स्वामी रॉक (कोणामलै), कोणेश्वरम मंदिर परिसर, त्रिंकोमाली, श्रीलंका
श्रीलंका के पूर्वी तट पर त्रिंकोमाली में समुद्र से ऊपर उठी चट्टान स्वामी रॉक पर कोणेश्वरम मंदिर परिसर है, जहाँ माँ शांकरी देवी की पूजा होती है। मान्यता है कि यहाँ सती का ऊरुसंधि (जाँघ का जोड़) भाग गिरा था। पुराना मंदिर 1622 में पुर्तगालियों ने तोड़ दिया था; 1950 के दशक में यहाँ फिर से मंदिर बना।
विशेष पर्व
नवरात्रि, महाशिवरात्रि और अप्रैल में कोणेश्वरम का रथ उत्सव
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; नवरात्रि और अप्रैल के रथ उत्सव के समय विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
त्रिंकोमाली रेलवे स्टेशन लगभग 3 किमी, चाइना बे हवाई अड्डा लगभग 10 किमी; कोलंबो से सड़क मार्ग लगभग 260 किमी
ध्यान दें: भारत से जाने के लिए पासपोर्ट चाहिए; वीज़ा नियम पहले जाँच लें। मंदिर का रास्ता फ़्रेडरिक किले (सेना क्षेत्र) से होकर जाता है।
मान्यताओं में अंतर: कुछ विद्वान त्रिंकोमाली वाली पहचान को बाद की मान्यता मानते हैं। पीठनिर्णय की कुछ पांडुलिपियों में इसी चट्टान पर इंद्राक्षी देवी का उल्लेख मिलता है।
मोक्ष देने वाली सात पुरियों में गिनी जाने वाली कांची में देवी कामाक्षी पद्मासन में विराजती हैं और हाथों में गन्ने का धनुष, पाश और अंकुश धारण करती हैं। मान्यता है कि आदि शंकराचार्य ने यहाँ श्रीचक्र स्थापित किया था। मंदिर का कांची कामकोटि पीठ से गहरा संबंध है।
विशेष पर्व
मासी (फ़रवरी-मार्च) का मुख्य उत्सव, रथ उत्सव, तेप्पम (नौका) उत्सव और नवरात्रि
कब जाएँ
पूरे वर्ष; नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर) और मासी उत्सव (फ़रवरी-मार्च) में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
कांचीपुरम रेलवे स्टेशन; नज़दीकी हवाई अड्डा चेन्नई, लगभग 72 किमी
प्रद्युम्न (सटीक स्थान अनिश्चित); प्रचलित पहचान पांडुआ, ज़िला हुगली, पश्चिम बंगाल
स्तोत्र में 'प्रद्युम्ने शृंखला देवी' कहा गया है, पर प्रद्युम्न आज कौन-सा स्थान है, यह निश्चित नहीं है। सबसे अधिक हुगली जिले के पांडुआ को यह पीठ बताया जाता है, जहाँ अब पुराना देवी मंदिर नहीं बचा है। मान्यता है कि यहाँ सती का उदर (पेट) गिरा था।
विशेष पर्व
स्थान निश्चित न होने से कोई एक प्रमुख उत्सव तय नहीं
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च, जब मौसम सुहावना रहता है
कैसे पहुँचें
पांडुआ रेलवे स्टेशन, हावड़ा-बर्धमान मुख्य लाइन पर; नज़दीकी हवाई अड्डा कोलकाता
ध्यान दें: पांडुआ में आज कोई प्राचीन देवी मंदिर नहीं दिखता; वहाँ एक ