- कब
- हर गुरुवार। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले गुरुवार से आरंभ करना शुभ माना जाता है; कई परिवारों में पौष मास में इसे आरंभ नहीं करते। अधिकतर भक्त 16 गुरुवार का संकल्प लेते हैं, कुछ एक या तीन वर्ष तक भी रखते हैं।
- पूजनीय
- भगवान विष्णु और देवगुरु बृहस्पति
- संबंधित ग्रह
- गुरु (बृहस्पति) ग्रह
गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत का महत्व
गुरुवार देवताओं के गुरु बृहस्पति का दिन है, और इस दिन भगवान विष्णु की पूजा का भी विशेष महत्व है। बृहस्पति ज्ञान, धर्म, सद्बुद्धि, गुरु-कृपा, संतान और धन-धान्य के कारक माने जाते हैं। जिस घर पर गुरु की कृपा हो, वहाँ विवेक भी रहता है और लक्ष्मी भी।
यह व्रत घर में सुख-समृद्धि, पढ़ाई में सफलता, संतान-सुख और विशेष रूप से विवाह की कामना से किया जाता है। ज्योतिष में कन्याओं के विवाह-सुख के लिए गुरु ग्रह का बड़ा महत्व माना गया है, इसलिए बहुत-सी कन्याएँ और माताएँ यह व्रत रखती हैं।
इस व्रत में पीले रंग का बहुत महत्व है: पीले वस्त्र, पीले फूल, हल्दी, चने की दाल और पीला भोजन। केले के पेड़ में भगवान विष्णु का वास माना जाता है, इसलिए इस दिन केले के पेड़ की पूजा की जाती है।
गुरु का सबसे सच्चा उपाय है गुरुओं और बड़ों का सम्मान, विद्या का दान और धर्म के मार्ग पर चलना। व्रत इसी आचरण की याद दिलाता है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और पीले वस्त्र पहनें।
- हाथ में जल-अक्षत लेकर गुरुवार व्रत का संकल्प लें और कितने गुरुवार करेंगे, यह तय करें।
- पूजा-स्थान पर भगवान विष्णु का चित्र रखें। हल्दी या केसर से तिलक करें, पीले फूल और तुलसी दल अर्पित करें।
- देवगुरु बृहस्पति का ध्यान करें और ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ का जप करें।
- पास में केले का पेड़ हो तो उसकी जड़ में हल्दी मिला जल चढ़ाएँ, फिर चने की दाल और गुड़ अर्पित करें, हल्दी का तिलक करें और घी का दीपक जलाएँ।
- केले के पेड़ की परिक्रमा करें। घर में पेड़ न हो तो मंदिर में या भगवान विष्णु के चित्र के सामने ही यह पूजा कर लें।
- भगवान को चने की दाल-गुड़, केले और पीली मिठाई का भोग लगाएँ।
- गुरुवार (बृहस्पतिवार) व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा बीच में छोड़कर न उठें।
- “ॐ जय जगदीश हरे” से आरती करें।
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ की एक माला जप करें।
- दिन में एक बार पीला भोजन करें, जैसे चने की दाल, बेसन की रोटी या पीले चावल। परंपरा में इस भोजन में नमक नहीं लिया जाता।
- हो सके तो चने की दाल, हल्दी, पीले वस्त्र या धार्मिक पुस्तकें दान करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- चने की दाल, बेसन से बना भोजन, पीले चावल
- गुड़, दूध, फल (केला छोड़कर)
- दिन में एक बार पीला भोजन
क्या न खाएँ
- केला (यह पूजा में चढ़ता है, व्रत करने वाले स्वयं नहीं खाते)
- नमक (परंपरा के अनुसार)
- प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा
अन्य नियम
- परंपरा में गुरुवार को बाल धोना, कपड़े धोना और घर को गोबर से लीपना वर्जित माना जाता है। इसका संकेत व्रत कथा में भी मिलता है।
- गुरुजनों, शिक्षकों, माता-पिता और बड़ों का आदर करें।
