गायत्री मंत्र
ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥
ऋग्वेद 3.62.10
अर्थ:हम उस प्रकाशमय, पूजनीय सविता देव (सबको प्रेरणा देने वाले परमात्मा) के दिव्य तेज का ध्यान करते हैं, जो पृथ्वी, अंतरिक्ष और स्वर्ग — तीनों लोकों में व्याप्त हैं। वे हमारी बुद्धि को सही मार्ग की ओर प्रेरित करें। ध्यान दें — यह मंत्र धन या कोई वस्तु नहीं माँगता, केवल शुद्ध बुद्धि माँगता है, क्योंकि सही बुद्धि से ही जीवन सही होता है।
जप: रोज़ कम से कम 3 या 11 बार; नियम बन जाए तो 1 माला (108)।
कब और कैसे: सुबह सूर्योदय के समय, दोपहर और संध्या — तीनों संध्याओं में। स्नान के बाद, पूर्व की ओर मुख करके, शांत मन से।
इसे ‘वेदों की माता’ कहा गया है। धीरे और शुद्ध उच्चारण से पढ़ें; पहली बार पंडित जी से एक बार सुन लें।
महामृत्युंजय मंत्र
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
ऋग्वेद 7.59.12
अर्थ:हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो जीवन में सुगंध की तरह फैले हैं और सबका पोषण बढ़ाते हैं। जैसे पकी हुई ककड़ी अपनी बेल से अपने-आप, बिना कष्ट के अलग हो जाती है, वैसे ही हे प्रभु, हमें मृत्यु के बंधन और भय से मुक्त करें — पर अमृत (अमरत्व और मोक्ष) से कभी अलग न करें।
जप: रोज़ 11 बार या 1 माला (108)। बड़ा अनुष्ठान (जैसे सवा लाख जप) पंडित जी के मार्गदर्शन में।
कब और कैसे: सुबह स्नान के बाद, शिवलिंग पर जल चढ़ाते हुए या शांत बैठकर। परिवार में कोई बीमार हो तो उसकी रक्षा के भाव से। सोमवार, प्रदोष और सावन में विशेष।
यह मंत्र इलाज की जगह नहीं, इलाज का साथ है। बीमारी में डॉक्टर की सलाह और दवा कभी न छोड़ें।
पंचाक्षर मंत्र
ॐ नमः शिवाय
यजुर्वेद, रुद्राध्याय (‘नमः शिवाय च शिवतराय च’)
अर्थ:मैं भगवान शिव को नमन करता हूँ। ‘न-मः-शि-वा-य’ — ये पाँच अक्षर हैं, इसलिए इसे पंचाक्षर मंत्र कहते हैं। ‘शिव’ का अर्थ है कल्याण — यानी मैं उस परम कल्याणकारी शक्ति को प्रणाम करता हूँ। मंत्र छोटा है, पर शिव-भक्ति का सबसे बड़ा मंत्र माना जाता है।
जप: रोज़ 1 माला (108); रुद्राक्ष की माला उत्तम।
कब और कैसे: कभी भी, कहीं भी — सुबह-शाम, शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय, चलते-फिरते भी। सोमवार, प्रदोष और सावन में विशेष।
अष्टाक्षर मंत्र
ॐ नमो नारायणाय
नारायण उपनिषद
अर्थ:मैं भगवान नारायण को नमन करता हूँ। ‘ॐ’ सहित इसमें आठ अक्षर हैं, इसलिए इसे अष्टाक्षर मंत्र कहते हैं। ‘नारायण’ का अर्थ है — जो सब जीवों का आश्रय हैं। देवर्षि नारद जी सदा ‘नारायण-नारायण’ का स्मरण करते बताए जाते हैं।
जप: रोज़ 1 माला (108); तुलसी की माला से।
कब और कैसे: सुबह-शाम की पूजा में; गुरुवार और एकादशी को विशेष।
द्वादशाक्षर मंत्र
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
श्रीमद्भागवत पुराण, स्कंध 4 (ध्रुव-कथा)
