॥ मासिक व्रत ॥ भगवान श्री विष्णु

एकादशी व्रत

सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाने वाला भगवान विष्णु का व्रत: मन की शुद्धि, इंद्रियों पर संयम और भक्ति के लिए। चावल वर्जित, और द्वादशी को समय पर पारण।

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कब
हर महीने दो बार: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी (ग्यारहवीं तिथि)। साल में 24 एकादशी होती हैं, और जिस वर्ष अधिक मास हो उसमें 26। व्रत दशमी की शाम से शुरू होकर द्वादशी के पारण पर पूरा होता है। एकादशी व्रत आरंभ करने के लिए मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की उत्पन्ना एकादशी सबसे उत्तम मानी जाती है।
पूजनीय
भगवान श्री विष्णु

अगली तिथियाँ

  1. 5नवंबर रमा एकादशीगुरुवार
  2. 20नवंबर देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशीशुक्रवार · तुलसी विवाह और वैष्णव एकादशी 21 नवंबर
  3. 4दिसंबर उत्पन्ना एकादशीशुक्रवार
  4. 20दिसंबर मोक्षदा एकादशीरविवार · गीता जयंती भी
  5. 3जनवरी सफला एकादशीरविवार
  6. 18जनवरी पौष पुत्रदा एकादशीसोमवार · वैष्णव एकादशी 19 जनवरी
  7. 2फ़रवरी षटतिला एकादशीमंगलवार
  8. 17फ़रवरी जया एकादशीबुधवार
  9. 4मार्च विजया एकादशीगुरुवार
  10. 18मार्च आमलकी एकादशीगुरुवार
  11. 2अप्रैल पापमोचनी एकादशीशुक्रवार
  12. 17अप्रैल कामदा एकादशीशनिवार
पूरा पंचांग देखें

एकादशी व्रत का महत्व

पुराणों में एकादशी को सभी व्रतों में श्रेष्ठ बताया गया है। यह भगवान विष्णु का सबसे प्रिय व्रत है। हर पंद्रह दिन में आने वाली यह तिथि हमें याद दिलाती है कि जीवन की भागदौड़ के बीच एक दिन अपने मन और शरीर को विश्राम देकर भगवान के पास बैठें।

एकादशी का अर्थ है ग्यारह। एक सुंदर व्याख्या यह है कि हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (आँख, कान, नाक, जीभ, त्वचा), पाँच कर्मेंद्रियाँ (हाथ, पैर, वाणी आदि) और ग्यारहवाँ मन, इन ग्यारहों को वश में करने का दिन ही एकादशी है।

यह व्रत पापों से मुक्ति, मन की शांति, घर में सुख-समृद्धि और भगवान की भक्ति पाने के लिए किया जाता है। हर एकादशी का अपना नाम, अपनी कथा और अपना विशेष फल है, जैसे निर्जला एकादशी, देवशयनी, देवउठनी और मोक्षदा एकादशी।

एकादशी में पारण का बहुत महत्व है। राजा अंबरीष की प्रसिद्ध कथा बताती है कि एकादशी का व्रत जितना ज़रूरी है, द्वादशी को समय पर पारण भी उतना ही ज़रूरी है। श्रद्धा, संयम और नियम, तीनों मिलकर ही एकादशी को पूर्ण बनाते हैं।

पूजा सामग्री

  • भगवान विष्णु या ठाकुर जी की मूर्ति अथवा चित्र
  • पीला वस्त्र और पीला आसन
  • पीले फूल
  • तुलसी दल (एक दिन पहले तोड़कर रखें)
  • पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • चंदन, रोली
  • धूप, घी का दीपक, कपूर
  • फल, मेवा, मिश्री (भोग के लिए)
  • गंगाजल (हो तो)
  • शंख (हो तो)
  • विष्णु सहस्रनाम या गीता की पुस्तक

