवार को 1 माला, या रात सोने से पहले 11 बार।
दान और व्रत
दान: सोमवार, संध्या के समय
माँ जैसी किसी बुज़ुर्ग स्त्री की सेवा या सहायता भी चंद्रमा का श्रेष्ठ दान माना जाता है।
व्रत
सोमवार का व्रत भगवान शिव के लिए रखा जाता है और चंद्रमा के लिए भी शुभ माना जाता है। सावन के सोमवार विशेष फलदायी हैं।
सोमवार व्रत: विधि और कथारत्न
- मुख्य रत्न
- मोती
- उपरत्न
- चंद्रकांत मणि (मूनस्टोन)
मोती को ‘शांत’ रत्न समझकर लोग बिना पूछे पहन लेते हैं, पर हर कुंडली में यह ठीक नहीं बैठता। बिना कुंडली दिखाए रत्न न पहनें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।