अर्थ:मैं सबके भीतर बसने वाले भगवान वासुदेव को नमन करता हूँ। इस मंत्र में बारह अक्षर हैं, इसलिए इसे द्वादशाक्षर मंत्र कहते हैं। श्रीमद्भागवत में पाँच साल के बालक ध्रुव ने देवर्षि नारद से यही मंत्र पाकर तप किया था और भगवान के दर्शन पाए थे।
जप: रोज़ 1 माला (108)।
कब और कैसे: सुबह-शाम, एकादशी के दिन, और जब मन अशांत हो। तुलसी की माला से जप उत्तम।
हरे कृष्ण महामंत्र
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥
कलिसंतरण उपनिषद
अर्थ:इस मंत्र में केवल भगवान के नाम हैं — हरे, राम और कृष्ण। ‘हरे’ में भगवान हरि और उनकी शक्ति — दोनों को पुकारा जाता है। भाव है — हे प्रभु! मुझे अपनी भक्ति और सेवा में लगा लीजिए। कलिसंतरण उपनिषद में इन सोलह नामों को कलियुग के दोष मिटाने वाला बताया गया है।
जप: रोज़ 1 माला से शुरू करें; कई भक्त 16 माला का नियम लेते हैं।
कब और कैसे: किसी भी समय, किसी भी अवस्था में — इसके लिए कोई विशेष नियम नहीं। कीर्तन के रूप में गाएँ या माला पर जपें।
श्री राम जय राम
श्री राम जय राम जय जय राम
परंपरागत नाम-मंत्र (समर्थ रामदास जी द्वारा प्रचारित)
अर्थ:हे श्री राम! आपकी जय हो, आपकी जय हो, आपकी सदा जय हो। इसमें तेरह अक्षर हैं, इसलिए इसे त्रयोदशाक्षर राम मंत्र भी कहते हैं। समर्थ गुरु रामदास जी ने इस नाम-जप का बहुत प्रचार किया। राम-नाम हनुमान जी को सबसे प्रिय है — इसलिए सालासर बालाजी की कृपा का भी यह सबसे सरल मार्ग है।
जप: रोज़ 1 माला (108); तुलसी की माला उत्तम।
कब और कैसे: किसी भी समय। मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी के सामने, राम नवमी पर, और संकट के समय विशेष।
गणपति मंत्र
ॐ गं गणपतये नमः
परंपरागत बीज मंत्र
अर्थ:‘गं’ गणेश जी का बीज अक्षर है। अर्थ है — मैं गणों के स्वामी श्री गणेश को नमन करता हूँ। गणेश जी विघ्न (रुकावटें) दूर करने वाले और बुद्धि देने वाले हैं, इसलिए हर शुभ काम की शुरुआत इन्हीं के स्मरण से होती है।
जप: रोज़ 1 माला (108), या काम शुरू करने से पहले 11 बार।
कब और कैसे: हर पूजा और हर नए काम की शुरुआत में; बुधवार और चतुर्थी को विशेष।
बीज मंत्र है — धीरे और साफ़ उच्चारण करें। विधि-विधान से अनुष्ठान पंडित जी के मार्गदर्शन में।
हनुमान मंत्र
ॐ हं हनुमते नमः
परंपरागत बीज मंत्र
अर्थ:‘हं’ हनुमान जी का बीज अक्षर माना जाता है। अर्थ है — मैं श्री हनुमान जी को नमन करता हूँ। हनुमान जी बल, बुद्धि, साहस और राम-भक्ति के प्रतीक हैं। जिनका मन डरता हो या जो किसी कठिन काम में लगे हों, उनके लिए यह सरल और प्रिय मंत्र है।
जप: रोज़ 1 माला (108); लाल चंदन या रुद्राक्ष की माला से।
कब और कैसे: मंगलवार और शनिवार को विशेष; रोज़ सुबह या संध्या-दीप के समय भी।
रोज़ के जप के लिए श्रद्धा ही पर्याप्त है। विधि-विधान से अनुष्ठान पंडित जी के मार्गदर्शन में।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।