व्रत और पूजा की विधि

  1. दशमी (एक दिन पहले) की शाम को हल्का, सात्त्विक भोजन करें और मन में अगले दिन के व्रत का निश्चय करें।
  2. एकादशी को ब्रह्ममुहूर्त में उठें, स्नान करें और पीले या स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  3. हाथ में जल-अक्षत-फूल लेकर संकल्प लें। अपनी शक्ति के अनुसार तय करें: निर्जला, केवल जल वाला, फलाहारी या एक समय फलाहार।
  4. भगवान विष्णु को पंचामृत से स्नान कराएँ, फिर शुद्ध जल से। पीले वस्त्र, चंदन, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
  5. धूप और घी का दीपक जलाएँ। फल, मेवा और मिश्री का भोग लगाएँ और हर भोग पर तुलसी दल रखें।
  6. उस एकादशी विशेष की कथा पढ़ें या सुनें।
  7. “ॐ जय जगदीश हरे” से आरती करें।
  8. दिन भर ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप, विष्णु सहस्रनाम या गीता का पाठ और भजन-कीर्तन करें।
  9. दिन में न सोएँ। संभव हो तो रात को भजन-कीर्तन के साथ जागरण करें।
  10. द्वादशी की सुबह स्नान करके भगवान की पूजा करें।
  11. किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन कराएँ या अन्न-दक्षिणा दें।
  12. पंचांग में दिए पारण-समय के भीतर व्रत खोलें। द्वादशी तिथि के पहले चौथाई भाग (हरि वासर) में पारण नहीं किया जाता, और द्वादशी समाप्त होने से पहले पारण कर लेना चाहिए।
  13. पारण भगवान के प्रसाद और तुलसी दल से करें। पारण में चावल ग्रहण किया जा सकता है।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • फल, दूध, दही, मेवे, मखाना
  • साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े या राजगिरा का आटा
  • आलू, शकरकंद, अरबी
  • सेंधा नमक

क्या न खाएँ

  • चावल और चावल से बनी हर चीज़ (एकादशी का सबसे प्रमुख नियम)
  • गेहूँ, दालें और अन्य अनाज
  • प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा
  • सामान्य नमक

अन्य नियम

  • एकादशी के दिन तुलसी के पत्ते नहीं तोड़े जाते। एक दिन पहले तोड़कर रख लें।
  • किसी की निंदा, झूठ और क्रोध से बचें।
  • दिन में सोने से बचें।
  • कभी-कभी एक ही एकादशी दो दिन बताई जाती है: स्मार्त और वैष्णव। अपनी पारिवारिक परंपरा या पंडित जी की सलाह के अनुसार दिन चुनें।

मंत्र

द्वादशाक्षर मंत्र

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

अर्थ:सबमें बसने वाले भगवान वासुदेव (श्री विष्णु) को नमस्कार। यही मंत्र नारद जी ने बालक ध्रुव को दिया था।

जप: एकादशी को कम से कम 1 माला, हो सके तो 11 माला, तुलसी की माला से

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
विष्णु ध्यान

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्। लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥

अर्थ:जिनका स्वरूप शांत है, जो शेषनाग की शय्या पर सोते हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो देवताओं के स्वामी हैं, सारे संसार का आधार हैं, आकाश की तरह सर्वत्र व्याप्त हैं, बादल जैसे श्याम रंग और सुंदर अंगों वाले हैं, लक्ष्मी जी के पति, कमल जैसे नेत्रों वाले, जिन्हें योगी ध्यान से पाते हैं, जो संसार के भय को हरने वाले और सब लोकों के एकमात्र स्वामी हैं, उन भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूँ।

जप: पूजा के आरंभ में 1 बार

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
व्रत-कथा

एकादशी की उत्पत्ति: मुर दैत्य और एकादशी देवी

पुराणों में कथा आती है कि सतयुग में मुर नाम का एक बहुत बलवान और क्रूर दैत्य था। उसने अपनी शक्ति से इंद्र आदि सभी देवताओं को हराकर स्वर्ग से निकाल दिया। दुखी देवता पहले भगवान शिव के पास गए। शिव जी ने कहा, “इस दैत्य का अंत भगवान विष्णु ही करेंगे। आप उनकी शरण में जाइए।”

देवता क्षीरसागर पहुँचे और भगवान विष्णु की स्तुति करके अपनी व्यथा सुनाई। भगवान ने देवताओं को अभय दिया और मुर से युद्ध करने चल पड़े। युद्ध बहुत लंबा चला। भगवान ने मुर की पूरी असुर-सेना का नाश कर दिया, पर मुर स्वयं हार मानने को तैयार नहीं था।

लंबे युद्ध के बाद भगवान विश्राम के लिए बदरिकाश्रम चले गए। वहाँ हेमवती नाम की एक विशाल गुफा थी, जिसका केवल एक ही द्वार था। भगवान उस गुफा में जाकर योगनिद्रा में लेट गए।

मुर पीछा करता हुआ उस गुफा तक पहुँच गया। उसने भगवान को सोते देखा तो सोचा, यही अवसर है। जैसे ही उसने भगवान पर वार करने के लिए हथियार उठाया, उसी क्षण भगवान के शरीर से एक अत्यंत तेजस्वी और सुंदर कन्या प्रकट हुई। उसके हाथों में दिव्य अस्त्र-शस्त्र चमक रहे थे।

