- कब
- हर सोमवार। श्रावण (सावन) मास के सोमवार सबसे विशेष माने जाते हैं। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से, या सावन के पहले सोमवार से आरंभ कर सकते हैं। कई भक्त 16 सोमवार (सोलह सोमवार) का संकल्प लेते हैं।
- पूजनीय
- भगवान शिव और माता पार्वती
- संबंधित ग्रह
- चंद्र ग्रह
अगली तिथियाँ
- 19जुलाई सावन का पहला सोमवारसोमवार · श्रावण मास आरंभ
- 26जुलाई सावन का दूसरा सोमवारसोमवार
- 2अगस्त सावन का तीसरा सोमवारसोमवार · सोमवती अमावस्या भी
- 9अगस्त सावन का चौथा सोमवारसोमवार
- 16अगस्त सावन का पाँचवाँ सोमवारसोमवार
अगली तिथि के लिए पंडित जी से पूछें।
पूरा पंचांग देखेंसोमवार व्रत का महत्व
‘सोम’ का अर्थ है चंद्रमा। चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर विराजते हैं, इसलिए सोमवार शिव जी का दिन माना जाता है। पुराणों में कथा आती है कि जब दक्ष प्रजापति के शाप से चंद्रमा क्षीण होने लगे, तब शिव जी ने ही उन्हें शरण दी और अपने मस्तक पर धारण किया।
भगवान शिव ‘आशुतोष’ हैं, यानी जल्दी प्रसन्न होने वाले। उन्हें न सोने-चाँदी की ज़रूरत है, न बड़े भोग की। एक लोटा जल, थोड़ा दूध और तीन पत्तों वाला बेलपत्र, बस इतने से भोलेनाथ प्रसन्न हो जाते हैं। इसलिए यह व्रत गरीब-अमीर, सबके लिए समान रूप से सरल है।
सोमवार का व्रत मन की शांति, सुखी वैवाहिक जीवन, अच्छे जीवनसाथी की कामना (विशेषकर कुँवारी कन्याओं द्वारा), संतान-सुख और जीवन के संकटों से रक्षा के लिए किया जाता है। ज्योतिष में चंद्रमा मन के कारक हैं, इसलिए जिनका मन बेचैन रहता हो, उनके लिए भी यह व्रत शांति देने वाला माना गया है।
परंपरा में सोमवार के व्रत तीन प्रकार के बताए गए हैं: हर सोमवार का साधारण व्रत, सोम प्रदोष (जब त्रयोदशी तिथि सोमवार को पड़े) और सोलह सोमवार। तीनों की पूजा-विधि लगभग एक जैसी है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सफ़ेद या हल्के रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल-अक्षत लेकर सोमवार व्रत का संकल्प लें।
- शिव मंदिर जाएँ या घर में शिवलिंग या शिव परिवार के चित्र के सामने पूजा करें। सबसे पहले गणेश जी का स्मरण करें।
- शिवलिंग पर धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ, फिर कच्चा दूध, फिर दोबारा जल। अभिषेक करते समय लगातार “ॐ नमः शिवाय” बोलते रहें।
- हो सके तो पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, शक्कर) से अभिषेक करें और अंत में शुद्ध जल से स्नान कराएँ।
- सफ़ेद चंदन से तिलक करें, अक्षत चढ़ाएँ। बेलपत्र इस तरह चढ़ाएँ कि उसकी चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रहे।
- धतूरा, आक के फूल, सफ़ेद फूल और जनेऊ अर्पित करें। माता पार्वती को फूल और श्रृंगार अर्पित करें।
- धूप और घी का दीपक जलाएँ, फल-मिठाई का भोग लगाएँ।
- सोमवार व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “ॐ जय शिव ओंकारा” से आरती करें। फिर शिवलिंग की आधी परिक्रमा करें: जलाधारी (जहाँ से अभिषेक का जल बहता है) को लाँघा नहीं जाता।
- दिन भर मन में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते रहें। परंपरा में सोमवार का व्रत दिन के तीसरे पहर (दोपहर बाद) तक रखा जाता है।
- शाम को पूजा और आरती के बाद एक बार सात्त्विक भोजन करें। कई भक्त इसमें सेंधा नमक लेते हैं या केवल फलाहार करते हैं।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना
- शाम को एक बार सात्त्विक भोजन (सेंधा नमक के साथ)
- भगवान को चढ़ा प्रसाद
क्या न खाएँ
- व्रत का समय पूरा होने तक अन्न
- प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा
- बहुत तीखा, तला और तामसिक भोजन
अन्य नियम
- शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर-कुमकुम और तुलसी नहीं चढ़ाई जाती। ये माता पार्वती और भगवान विष्णु को अर्पित होते हैं।
- केतकी (केवड़ा) का फूल शिव पूजा में नहीं चढ़ाया जाता।
