- कब
- हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (पूर्णिमा के बाद आने वाली चौथ)। व्रत दिन भर रखा जाता है और रात को चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को अर्घ्य देकर खोला जाता है। चंद्रोदय का समय पंचांग से देखें। माघ मास की संकष्टी को सकट चौथ या तिल चौथ कहते हैं।
- पूजनीय
- भगवान श्री गणेश
- संबंधित ग्रह
- केतु ग्रह
अगली तिथियाँ
- 27नवंबर संकष्टी चतुर्थी (गणाधिप)शुक्रवार
- 26दिसंबर संकष्टी चतुर्थी (अखुरथ)शनिवार
- 25जनवरी संकष्टी चतुर्थी (लंबोदर)सोमवार · सकट चौथ (तिल चौथ)
- 24फ़रवरी संकष्टी चतुर्थी (द्विजप्रिय)बुधवार
- 25मार्च संकष्टी चतुर्थी (भालचंद्र)गुरुवार
- 24अप्रैल संकष्टी चतुर्थी (विकट)शनिवार
- 23मई संकष्टी चतुर्थी (एकदंत)रविवार
- 22जून संकष्टी चतुर्थी (कृष्णपिंगल)मंगलवार
- 22जुलाई संकष्टी चतुर्थी (गजानन)गुरुवार
- 20अगस्त संकष्टी चतुर्थी (हेरंब)शुक्रवार
- 19सितंबर संकष्टी चतुर्थी (विघ्नराज)रविवार
- 18अक्टूबर संकष्टी चतुर्थी (वक्रतुंड)सोमवार · करवा चौथ भी
अगली तिथि के लिए पंडित जी से पूछें।
पूरा पंचांग देखेंसंकष्टी चतुर्थी व्रत का महत्व
‘संकष्टी’ का अर्थ है संकटों को हरने वाली। श्री गणेश विघ्नहर्ता हैं, यानी विघ्नों को हरने वाले। हर महीने की संकष्टी चतुर्थी पर उनकी पूजा जीवन के छोटे-बड़े संकट दूर करने वाली मानी जाती है।
यह व्रत विशेष रूप से माताएँ अपनी संतान की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए रखती हैं। माघ मास की सकट चौथ इसी भाव का सबसे बड़ा पर्व है। पर कोई भी व्यक्ति, स्त्री हो या पुरुष, परिवार की सुख-शांति और कामों में आ रहे विघ्नों को दूर करने के लिए यह व्रत रख सकता है।
इस व्रत की विशेषता है रात का चंद्र-दर्शन। दिन भर व्रत के बाद जब चंद्रमा उगता है, तब उसे अर्घ्य देकर गणेश जी से प्रार्थना की जाती है। यह प्रतीक्षा और धैर्य भी व्रत का अंग है।
ज्योतिष में केतु ग्रह की शांति के लिए भी गणेश जी की उपासना का उपाय बताया जाता है। मान्यता है कि संकष्टी के दिन की गई गणेश पूजा मन के भ्रम और अचानक आने वाली बाधाओं को शांत करती है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और हाथ में जल-अक्षत लेकर संकष्टी व्रत का संकल्प लें।
- दिन भर अपनी शक्ति के अनुसार निराहार या फलाहार रहें और मन में ‘ॐ गं गणपतये नमः’ का जप करते रहें।
- शाम को पूजा-स्थान पर गणेश जी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
- गणेश जी को सिंदूर का तिलक करें, जनेऊ, लाल फूल, माला और 21 दूर्वा अर्पित करें।
- धूप-दीप जलाएँ और मोदक, लड्डू या तिल-गुड़ का भोग लगाएँ।
- संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
- “जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा” से आरती करें।
- रात को चंद्रमा उगने की प्रतीक्षा करें। चंद्रोदय होने पर लोटे में जल, थोड़ा दूध, अक्षत और फूल लेकर चंद्रमा को अर्घ्य दें।
- अर्घ्य देते समय गणेश जी और चंद्रदेव से परिवार की रक्षा और सुख-शांति की प्रार्थना करें।
- इसके बाद गणेश जी का प्रसाद ग्रहण करके व्रत खोलें और फिर सात्त्विक भोजन करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- फल, दूध, मखाना, साबूदाना
- तिल-गुड़ और गणेश जी का प्रसाद
- चंद्र-अर्घ्य के बाद सात्त्विक भोजन
क्या न खाएँ
- चंद्र-अर्घ्य से पहले अन्न
- प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा
अन्य नियम
- गणेश जी को तुलसी नहीं चढ़ाई जाती।
- बादल या किसी कारण से चंद्रमा न दिखे, तो पंचांग में दिए चंद्रोदय के समय पर चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य देकर व्रत खोल सकते हैं।
- दिन में क्रोध और कटु वचन से बचें।
मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
अर्थ:‘गं’ बीजाक्षर सहित गणों के स्वामी श्री गणेश को नमस्कार।
जप: दिन भर में कम से कम 1 माला (108 बार)
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥
अर्थ:हे टेढ़ी सूँड वाले, विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों के समान तेज वाले गणेश जी! मेरे सभी कामों को सदा बिना विघ्न के पूरा कीजिए।
जप: पूजा के आरंभ में 1 या 3 बार
गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्॥
अर्थ:जिनका मुख हाथी का है, जिनकी सेवा भूतगण आदि करते हैं, जो कैथ और जामुन के फल प्रेम से खाते हैं, जो माता उमा के पुत्र हैं और शोक का नाश करते हैं, उन विघ्नों के स्वामी गणेश जी के चरण-कमलों को मैं प्रणाम करता हूँ।