- किसी ज़रूरतमंद विद्यार्थी की सहायता करें। विद्या-दान गुरु का सबसे प्रिय दान है।
- धन और दान को लेकर मन में तुच्छता न रखें।
मंत्र
ॐ बृं बृहस्पतये नमः
अर्थ:‘बृं’ बीजाक्षर सहित देवगुरु बृहस्पति को नमस्कार।
जप: रोज़ 1 माला (108 बार), हल्दी की गाँठ या तुलसी की माला से
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
अर्थ:सबमें बसने वाले भगवान वासुदेव (श्री विष्णु) को नमस्कार।
जप: रोज़ 1 माला
ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः
अर्थ:बीजाक्षरों सहित गुरु ग्रह (बृहस्पति) को नमस्कार। यह गुरु ग्रह की शांति का मंत्र है।
जप: रोज़ 1 माला; पूरा अनुष्ठान 19,000 जप, पंडित जी के मार्गदर्शन में
गुरुवार व्रत कथा: दानी राजा, रानी और बृहस्पति देव
प्राचीन समय में एक बड़ा प्रतापी और दानी राजा था। वह हर गुरुवार व्रत रखता, भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा करता, और ब्राह्मणों तथा ज़रूरतमंदों को खुले हाथ से दान देता। पर उसकी रानी को यह सब बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। वह न व्रत करती, न किसी को कुछ देती, और राजा को भी दान करने से रोकती रहती।
एक दिन राजा शिकार खेलने वन में गया हुआ था। तभी बृहस्पति देव साधु का रूप धरकर राजमहल के द्वार पर भिक्षा माँगने आए। रानी बोली, “महाराज, मैं इस दान-पुण्य से तंग आ गई हूँ। इतना धन है कि सँभालते-सँभालते थक जाती हूँ। कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे यह सारा धन चला जाए और मैं चैन से रहूँ।”
साधु ने समझाया, “देवी, तुम कैसी बात करती हो? धन से तो पुण्य कमाया जाता है। इससे भूखों को भोजन, प्यासों को पानी, बेटियों का विवाह और मंदिर-धर्मशालाएँ बनवाई जा सकती हैं। यही धन का सच्चा उपयोग है।” पर रानी ज़िद पर अड़ी रही।
तब साधु ने कहा, “अगर तुम यही चाहती हो, तो गुरुवार के दिन घर को गोबर से लीपना, अपने बाल धोना, राजा से हजामत बनवाने को कहना, कपड़े धोना और भोजन में ऐसी चीज़ें बनाना जो धर्म के विरुद्ध हों। सात गुरुवार तक ऐसा करोगी, तो तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा।” इतना कहकर साधु अंतर्धान हो गए।
रानी ने वैसा ही किया। अभी तीन ही गुरुवार बीते थे कि राजा का सारा धन-वैभव नष्ट हो गया। हालत ऐसी हो गई कि घर में खाने को भी कुछ न बचा। राजा ने रानी से कहा, “यहाँ सब मुझे जानते हैं, मैं यहाँ मज़दूरी भी नहीं कर सकता। मैं परदेस जाकर कुछ काम करता हूँ।” राजा परदेस चला गया और जंगल से लकड़ियाँ काटकर बेचने लगा।
इधर रानी और उसकी दासी बहुत दुख में दिन काटने लगीं। एक दिन जब सात दिन तक कुछ खाने को नहीं मिला, तो रानी ने दासी को अपनी धनी बहन के पास कुछ सहायता माँगने भेजा। उस दिन गुरुवार था और बहन गुरुवार की कथा सुन रही थी। उसने दासी की बात का कोई उत्तर नहीं दिया। दासी दुखी होकर लौट आई और रानी भी बहुत उदास हुई।
कथा पूरी होने के बाद बहन स्वयं रानी के पास आई और बोली, “बहन, मैं गुरुवार की कथा सुन रही थी। कथा के बीच में न उठते हैं, न बोलते हैं, इसलिए मैं तुम्हारी दासी को उत्तर नहीं दे सकी।” रानी ने रोते हुए अपनी सारी दशा बताई। बहन ने कहा, “बहन, बृहस्पति देव सबकी मनोकामना पूरी करते हैं। ज़रा अपने घर में देखो, शायद कुछ अनाज रखा हो।” दासी ने भीतर जाकर देखा तो सचमुच एक घड़ा अनाज से भरा था। दोनों चकित रह गईं।
