॥ वार्षिक व्रत-पर्व ॥ श्री हनुमान जी (बालाजी)

हनुमान जयंती (हनुमान जन्मोत्सव)

पवनपुत्र हनुमान जी के प्राकट्य का उत्सव — सिंदूर-चोला, सुंदरकांड, हनुमान चालीसा और सालासर बालाजी का विशाल मेला।

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कब
उत्तर भारत में चैत्र मास की पूर्णिमा को, प्रायः मार्च-अप्रैल में। कुछ परंपराओं में कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी (दीपावली से एक दिन पहले) को भी हनुमान जयंती मनाई जाती है, और दक्षिण भारत में अलग तिथियाँ प्रचलित हैं। सालासर में चैत्र पूर्णिमा पर विशाल मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर से पदयात्री निशान (ध्वजा) लेकर आते हैं।
पूजनीय
श्री हनुमान जी (बालाजी)
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  1. 20अप्रैल हनुमान जयंतीमंगलवार · सालासर में विशाल मेला
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हनुमान जयंती (हनुमान जन्मोत्सव) का महत्व

हनुमान जी शक्ति, भक्ति, बुद्धि और सेवा — चारों के एक साथ प्रतीक हैं। उन्हें भगवान शिव का ग्यारहवाँ रुद्र-अवतार माना जाता है, और वे श्रीराम के ऐसे सेवक हैं जिन्होंने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा। इसीलिए हनुमान चालीसा में उन्हें ‘संकट मोचन’ — संकट से छुड़ाने वाला — कहा गया है।

हनुमान जी चिरंजीवी हैं — मान्यता है कि जहाँ भी राम-कथा होती है, वहाँ वे किसी न किसी रूप में उपस्थित रहते हैं। इसलिए बहुत से भक्त इस दिन को ‘हनुमान जयंती’ के बजाय ‘हनुमान जन्मोत्सव’ कहना पसंद करते हैं।

सालासर धाम के लिए यह साल का सबसे बड़ा दिन है। चैत्र पूर्णिमा पर यहाँ लाखों भक्त बालाजी के दर्शन को आते हैं; बहुत से भक्त कई दिन पैदल चलकर, हाथ में लाल-केसरिया निशान लिए, जयकारे लगाते हुए पहुँचते हैं।

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥

श्रीरामरक्षा स्तोत्र

अर्थ:जो मन के समान तेज़ और वायु के समान वेग वाले हैं, जिन्होंने इंद्रियों को जीत लिया है, जो बुद्धिमानों में सबसे श्रेष्ठ हैं, पवनदेव के पुत्र और वानर सेना के प्रमुख हैं — उन श्रीराम के दूत हनुमान जी की मैं शरण लेता हूँ।

पूजा सामग्री

  • हनुमान जी की मूर्ति या चित्र (राम दरबार सहित हो तो उत्तम)
  • सिंदूर और चमेली का तेल (चोला चढ़ाने के लिए — परंपरा अनुसार)
  • लाल या केसरिया वस्त्र/लंगोट, जनेऊ
  • लाल फूल, गेंदे की माला, तुलसी दल
  • बेसन या बूँदी के लड्डू, गुड़-चना, केले
  • मीठा पान का बीड़ा
  • घी या चमेली के तेल का दीपक, धूप, कपूर
  • हनुमान चालीसा और सुंदरकांड की पुस्तक
  • लाल-केसरिया ध्वजा (निशान)