- बेलपत्र एक दिन पहले तोड़कर रख सकते हैं। परंपरा में सोमवार को बेलपत्र नहीं तोड़े जाते।
- किसी पर क्रोध न करें, कटु वचन न बोलें। भोलेनाथ सरलता से ही प्रसन्न होते हैं।
मंत्र
ॐ नमः शिवाय
अर्थ:भगवान शिव को नमस्कार। ये पाँच अक्षर (न-मः-शि-वा-य) शिव जी के सबसे प्रिय माने जाते हैं।
जप: रोज़ कम से कम 1 माला (108 बार), रुद्राक्ष की माला से
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
अर्थ:हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो सुगंध की तरह जीवन को सुंदर बनाते हैं और पोषण देते हैं। जैसे पका हुआ खरबूजा बेल से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के भय से मुक्त करें, पर अमृत (मोक्ष) से नहीं।
जप: रोज़ 1, 3 या 11 बार; रोग-शांति के लिए 1 माला
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
अर्थ:कपूर जैसे गोरे, करुणा के अवतार, संसार के सार, सर्पों के राजा को हार की तरह धारण करने वाले, और भक्तों के हृदय-कमल में सदा बसने वाले भगवान शिव को माता भवानी सहित मैं प्रणाम करता हूँ।
जप: आरती के बाद 1 बार
सोमवार व्रत कथा: साहूकार का पुत्र और शिव जी का वरदान
एक नगर में एक धनी साहूकार रहता था। उसके घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, पर कोई संतान नहीं थी। इसी दुख में वह हर सोमवार व्रत रखता और शाम को शिव मंदिर जाकर पूरी श्रद्धा से दीपक जलाता।
उसकी भक्ति देखकर एक दिन माता पार्वती ने भगवान शिव से कहा, “प्रभु, यह साहूकार आपका सच्चा भक्त है। इसकी मनोकामना पूरी कीजिए।” शिव जी बोले, “हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों के अनुसार फल मिलता है। इसके भाग्य में पुत्र-सुख नहीं है।” पर पार्वती जी ने बार-बार आग्रह किया। अंत में शिव जी ने कहा, “तुम्हारे कहने से मैं इसे पुत्र का वरदान देता हूँ, पर उस बालक की आयु केवल 12 वर्ष होगी।”
साहूकार ने यह बात सुनी। वह न बहुत खुश हुआ, न दुखी। उसने पहले की तरह श्रद्धा से सोमवार का व्रत जारी रखा। समय आने पर उसके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और पूरे घर में खुशियाँ छा गईं।
जब बालक 11 वर्ष का हुआ, तो साहूकार ने उसे विद्या पढ़ने के लिए उसके मामा के साथ काशी भेजा। उसने मामा को बहुत-सा धन दिया और कहा, “रास्ते में जहाँ भी रुको, यज्ञ करवाना, ब्राह्मणों को भोजन कराना और दान देना।” मामा-भांजा ऐसा ही करते हुए आगे बढ़ते गए।
रास्ते में वे एक नगर में पहुँचे, जहाँ राजा की पुत्री का विवाह हो रहा था। जिस राजकुमार से विवाह तय था, वह एक आँख से काना था। उसके पिता को डर था कि यह बात खुल गई तो विवाह टूट जाएगा। उन्होंने साहूकार के सुंदर पुत्र को देखा और मामा से कहा, “विवाह के समय इसे दूल्हा बना दो। मैं तुम्हें बहुत धन दूँगा।” मामा लालच में आ गया और मान गया।
विवाह की सारी रस्में साहूकार के पुत्र के साथ ही हुईं। पर वह बालक सच्चा था। उसे यह छल अच्छा नहीं लगा। विदाई से पहले उसने राजकुमारी की चुनरी के पल्लू पर लिख दिया, “तुम्हारा विवाह मेरे साथ हुआ है। पर जिस राजकुमार के साथ तुम्हें भेजा जाएगा, वह एक आँख से काना है। मैं विद्या पढ़ने काशी जा रहा हूँ।” राजकुमारी ने वह पढ़ा और काने राजकुमार के साथ जाने से मना कर दिया। बारात खाली हाथ लौट गई।
मामा-भांजा काशी पहुँचे। वहाँ बालक विद्या पढ़ने लगा और मामा यज्ञ करवाते रहे। जिस दिन बालक 12 वर्ष का हुआ, उस दिन भी यज्ञ चल रहा था। बालक ने कहा, “मामा जी, मेरी तबीयत ठीक नहीं है।” वह भीतर जाकर लेट गया और शिव जी के वरदान के अनुसार उसके प्राण निकल गए।
मामा ने देखा तो उनका कलेजा फट गया। पर उन्होंने सोचा कि यज्ञ अधूरा न रहे, इसलिए यज्ञ पूरा होने तक अपने आँसू रोके रखे। यज्ञ पूरा होते ही वे फूट-फूटकर रोने लगे। संयोग से उसी समय शिव-पार्वती उधर से जा रहे थे। पार्वती जी ने रोने की आवाज़ सुनी और कहा, “प्रभु, किसी की पीड़ा सुनी नहीं जाती। इसका दुख दूर कीजिए।”