तब बहन ने गुरुवार व्रत की पूरी विधि बताई: “गुरुवार को केले के पेड़ की जड़ में चने की दाल और गुड़ चढ़ाकर पूजा करना, दीपक जलाना, कथा सुनना, पीले वस्त्र पहनना, पीला भोजन करना और केला न खाना।” रानी और दासी ने अगले गुरुवार से पूरी श्रद्धा से व्रत शुरू किया। व्रत के दिन वे सोच ही रही थीं कि पीला भोजन कहाँ से आएगा, तभी बृहस्पति देव एक साधारण व्यक्ति का रूप धरकर पीले भोजन से भरे दो थाल दे गए।
धीरे-धीरे उनके घर में फिर से धन-धान्य आने लगा। रानी को अपनी पुरानी भूल पर बहुत पछतावा हुआ। अब वह स्वयं दान-पुण्य करने लगी और हर गुरुवार पूरे नियम से व्रत करने लगी।
उधर परदेस में राजा भी बहुत दुखी था। एक दिन जंगल में वही साधु फिर मिले। राजा ने अपना दुख बताया तो साधु ने कहा, “तुम्हारी रानी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था, पर अब वह पछताकर व्रत कर रही है। तुम भी लकड़ियाँ बेचकर उस पैसे से चने और गुड़ लेकर गुरुवार का व्रत करो।” राजा ने वैसा ही किया। उसके दिन भी फिरने लगे और कुछ ही समय में वह धन लेकर अपने राज्य लौटा।
घर पहुँचकर राजा ने रानी को दान-पुण्य करते और श्रद्धा से व्रत करते देखा तो बहुत प्रसन्न हुआ। उसने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि सब लोग गुरुवार का व्रत करें और बृहस्पति देव की पूजा करें। कथा आती है कि उस दिन से वह राज्य सुख-समृद्धि से भर गया।
कथा का सार: धन तभी टिकता है जब उसके साथ दान, विनम्रता और धर्म हो। भूल का पछतावा और सच्चा व्रत बिगड़ी हुई किस्मत भी सँवार देता है।
केले के पेड़ की पूजा कैसे करें
केले के पेड़ में भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का वास माना जाता है। गुरुवार की पूजा में यह सबसे महत्वपूर्ण अंग है।
- स्नान के बाद लोटे में जल लें और उसमें एक चुटकी हल्दी मिलाएँ।
- केले के पेड़ की जड़ में यह जल धीरे-धीरे चढ़ाएँ।
- तने पर हल्दी या केसर का तिलक करें और थोड़े अक्षत चढ़ाएँ।
- जड़ के पास भीगी चने की दाल और गुड़ अर्पित करें।
- घी का दीपक जलाएँ और पीले फूल चढ़ाएँ।
- पेड़ की परिक्रमा करें (प्रायः 3, 5 या 7 परिक्रमा) और मनोकामना कहें।
- ध्यान रखें: व्रत करने वाले उस दिन केला नहीं खाते, केवल पूजा में अर्पित करते हैं।
उद्यापन
16 गुरुवार (या जितने का संकल्प हो) पूरे होने पर 17वें गुरुवार को उद्यापन करें। भगवान विष्णु और बृहस्पति देव का विधिवत पूजन करें और गुरु मंत्र से हवन करवाएँ।
- सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को पीला भोजन कराएँ।
- पीले वस्त्र, चने की दाल, हल्दी, केसर, गुड़ और धार्मिक पुस्तकें दान करें।
- उद्यापन की विधि के लिए पंडित जी से सलाह लें।
सावधानी
इस व्रत में परंपरा से नमक नहीं लिया जाता। ब्लड प्रेशर, डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग डॉक्टर की सलाह से सेंधा नमक या फलाहार के साथ व्रत करें। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ और बुज़ुर्ग केवल पूजा, कथा और एक समय सादे भोजन से भी व्रत कर सकते हैं। दवा कभी न छोड़ें।
पूजा के अंत में आरती
श्री जगदीश जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।