जप: आरती के बाद 1 बार
सकट चौथ की कथा: कुम्हार का आवा और माँ की प्रार्थना
प्राचीन समय में एक नगर में एक कुम्हार रहता था। वह मिट्टी के बर्तन बनाकर आवे (भट्ठी) में पकाता और बेचता था। एक बार उसने बर्तन पकाने के लिए आवा लगाया, पर बहुत कोशिश करने पर भी आवा पका ही नहीं। बर्तन कच्चे के कच्चे रह गए। उसने कई बार प्रयास किया, पर हर बार यही हुआ।
परेशान होकर वह राजा के पास गया। उस समय वहाँ लोग एक भयानक अंधविश्वास में पड़ गए। किसी ने सलाह दी कि आवा तभी पकेगा, जब उसके साथ किसी बालक को बैठाया जाएगा। राजा ने बिना सोचे-समझे यह क्रूर आदेश दे दिया कि नगर के परिवार बारी-बारी से एक-एक बालक दें।
समय बीतता गया और एक दिन एक बूढ़ी माँ की बारी आई। उसका एक ही बेटा था, जो उसके बुढ़ापे का एकमात्र सहारा था। वह दिन माघ मास की संकष्टी, यानी सकट चौथ का था। बुढ़िया का कलेजा फट रहा था, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। उसे गणेश जी पर अटूट विश्वास था।
उसने बेटे के हाथ में सकट का प्रसाद (तिल-गुड़) और कुछ दूर्वा दी और कहा, “बेटा, भगवान का नाम लेकर बैठ जाना। सकट चौथ के गणेश जी तेरी रक्षा करेंगे।” फिर वह स्वयं पूरे दिन व्रत रखकर गणेश जी के आगे बैठी रही और रोते हुए प्रार्थना करती रही, “हे विघ्नहर्ता, आज मेरी लाज रखना, मेरे बेटे की रक्षा करना।”
अगली सुबह जब कुम्हार ने आवा खोला, तो सब चकित रह गए। आवा पूरी तरह पक चुका था, और बुढ़िया का बेटा सुरक्षित, हँसता-खेलता बैठा था। उसे आँच तक नहीं लगी थी। कथा आती है कि उस दिन गणेश जी की कृपा से पहले खोए हुए बच्चे भी लौट आए और पूरे नगर में आनंद छा गया।
राजा ने जब यह चमत्कार देखा, तो उसे अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने वह क्रूर आदेश हमेशा के लिए बंद कर दिया, बुढ़िया का बहुत सम्मान किया और पूरे नगर में घोषणा करवाई कि सब लोग सकट चौथ का व्रत करें। तभी से माताएँ अपनी संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखती आ रही हैं।
कथा का सार: माँ की सच्ची प्रार्थना और गणेश जी की कृपा के आगे कोई संकट नहीं टिकता। और यह भी कि किसी को कष्ट देकर कोई काम सिद्ध नहीं होता। अंधविश्वास का अंत ही धर्म की जीत है।
सकट चौथ, अंगारकी चतुर्थी और विनायकी चतुर्थी
सकट चौथ (तिल चौथ)
माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सकट चौथ, तिल चौथ, तिलकुटा चौथ या माघी संकष्टी कहते हैं। राजस्थान और उत्तर भारत में माताएँ यह व्रत संतान की लंबी आयु और सुख के लिए विशेष श्रद्धा से रखती हैं। इस दिन तिल और गुड़ को कूटकर बने तिलकुटे का भोग लगाया जाता है और रात को चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है।
अंगारकी चतुर्थी
जब संकष्टी चतुर्थी मंगलवार के दिन पड़ती है, तो उसे अंगारकी चतुर्थी कहते हैं। मंगल ग्रह का एक नाम अंगारक है। यह संकष्टी विशेष फलदायी मानी जाती है और कई भक्त साल भर की संकष्टी का फल इसी से मानते हैं।
विनायकी चतुर्थी
हर महीने शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को विनायकी (विनायक) चतुर्थी कहते हैं। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को गणेश चतुर्थी का बड़ा उत्सव होता है। परंपरा में भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात चंद्र-दर्शन नहीं किया जाता। इसकी कथा भगवान श्रीकृष्ण पर लगे स्यमंतक मणि की चोरी के झूठे आरोप से जुड़ी है।
उद्यापन
जितनी संकष्टी का संकल्प लिया हो (जैसे एक वर्ष की सभी संकष्टी), वे पूरी होने पर किसी संकष्टी, प्रायः माघ की सकट चौथ, पर उद्यापन करें।
- गणेश जी का विधिवत पूजन करें और दूर्वा-तिल से हवन करवाएँ।
- सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों, बच्चों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ।
- तिल-गुड़, लड्डू, वस्त्र और दक्षिणा दान करें।
- विधि के लिए पंडित जी से सलाह लें।
सावधानी
चंद्रोदय कभी-कभी रात को देर से होता है, इसलिए पूरा दिन निराहार रहना कठिन हो सकता है। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग फलाहार और पानी के साथ व्रत करें और डॉक्टर की सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। माँ का स्वस्थ रहना ही संतान की सबसे बड़ी रक्षा है।
पूजा के अंत में आरती
श्री गणेश जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।