॥ मंत्र ॥ 6 मंत्र

शांति पाठ

शांति पाठ वेदों और उपनिषदों के वे मंत्र हैं जो पूजा, पढ़ाई या किसी शुभ काम की शुरुआत और अंत में बोले जाते हैं। इनमें केवल अपने लिए नहीं, पूरी सृष्टि के लिए शांति माँगी गई है। अंत में तीन बार ‘शान्तिः’ बोलने का भाव है — अपने मन-शरीर के, दूसरे प्राणियों से आने वाले, और प्रकृति के — तीनों तरह के कष्टों की शांति।

समस्त सृष्टि

ॐ द्यौः शान्तिः

ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्षं शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

शुक्ल यजुर्वेद 36.17

अर्थ:आकाश में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हो, जल में शांति हो, औषधियों में शांति हो, वनस्पतियों में शांति हो, सब देवताओं में शांति हो, ब्रह्म (ज्ञान) में शांति हो, सब कुछ शांत हो — शांति ही शांति हो, और वही शांति मुझे भी प्राप्त हो।

जप: 1 बार।

कब और कैसे: पूजा, हवन, कथा या किसी शुभ काम के अंत में।

परब्रह्म

ॐ पूर्णमदः

ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

ईशावास्य उपनिषद (शांति पाठ); बृहदारण्यक उपनिषद 5.1.1

अर्थ:वह (परमात्मा) पूर्ण है, यह (संसार) भी पूर्ण है; पूर्ण से ही पूर्ण प्रकट होता है। पूर्ण में से पूर्ण निकाल लेने पर भी पूर्ण ही शेष रहता है। भाव यह है कि भगवान अनंत हैं — वे सबको देकर भी कभी कम नहीं होते।

जप: 1 बार।

कब और कैसे: पूजा या पाठ की शुरुआत और अंत में; ध्यान से पहले।

परमात्मा

ॐ असतो मा सद्गमय

ॐ असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्माऽमृतं गमय॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

बृहदारण्यक उपनिषद 1.3.28

अर्थ:हे प्रभु! मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो। अंधकार (अज्ञान) से प्रकाश (ज्ञान) की ओर ले चलो। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो।

जप: 1 या 3 बार।

कब और कैसे: सुबह की प्रार्थना में, पढ़ाई की शुरुआत में, और दीपक जलाते समय।

परमात्मा

ॐ सह नाववतु

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

तैत्तिरीय उपनिषद और कठ उपनिषद (शांति पाठ)

अर्थ:हे परमात्मा! आप हम दोनों (गुरु और शिष्य) की साथ-साथ रक्षा करें, हम दोनों का साथ-साथ पालन करें, हम दोनों साथ मिलकर शक्ति प्राप्त करें। हमारा पढ़ा हुआ ज्ञान तेजस्वी हो, और हम कभी एक-दूसरे से द्वेष न करें।

जप: 1 बार।

कब और कैसे: पढ़ाई या पाठ की शुरुआत में; परिवार के साथ भोजन से पहले भी।

देवगण

ॐ भद्रं कर्णेभिः

ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः। स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

ऋग्वेद 1.89.8 और 1.89.6 (प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य उपनिषद का शांति पाठ)

अर्थ:हे देवताओ! हम कानों से सदा शुभ बातें सुनें, आँखों से शुभ ही देखें। स्वस्थ और दृढ़ शरीर से आपकी स्तुति करते हुए हम उतनी आयु पाएँ जितनी देवताओं ने हमारे लिए तय की है। महान कीर्ति वाले इंद्र, सब कुछ जानने वाले पूषा, संकटों को दूर करने वाले गरुड़ (तार्क्ष्य) और देवगुरु बृहस्पति — ये सब हमारा कल्याण करें।

जप: 1 बार।

कब और कैसे: पूजा, पाठ या किसी शुभ कार्य की शुरुआत में।

समस्त प्राणी

सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

परंपरागत शांति मंत्र

अर्थ:सब सुखी हों, सब निरोगी हों, सब शुभ ही देखें, और कोई भी दुख का भागी न बने।

जप: 1 या 3 बार।

कब और कैसे: हर पूजा के अंत में, सोने से पहले, और जब किसी के लिए मंगल-कामना करनी हो।

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।