गुरु (बृहस्पति) देव की स्तुति
देवानां च ऋषीणां च गुरुं काञ्चनसन्निभम्। बुद्धिभूतं त्रिलोकेशं तं नमामि बृहस्पतिम्॥
नवग्रह स्तोत्र — महर्षि वेदव्यास
अर्थ:देवताओं और ऋषियों के गुरु, सोने जैसी कांति वाले, बुद्धि के साक्षात् स्वरूप और तीनों लोकों के स्वामी बृहस्पति देव को मैं नमस्कार करता हूँ।
अंगिरा के पुत्र, और इंद्र का अहंकार
बृहस्पति देव ब्रह्मा जी के मानस-पुत्र महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं। बचपन से ही उनकी बुद्धि अद्भुत थी। वेदों में उन्हें ‘ब्रह्मणस्पति’ — वाणी और प्रार्थना के स्वामी — कहा गया है, और ऋग्वेद में उनके अनेक सूक्त हैं।
कथा आती है कि बृहस्पति ने काशी में शिवलिंग स्थापित कर हज़ारों वर्षों तक कठोर तप किया। भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और वरदान दिया — ‘तुम देवताओं के गुरु बनोगे, और ग्रहों में तुम्हें सबसे पूजनीय स्थान मिलेगा।’ तभी से वे ‘देवगुरु’ कहलाए।
जब इंद्र ने गुरु का अनादर किया
श्रीमद्भागवत में एक प्रसंग आता है। एक बार देवराज इंद्र अपनी सभा में ऐश्वर्य के मद में डूबे बैठे थे। अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं, गंधर्व गा रहे थे। उसी समय देवगुरु बृहस्पति सभा में पधारे। सारी सभा उठ खड़ी हुई, पर इंद्र अहंकार में अपने सिंहासन से नहीं उठे — न प्रणाम किया, न आसन दिया।
बृहस्पति ने कुछ नहीं कहा। वे चुपचाप लौट गए और योग-बल से अदृश्य हो गए। थोड़ी देर में इंद्र को अपनी भूल का एहसास हुआ। वे घबराकर गुरु को ढूँढने निकले, पर गुरु कहीं नहीं मिले।
गुरु के बिना देवताओं का मार्गदर्शन टूट गया। यह ख़बर दैत्यों तक पहुँची। अपने गुरु शुक्राचार्य की सलाह पर उन्होंने स्वर्ग पर आक्रमण किया, और गुरु-विहीन देवता बुरी तरह हार गए। तब देवता ब्रह्मा जी की शरण में गए। ब्रह्मा जी ने कहा, ‘तुमने अपने गुरु का अपमान किया, उसी का यह फल है। ज्ञान का अनादर करने वाले की शक्ति स्थिर नहीं रहती।’
इंद्र ने सच्चे मन से पश्चाताप किया। समय आने पर देवताओं को फिर से मार्गदर्शन और विजय मिली, और बृहस्पति देव पुनः देवताओं के बीच पूजित हुए।
बृहस्पति से जुड़ी दो और कथाएँ इसी वेबसाइट पर हैं — उनकी पत्नी तारा और चंद्रमा की कथा (बुध के पृष्ठ पर), और उनके पुत्र कच की कथा, जिन्होंने शुक्राचार्य से संजीवनी विद्या सीखी (शुक्र के पृष्ठ पर)।
सीख यह है कि पद और धन से बड़ा ज्ञान है, और ज्ञान से बड़ा है ज्ञान देने वाले का सम्मान। जिस घर में गुरु, माता-पिता और बड़ों का आदर होता है, वहाँ गुरु ग्रह अपने-आप प्रसन्न रहते हैं।
जीवन और कुंडली में गुरु (बृहस्पति)
- गुरु (बृहस्पति) किन बातों का कारक है
- ज्ञान, धर्म, गुरु और शिक्षक, शिक्षा, संतान, विवाह-सुख, भाग्य, धन-समृद्धि, सही सलाह, न्याय, उदारता
- धातु
- सोना
- रत्न
- पुखराज
गुरु ज्ञान, विवेक, धर्म और आस्था के कारक हैं। गुरु, शिक्षक, पुरोहित, सलाहकार, न्याय-व्यवस्था, शिक्षा, संतान, भाग्य, धन और जीवन का विस्तार — ये सब गुरु से देखे जाते हैं। पारंपरिक ज्योतिष में स्त्री की कुंडली में विवाह-सुख का विचार भी गुरु से होता है।