शिव जी ने देखा और कहा, “यह वही साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था। इसकी आयु पूरी हो चुकी है।” पार्वती जी ने विनती की, “प्रभु, इसके माता-पिता ने इतने वर्षों से आपका व्रत किया है। इसके बिना वे कैसे जी पाएँगे? कृपा करके इसे जीवनदान दीजिए।” पार्वती जी के आग्रह और साहूकार की भक्ति को देखकर शिव जी ने बालक को लंबी आयु का वरदान दे दिया। बालक ऐसे उठ बैठा, जैसे नींद से जागा हो।
विद्या पूरी करके मामा-भांजा घर की ओर लौटे। उसी नगर में पहुँचे, तो राजा ने बालक को पहचान लिया। सारी सच्चाई जानकर राजा बहुत प्रसन्न हुए और अपनी पुत्री को बहुत-से धन, दास-दासियों के साथ सम्मान से विदा किया।
उधर साहूकार और उसकी पत्नी ने अन्न-जल छोड़ रखा था और रोज़ छत पर बैठकर बेटे की राह देखते थे। जब उन्होंने बेटे को बहू के साथ आते देखा, तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। उसी रात शिव जी ने साहूकार को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “तुम्हारे सोमवार व्रत और कथा-श्रवण से प्रसन्न होकर मैंने तुम्हारे पुत्र को लंबी आयु दी है।”
कथा आती है कि जो भी श्रद्धा से सोमवार का व्रत करता है और यह कथा पढ़ता या सुनता है, भगवान शिव उसकी मनोकामनाएँ पूरी करते हैं।
कथा का सार: सच्ची भक्ति कर्म की रेखा को भी बदल सकती है, और सच बोलने वाले का साथ स्वयं भगवान देते हैं।
सावन के सोमवार और सोलह सोमवार
सावन के सोमवार
श्रावण मास भगवान शिव को सबसे प्रिय माना गया है। लोक-मान्यता है कि माता पार्वती ने इसी मास में कठोर तप करके शिव जी को पति रूप में पाया था। एक मान्यता यह भी है कि समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को शिव जी ने इसी काल में कंठ में धारण किया और देवताओं ने उनकी तपन शांत करने के लिए जल चढ़ाया। इसीलिए सावन में शिवलिंग पर जल चढ़ाने की परंपरा सबसे बड़ी है।
- सावन के हर सोमवार को व्रत, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक का विशेष महत्व है।
- कई भक्त पूरे सावन एक समय भोजन करते हैं।
- कांवड़ यात्रा भी इसी मास में होती है, जब भक्त पवित्र नदियों का जल लाकर शिवलिंग पर चढ़ाते हैं।
सोलह सोमवार
सोलह सोमवार का अर्थ है लगातार 16 सोमवार का संकल्प। इसे सावन के पहले सोमवार से, या किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले सोमवार से शुरू किया जाता है। मनचाहा जीवनसाथी, विवाह में आ रही अड़चन, दांपत्य की खटास या किसी बड़े संकट से मुक्ति के लिए यह संकल्प लिया जाता है।
- हर सोमवार लगभग एक ही समय पर पूजा करें।
- पूजा-विधि ऊपर बताई विधि जैसी ही है। हर सोमवार सोलह सोमवार की कथा पढ़ें या सुनें।
- परंपरा में गेहूँ के आटे, घी और गुड़ से बना चूरमा प्रसाद के रूप में चढ़ाकर बाँटा जाता है।
- बीच में बीमारी या किसी मजबूरी से कोई सोमवार छूट जाए, तो घबराएँ नहीं। क्षमा-प्रार्थना करके गिनती आगे जोड़ लें।
- 16 सोमवार पूरे होने पर 17वें सोमवार को उद्यापन किया जाता है।
उद्यापन
संकल्प के अनुसार सोमवार पूरे होने पर (सोलह सोमवार में 17वें सोमवार को) उद्यापन करें। उस दिन शिव-पार्वती का विधिवत पूजन, रुद्राभिषेक या ‘ॐ नमः शिवाय’ मंत्र से हवन करवाएँ।
- शिव-पार्वती के रूप में किसी दंपति को आदर से भोजन कराएँ और वस्त्र-दक्षिणा दें।
- सफ़ेद वस्त्र, चावल, दूध, शक्कर और फल दान करें।
- उद्यापन की पूरी विधि के लिए पंडित जी से मार्गदर्शन लें।
सावधानी
सावन में लगातार कई सोमवार उपवास करें तो शरीर की बात सुनें, पानी और तरल भरपूर लें। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग फलाहार या एक समय भोजन के साथ व्रत करें और डॉक्टर की सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। भोलेनाथ भाव देखते हैं, भूख नहीं।
पूजा के अंत में आरती
श्री शिव जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।