व्रत और पूजा की विधि

  1. सुबह ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें, लाल या केसरिया वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें।
  2. पहले भगवान श्रीराम और माता सीता का स्मरण करें — हनुमान जी राम-नाम से सबसे जल्दी प्रसन्न होते हैं।
  3. हनुमान जी की मूर्ति हो तो चमेली के तेल में मिला सिंदूर (चोला) चढ़ाएँ; यह कार्य मंदिर में पुजारी जी से करवाना उत्तम है। घर पर चित्र हो तो सिंदूर का तिलक करें।
  4. लाल फूल, गेंदे की माला, जनेऊ और वस्त्र अर्पित करें। घी या चमेली के तेल का दीपक जलाएँ।
  5. बूँदी या बेसन के लड्डू, गुड़-चना, केले और पान का भोग लगाएँ; भोग में तुलसी दल रखें।
  6. हनुमान चालीसा का पाठ करें — सामर्थ्य हो तो 7, 11 या 108 बार। परिवार मिलकर सुंदरकांड का पाठ करे तो और भी शुभ।
  7. संकटमोचन हनुमानाष्टक का पाठ भी करें।
  8. ‘आरती कीजै हनुमान लला की’ से आरती करें और प्रसाद बाँटें।
  9. हो सके तो किसी हनुमान मंदिर में दर्शन करें — सालासर आ सकें तो बालाजी के दर्शन का यह सबसे पावन दिन है।
  10. दिन में सेवा का कोई काम ज़रूर करें — भूखे को भोजन, प्यासे को पानी (गर्मी में प्याऊ), बीमार की सहायता। हनुमान जी सेवा के देवता हैं।
  11. शाम को फिर दीप जलाकर चालीसा पढ़ें और फलाहार या सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • फल, दूध, गुड़-चना
  • कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना (जो फलाहार रखें)
  • शाम को सात्त्विक भोजन (जो एक समय भोजन वाला व्रत रखें)

क्या न खाएँ

  • मांस, मदिरा, अंडा और हर प्रकार का नशा
  • प्याज़ और लहसुन
  • तामसिक और बासी भोजन

अन्य नियम

  • ब्रह्मचर्य और वाणी का संयम रखें
  • स्त्री-पुरुष, बच्चे-बुज़ुर्ग — सब हनुमान चालीसा पढ़ सकते हैं; भक्ति में कोई भेद नहीं
  • किसी का अपमान न करें और किसी जीव को कष्ट न दें
  • बंदरों को केले-चने खिलाने की परंपरा है — पर पास जाकर नहीं, सावधानी से दूर से दें

मंत्र

हनुमान मूल मंत्र

ॐ हं हनुमते नमः

अर्थ:हनुमान जी को नमस्कार है। ‘हं’ को हनुमान जी का बीज अक्षर माना जाता है।

जप: रोज़ 1 माला (108); हनुमान जयंती पर 11 माला।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
हनुमान स्तुति

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥

अर्थ:अतुलनीय बल के धाम, सोने के पर्वत (सुमेरु) जैसे चमकते शरीर वाले, राक्षस रूपी वन को जलाने वाली अग्नि, ज्ञानियों में अग्रणी, सब गुणों के भंडार, वानरों के स्वामी और श्री रघुनाथ जी के प्रिय भक्त पवनपुत्र हनुमान जी को मैं प्रणाम करता हूँ। (रामचरितमानस, सुंदरकांड का मंगलाचरण)

जप: पूजा के आरंभ में 3 बार।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
व्रत-कथा

हनुमान जी के जन्म और बालपन की कथा

कथा आती है कि अंजना नाम की एक अप्सरा को एक शाप के कारण वानरी रूप में धरती पर जन्म लेना पड़ा। वे वानरराज केसरी की पत्नी बनीं। संतान की कामना से माता अंजना ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की।

एक प्रचलित कथा के अनुसार उसी समय अयोध्या में राजा दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ हो रहा था। रानियों को मिली खीर का एक अंश एक पक्षी ले उड़ा, और पवनदेव ने उसे तपस्या कर रहीं अंजना जी की अंजलि में पहुँचा दिया। उसे प्रसाद मानकर ग्रहण करने से अंजना जी के गर्भ से हनुमान जी का जन्म हुआ। इसीलिए वे ‘पवनपुत्र’, ‘केसरीनंदन’, ‘आंजनेय’ और शिव के अंश होने से ‘शंकर सुवन’ कहलाए।

