ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे। भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
जो ध्यावे फल पावे, दुःख बिनसे मन का, स्वामी दुःख बिनसे मन का।सुख संपति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
मात पिता तुम मेरे, शरण गहूँ किसकी, स्वामी शरण गहूँ मैं किसकी।तुम बिन और न दूजा, आस करूँ जिसकी॥
तुम पूरण परमात्मा, तुम अंतर्यामी, स्वामी तुम अंतर्यामी।पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सब के स्वामी॥
तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता, स्वामी तुम पालनकर्ता।मैं मूरख फलकामी, मैं सेवक तुम स्वामी, कृपा करो भर्ता॥
तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति, स्वामी सबके प्राणपति।किस विधि मिलूँ दयामय, तुमको मैं कुमति॥
दीनबंधु दुखहर्ता, ठाकुर तुम मेरे, स्वामी रक्षक तुम मेरे।अपने हाथ उठाओ, अपने शरण लगाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
विषय-विकार मिटाओ, पाप हरो देवा, स्वामी पाप हरो देवा।श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
सरल भाव
यह आरती पंजाब के पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी जी ने 19वीं सदी में लिखी थी। आज उत्तर भारत में शायद ही कोई पूजा हो, जो इसके बिना पूरी होती हो। ‘जगदीश’ का अर्थ है, पूरे जगत के ईश्वर।
टेक और पहला पद: हे जगत के स्वामी, आपकी जय हो! आप भक्तों और सेवकों के संकट पल भर में दूर कर देते हैं। जो आपका ध्यान करता है, उसे फल मिलता है, मन का दुख मिटता है, घर में सुख-संपत्ति आती है और तन के कष्ट दूर होते हैं।
दूसरा और तीसरा पद: आप ही मेरे माता-पिता हैं; आपके सिवा मैं किसकी शरण लूँ? आपके बिना कोई दूसरा नहीं, जिससे आशा रखूँ। आप पूर्ण परमात्मा हैं, सबके मन की जानने वाले (अंतर्यामी) हैं, परब्रह्म परमेश्वर और सबके स्वामी हैं।
चौथा और पाँचवाँ पद: आप करुणा के सागर और सबका पालन करने वाले हैं। मैं मूर्ख हूँ और फल की इच्छा रखता हूँ; मैं सेवक हूँ और आप स्वामी, मुझ पर कृपा कीजिए। आप एक हैं, इंद्रियों से परे (अगोचर) हैं और सबके प्राणों के स्वामी हैं। हे दयामय, मैं कम बुद्धि वाला आपसे किस विधि से मिलूँ?
छठा और सातवाँ पद: आप दीनों के बंधु, दुख हरने वाले और मेरे रक्षक हैं। अपना हाथ उठाइए, मुझे अपनी शरण में लीजिए, मैं आपके द्वार पर पड़ा हूँ। मेरे मन से विषयों के विकार (लोभ, क्रोध, मोह) मिटाइए, पाप हरिए, और मेरी श्रद्धा-भक्ति तथा संतों की सेवा का भाव बढ़ाइए।
ध्यान दें, आरती के अंत में भक्त धन या पद नहीं माँगता; वह श्रद्धा, भक्ति और सेवा का भाव माँगता है। यही इस आरती की सबसे सुंदर सीख है।
आरती की विधि
घी का दीपक या कपूर जलाकर, घंटी बजाते हुए आरती करें। पारंपरिक क्रम है: भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार, और फिर पूरे विग्रह पर 7 बार आरती घुमाएँ। अंत में आरती पर जल घुमाकर सबको आरती दें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।