जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा॥
एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥
पान चढ़े फूल चढ़े, और चढ़े मेवा।लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
‘सूर’ श्याम शरण आए, सफल कीजे सेवा।माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
दीनन की लाज रखो, शंभु सुतकारी।कामना को पूर्ण करो, जाऊँ बलिहारी॥
सरल भाव
टेक का भाव: हे गणेश देव, आपकी जय हो! आपकी माता पार्वती जी हैं और पिता महादेव। हर पद के बाद यही पंक्ति दोहराई जाती है, ताकि मन बार-बार शिव-शक्ति के घर के इस लाडले से जुड़ा रहे।
पहला पद: आप एकदंत हैं, दया से भरे हैं और चार भुजाएँ धारण करते हैं। आपके माथे पर सिंदूर शोभा देता है और आप मूषक (चूहे) पर सवारी करते हैं। इतने विशाल देव का इतना छोटा वाहन यह सिखाता है कि बुद्धि साथ हो, तो छोटा साधन भी बड़ा काम कर देता है।
दूसरा पद: भक्त आपको पान, फूल और मेवा चढ़ाते हैं, लड्डुओं का भोग लगाते हैं, और संत-जन आपकी सेवा करते हैं। गणेश जी को मोदक और लड्डू प्रिय माने जाते हैं, इसलिए उनकी पूजा में लड्डू का भोग विशेष है।
तीसरा पद: आप अंधों को आँखें, रोगियों को स्वस्थ काया, निःसंतान दंपतियों को संतान और निर्धन को धन देते हैं। यह भक्त के विश्वास की भाषा है: जीवन में जो भी कमी हो, उसे विघ्नहर्ता के सामने रखकर मन हल्का किया जाता है।
चौथा और पाँचवाँ पद: सूरदास जी कहते हैं, हे प्रभु! मैं आपकी शरण में आया हूँ, मेरी सेवा सफल कीजिए। अंतिम पद में भक्त विनती करता है: हे शंभु-पुत्र, दीनों की लाज रखिए, मेरी कामना पूरी कीजिए, मैं आप पर बलिहारी जाऊँ।
गणेश जी ‘प्रथम पूज्य’ हैं, इसलिए किसी भी पूजा, कथा या शुभ काम की शुरुआत उनकी वंदना और आरती से करने की परंपरा है।
आरती की विधि
घी का दीपक या कपूर जलाकर, घंटी बजाते हुए आरती करें। पारंपरिक क्रम है: भगवान के चरणों में 4 बार, नाभि पर 2 बार, मुख पर 1 बार, और फिर पूरे विग्रह पर 7 बार आरती घुमाएँ। अंत में आरती पर जल घुमाकर सबको आरती दें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।