बचपन से ही हनुमान जी में अपार शक्ति थी। एक सुबह उन्हें बहुत भूख लगी। उन्होंने आकाश में उगते लाल सूरज को देखा और उसे मीठा पका फल समझकर पकड़ने के लिए उड़ चले। हनुमान चालीसा में इसी का वर्णन है — ‘जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥’

उस दिन सूर्य ग्रहण होना था और राहु सूर्य को ग्रसने आ रहा था। बालक को सूर्य की ओर जाते देख राहु घबराकर इंद्र के पास गया। इंद्र ऐरावत पर सवार होकर आए और बालक को रोकने के लिए उन पर वज्र चला दिया। वज्र बालक की ठुड्डी (हनु) पर लगा और वे मूर्च्छित होकर धरती पर गिर पड़े।

अपने पुत्र की यह दशा देखकर पवनदेव बहुत दुखी और क्रोधित हुए। वे बालक को लेकर एक गुफा में चले गए — और संसार में हवा चलना बंद हो गई। साँस लेने को हवा न रही तो सब प्राणी व्याकुल हो उठे। तब ब्रह्मा जी सब देवताओं को साथ लेकर पवनदेव को मनाने आए।

ब्रह्मा जी ने बालक को स्पर्श करके फिर से सचेत किया। सब देवताओं ने प्रसन्न होकर वरदान दिए — इंद्र ने कहा कि मेरा वज्र अब इनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा और इनका शरीर वज्र जैसा होगा (इसीलिए ‘बजरंगी’ — वज्र जैसे अंगों वाले); सूर्यदेव ने अपने तेज का अंश दिया और आगे चलकर उन्हें सारे शास्त्र पढ़ाए; यमराज ने कहा कि मेरा दंड इन्हें नहीं लगेगा; ब्रह्मा जी ने ब्रह्मास्त्र से भी रक्षा का वर दिया। वज्र से ‘हनु’ पर चोट लगने के कारण ही बालक का नाम ‘हनुमान’ पड़ा।

वरदानों से और शक्तिशाली होकर बालक हनुमान बहुत नटखट हो गए। वे ऋषियों के आश्रमों में ऊधम मचाते और उनके यज्ञ-पात्र उलट देते। तब ऋषियों ने हल्का-सा शाप दिया — ‘तुम अपनी शक्ति भूल जाओगे, और जब कोई तुम्हें तुम्हारी शक्ति याद दिलाएगा, तभी वह जागेगी।’ यह शाप भी भगवान की लीला थी, ताकि यह अपार बल सही समय पर, सही काम में लगे।

बहुत वर्षों बाद, जब सीता जी की खोज में समुद्र पार करने की बात आई और सब वानर चिंता में चुप बैठे थे, तब जाम्बवान जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति याद दिलाई — ‘कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥’ (संसार में ऐसा कौन-सा कठिन काम है, जो तुमसे न हो सके?) — और हनुमान जी पर्वत जैसे विशाल होकर समुद्र लाँघ गए।

कथा का संदेश: हम सबके भीतर हनुमान जी जैसी शक्ति सोई पड़ी है। उसे जगाने के लिए कभी किसी ‘जाम्बवान’ की ज़रूरत पड़ती है — गुरु, माता-पिता या सच्चा मित्र, जो याद दिलाए कि हम क्या कर सकते हैं। हनुमान जी की पूरी कथा ‘हनुमान जी की कथा’ पृष्ठ पर पढ़ें।

सावधानी

चैत्र पूर्णिमा तक गर्मी शुरू हो जाती है — व्रत में पानी भरपूर पिएँ। बीमार, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा लेने वाले फलाहार रखें, डॉक्टर की सलाह लें और दवा कभी न छोड़ें। पदयात्रा करने वाले भक्त धूप से बचाव, आराम, साफ़ पानी और पैरों की देखभाल का ध्यान रखें; मेले की भीड़ में बुज़ुर्गों और बच्चों को साथ रखें।

पूजा के अंत में आरती

श्री हनुमान जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।