उस कन्या ने मुर को युद्ध के लिए ललकारा। दोनों में भयंकर युद्ध हुआ और अंत में उस कन्या ने मुर का वध कर दिया। जब भगवान योगनिद्रा से जागे, तो उन्होंने मरे हुए दैत्य और सामने खड़ी उस दिव्य कन्या को देखा। कन्या ने सारी बात बताई।

भगवान बहुत प्रसन्न हुए और बोले, “देवी, तुम मेरे शरीर से एकादशी तिथि को प्रकट हुई हो, इसलिए तुम्हारा नाम ‘एकादशी’ होगा। तुमने देवताओं की रक्षा की है, इसलिए वर माँगो।” एकादशी देवी ने कहा, “प्रभु, जो भी मेरे दिन श्रद्धा से व्रत करे, उसके पाप नष्ट हों और उसे आपकी भक्ति मिले।” भगवान ने कहा, “ऐसा ही होगा। एकादशी का व्रत करने वाला मुझे सबसे प्रिय होगा।”

यह घटना मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुई थी, इसलिए उसे ‘उत्पन्ना एकादशी’ कहते हैं, यानी वह दिन जब एकादशी देवी उत्पन्न हुईं। इसीलिए जो लोग एकादशी का व्रत शुरू करना चाहते हैं, उन्हें उत्पन्ना एकादशी से आरंभ करने की सलाह दी जाती है।

राजा अंबरीष की निष्ठा: पारण का महत्व

श्रीमद्भागवत में राजा अंबरीष की कथा आती है, जो भगवान के परम भक्त थे और नियम से एकादशी का व्रत करते थे। एक बार द्वादशी के दिन, जब वे पारण करने वाले थे, महर्षि दुर्वासा अपने शिष्यों के साथ अतिथि बनकर आए। राजा ने उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया। दुर्वासा जी स्नान के लिए नदी पर गए और बहुत देर तक नहीं लौटे।

इधर पारण का समय निकलने लगा। राजा धर्मसंकट में पड़ गए: अतिथि से पहले भोजन करें तो अपमान, और समय पर पारण न करें तो व्रत भंग। ब्राह्मणों की सलाह से उन्होंने केवल थोड़ा-सा जल पीकर पारण कर लिया, क्योंकि जल पीना भोजन भी है और नहीं भी। दुर्वासा जी लौटे तो यह जानकर क्रोधित हो गए और राजा को दंड देने के लिए एक भयानक कृत्या उत्पन्न की।

पर राजा अंबरीष हाथ जोड़े शांत खड़े रहे। तभी भगवान का सुदर्शन चक्र प्रकट हुआ। उसने कृत्या को नष्ट कर दिया और दुर्वासा जी का पीछा करने लगा। दुर्वासा जी ब्रह्मा, शिव और स्वयं विष्णु के पास गए। भगवान विष्णु ने कहा, “मैं अपने भक्तों के अधीन हूँ। आप अंबरीष से ही क्षमा माँगिए।” दुर्वासा जी लौटे और अंबरीष के चरणों में गिर पड़े। राजा ने विनम्रता से चक्र की स्तुति की और चक्र शांत हो गया। पूरे समय राजा भूखे रहकर दुर्वासा जी की प्रतीक्षा करते रहे थे।

कथा का सार: एकादशी का व्रत भगवान को बहुत प्रिय है, और जो भक्त विनम्रता से नियम निभाता है, उसकी रक्षा स्वयं भगवान करते हैं।

साल की 24 एकादशियाँ

नीचे उत्तर भारत में प्रचलित पूर्णिमांत पंचांग के अनुसार हर महीने की एकादशी दी गई है। हर एकादशी की अपनी कथा और महिमा है।