गुरु एक राशि में लगभग एक साल रहते हैं और बारह साल में सब राशियों का चक्र पूरा करते हैं। विवाह, संतान और बड़े शुभ कामों के समय गुरु का गोचर विशेष रूप से देखा जाता है। कुंभ मेले का समय भी बृहस्पति की राशि से ही तय होता है।
बलवान गुरु वाला व्यक्ति धर्मपरायण, उदार, सही सलाह देने वाला और सबका भला चाहने वाला होता है। ऐसे व्यक्ति के पास लोग मार्गदर्शन के लिए आते हैं। गुरु की शुभ दृष्टि कुंडली के कई दोषों को हल्का कर देती है — इसीलिए कहा जाता है, ‘गुरु की दृष्टि अमृत समान’।
कमज़ोर या पीड़ित गुरु (बृहस्पति) के संकेत
परंपरा में माना जाता है कि जब कुंडली में गुरु कमज़ोर या पीड़ित हो, तो ये बातें अधिक देखने में आती हैं:
- बड़ों और गुरुजनों की सलाह अच्छी न लगना
- पढ़ाई बीच में छूट जाना, या मन भटकना
- संतान से जुड़ी चिंता
- विवाह में देरी
- सही निर्णय न ले पाना, ग़लत लोगों की सलाह पर चल पड़ना
- धन आता है पर टिकता नहीं
- पाचन, लीवर या मोटापे से जुड़ी परेशानी (इनमें पहले डॉक्टर की सलाह लें)
ये संकेत कई कारणों से हो सकते हैं, केवल गुरु से नहीं। विवाह या संतान में देरी जैसे विषयों पर पूरी कुंडली और दशा देखकर ही बात की जानी चाहिए — और ज़रूरत हो तो डॉक्टर की सलाह भी साथ में।
आचरण: जो रोज़ कर सकते हैं
- माता-पिता, गुरु, शिक्षक, पुजारी और बुज़ुर्गों का सम्मान करें — यही गुरु का पहला उपाय है।
- गुरुवार को केले के पेड़ की पूजा करें और भगवान विष्णु को पीले फूल चढ़ाएँ।
- जो जानते हैं, वह दूसरों को सिखाएँ — ज्ञान बाँटने से गुरु बढ़ते हैं।
- माथे पर केसर या हल्दी का तिलक लगाएँ।
- छल-कपट की कमाई से बचें; धर्म और वचन का पालन करें।
- गुरुवार को विष्णु सहस्रनाम का पाठ, या ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें।
मंत्र और जप
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
अर्थ:बीज-शक्ति सहित देवगुरु बृहस्पति को नमस्कार।
जप: पूरे अनुष्ठान में 19000 जप (पंडित जी के मार्गदर्शन में)। घर पर गुरुवार से शुरू करके रोज़ 1 माला पर्याप्त है।
ॐ बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु। यद्दीदयच्छवस ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्॥
अर्थ:हे बृहस्पति देव! जो धन श्रेष्ठ जनों के योग्य है, जो तेज से चमकता है और लोगों में बुद्धि व कर्म-शक्ति के साथ शोभित होता है, जो बल से दमकता है — हे सत्य से उत्पन्न देव! वही अद्भुत धन हमें प्रदान कीजिए।
जप: विधिवत् अनुष्ठान में, पंडित जी के साथ।
ऋग्वेद 2.23.15 — स्वर-सहित शुद्ध उच्चारण आवश्यक; घर पर बीज या नाम मंत्र सरल है।
ॐ बृं बृहस्पतये नमः
अर्थ:ज्ञान-स्वरूप बृहस्पति देव को नमस्कार।
जप: गुरुवार को 1 माला।
दान और व्रत
दान: गुरुवार
किसी गुरु, शिक्षक या पुरोहित की सेवा और सम्मान — गुरु ग्रह का सबसे बड़ा दान है।
व्रत
गुरुवार (बृहस्पतिवार) का व्रत भगवान विष्णु और बृहस्पति देव के लिए रखा जाता है — पीले वस्त्र, चने की दाल और गुड़ का प्रसाद।
गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत: विधि और कथारत्न
- मुख्य रत्न
- पुखराज (पीला नीलम)
- उपरत्न
- सुनैला (सिट्रीन)
पुखराज को लोग ‘सबसे शुभ’ मानकर पहन लेते हैं, पर कुछ लग्नों के लिए गुरु बाधक भी माने जाते हैं। बिना कुंडली दिखाए रत्न न पहनें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।