॥ आरती संग्रह ॥

15 आरती, पाठ और स्तोत्र, हर एक का PDF

गणेश जी से हनुमान चालीसा तक, सबसे ज़्यादा गाई जाने वाली आरतियाँ, शुद्ध पाठ और सरल भाव के साथ। हर आरती का बड़े अक्षरों वाला PDF, और सबका एक संग्रह।

आरती, पाठ और स्तोत्र

आरती

पाठ और स्तुति

संस्कृत स्तोत्र

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सम्पूर्ण आरती संग्रहसभी 15 आरती-पाठ, एक PDF में
श्री गणेश जी की आरतीजय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
श्री हनुमान जी की आरतीआरती कीजै हनुमान लला की
श्री शिव जी की आरतीॐ जय शिव ओंकारा
श्री जगदीश जी की आरतीॐ जय जगदीश हरे
श्री लक्ष्मी जी की आरतीॐ जय लक्ष्मी माता
श्री अम्बे जी की आरतीजय अम्बे गौरी
श्री कुंजबिहारी जी की आरतीआरती कुंजबिहारी की
श्री राम स्तुतिश्री रामचंद्र कृपालु भजु मन
श्री हनुमान चालीसाजय हनुमान ज्ञान गुन सागर
संकटमोचन हनुमानाष्टकबाल समय रबि भक्षि लियो तब
लिङ्गाष्टकम्ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम्
शिव पञ्चाक्षर स्तोत्रनागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय
संकटनाशन गणेश स्तोत्रप्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम्
महालक्ष्म्यष्टकम्नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते

आरती कैसे करें

आरती क्या है

आरती को शास्त्रों में ‘नीराजन’ कहा गया है, यानी दीपक की ज्योति से भगवान का स्वागत करना और उनकी छवि को प्रेम से निहारना। आरती पूजा का समापन है। दिन भर की भागदौड़ के बीच ये वे कुछ पल हैं, जब पूरा परिवार एक साथ भगवान के सामने खड़ा होता है।

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं यत्कृतं पूजनं हरेः। सर्वं सम्पूर्णतामेति कृते नीराजने शिवे॥

स्कंद पुराण (परंपरा में उद्धृत)

अर्थ:भगवान की पूजा में कोई मंत्र छूट जाए या कोई विधि अधूरी रह जाए, तो भी श्रद्धा से की गई मंगलमय आरती से वह पूजा पूरी मानी जाती है।

कब करें: सुबह की पूजा के बाद, और शाम को सूर्यास्त के समय (संध्या आरती)। हर व्रत, कथा, पाठ और हवन के अंत में भी आरती होती है। घर में रोज़ एक बार नियम से की गई आरती भी पर्याप्त है; नियम संख्या से ज़्यादा ज़रूरी है।

आरती की थाली कैसे सजाएँ

  • घी का दीपक (एक, पाँच या अधिक बत्तियों वाला) या कपूर
  • घंटी, और हो सके तो शंख
  • फूल, अक्षत (साबुत चावल), रोली या कुमकुम
  • धूप या अगरबत्ती
  • जल से भरा छोटा लोटा
  • प्रसाद: मिठाई, फल या मिश्री

आरती करने का पारंपरिक क्रम

  1. दीपक जलाकर थाली दाहिने हाथ में लें और बाएँ हाथ से धीरे-धीरे घंटी बजाएँ।
  2. पहले भगवान के चरणों की ओर 4 बार आरती घुमाएँ।
  3. फिर नाभि की ओर 2 बार।
  4. फिर मुख की ओर 1 बार।
  5. अंत में पूरी मूर्ति या चित्र के चारों ओर 7 बार। आरती घड़ी की सुई की दिशा में, स्थिर लय में घुमाएँ; जल्दबाज़ी न करें।
  6. आरती पूरी होने पर थाली के चारों ओर थोड़ा जल घुमाकर उसे शीतल करें और नीचे रखें।
  7. सब लोग दोनों हाथ ज्योति के ऊपर से ले जाकर आँखों और सिर से लगाएँ। इसे ‘आरती लेना’ कहते हैं।
  8. प्रसाद बाँटें, और अंत में पूजा में हुई किसी भूल के लिए भगवान से क्षमा माँगें।

सबसे ज़रूरी है भाव। सुर न सधे या शब्द अटकें, तो भी संकोच न करें; भगवान भाव देखते हैं, आवाज़ नहीं। बच्चों को साथ खड़ा करें, ताकि यह संस्कार अगली पीढ़ी तक पहुँचे। दीपक और कपूर जलाते समय दुपट्टे, पर्दों और छोटे बच्चों का ध्यान रखें।