  • चैत्र कृष्ण: पापमोचनी एकादशी, पापों से मुक्ति देने वाली मानी जाती है।
  • चैत्र शुक्ल: कामदा एकादशी, हिंदू नव वर्ष की पहली एकादशी, कामनाएँ पूरी करने वाली।
  • वैशाख कृष्ण: वरूथिनी एकादशी। ‘वरूथ’ का अर्थ है कवच, यह रक्षा करने वाली मानी जाती है।
  • वैशाख शुक्ल: मोहिनी एकादशी, भगवान के मोहिनी रूप से जुड़ी।
  • ज्येष्ठ कृष्ण: अपरा एकादशी, अपार पुण्य देने वाली।
  • ज्येष्ठ शुक्ल: निर्जला एकादशी, बिना जल के रखी जाने वाली, सबसे कठिन एकादशी।
  • आषाढ़ कृष्ण: योगिनी एकादशी।
  • आषाढ़ शुक्ल: देवशयनी एकादशी। मान्यता है कि इस दिन से भगवान विष्णु चार मास की योगनिद्रा में जाते हैं और चातुर्मास शुरू होता है।
  • श्रावण कृष्ण: कामिका एकादशी, सावन की पहली एकादशी।
  • श्रावण शुक्ल: पुत्रदा (पवित्रा) एकादशी, संतान की कामना से रखी जाती है।
  • भाद्रपद कृष्ण: अजा एकादशी, इसकी कथा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र से जुड़ी है।
  • भाद्रपद शुक्ल: परिवर्तिनी (पद्मा या जलझूलनी) एकादशी। मान्यता है कि इस दिन योगनिद्रा में भगवान करवट बदलते हैं। राजस्थान में इस दिन ठाकुर जी की जलझूलनी शोभायात्रा निकलती है।
  • आश्विन कृष्ण: इंदिरा एकादशी, पितृ पक्ष में आती है और पितरों की सद्गति के लिए रखी जाती है।
  • आश्विन शुक्ल: पापांकुशा एकादशी, पापों पर अंकुश लगाने वाली।
  • कार्तिक कृष्ण: रमा एकादशी, दीपावली से पहले आती है। रमा माता लक्ष्मी का नाम है।
  • कार्तिक शुक्ल: देवउठनी (प्रबोधिनी) एकादशी। भगवान योगनिद्रा से जागते हैं, चातुर्मास समाप्त होता है, तुलसी विवाह होता है और विवाह के शुभ मुहूर्त फिर शुरू होते हैं।
  • मार्गशीर्ष कृष्ण: उत्पन्ना एकादशी, एकादशी देवी के प्रकट होने का दिन। व्रत आरंभ करने के लिए सबसे उत्तम।
  • मार्गशीर्ष शुक्ल: मोक्षदा एकादशी। इसी दिन गीता जयंती मनाई जाती है।
  • पौष कृष्ण: सफला एकादशी, कामों में सफलता देने वाली।
  • पौष शुक्ल: पुत्रदा एकादशी, संतान-सुख की कामना से।
  • माघ कृष्ण: षटतिला एकादशी। इसमें तिल का छह प्रकार से उपयोग होता है: तिल से स्नान, तिल का उबटन, तिल से हवन, तिल-जल से तर्पण, तिल का भोजन और तिल का दान।
  • माघ शुक्ल: जया एकादशी।
  • फाल्गुन कृष्ण: विजया एकादशी। कथा आती है कि भगवान श्रीराम ने लंका जाने से पहले यह व्रत किया था।
  • फाल्गुन शुक्ल: आमलकी एकादशी, इसमें आँवले के पेड़ की पूजा होती है।
  • अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में: पद्मिनी एकादशी (शुक्ल पक्ष) और परमा एकादशी (कृष्ण पक्ष)।

निर्जला एकादशी: भीमसेनी एकादशी

कथा आती है कि पांडवों में भीमसेन को भूख बिल्कुल सहन नहीं होती थी, इसलिए वे एकादशी का व्रत नहीं कर पाते थे। उन्होंने महर्षि वेदव्यास से उपाय पूछा। व्यास जी ने कहा, “साल में केवल एक, ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की एकादशी को बिना अन्न और जल के व्रत कर लो। इससे सभी एकादशियों का फल मिल जाता है।” भीमसेन ने ऐसा ही किया, इसलिए इसे भीमसेनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन जल से भरे घड़े, पंखे और छाते का दान बहुत पुण्यकारी माना जाता है।

निर्जला एकादशी भीषण गर्मी में आती है। बुज़ुर्ग, बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ और नियमित दवा लेने वाले लोग निर्जला व्रत न रखें। वे जल और फलाहार के साथ व्रत करें। चक्कर, कमज़ोरी या घबराहट हो तो तुरंत पानी पिएँ।

उद्यापन

जितनी एकादशियों या वर्षों का संकल्प लिया हो, वह पूरा होने पर किसी शुभ एकादशी (प्रायः उत्पन्ना, मोक्षदा या देवउठनी) पर उद्यापन किया जाता है।

  • भगवान विष्णु का विधिवत पूजन और विष्णु मंत्रों से हवन करवाएँ।
  • द्वादशी को सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ।
  • पीले वस्त्र, अन्न, फल, जल से भरे कलश और दक्षिणा दान करें।
  • उद्यापन की पूरी विधि पंडित जी से पूछकर करें।

सावधानी

एकादशी में अपनी शक्ति के अनुसार ही व्रत का प्रकार चुनें। निर्जला व्रत हर किसी के लिए नहीं है। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग, बच्चे और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग फलाहार के साथ व्रत करें और डॉक्टर की सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। पारण के समय एकदम भारी भोजन न करें।

पूजा के अंत में आरती

श्री जगदीश जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।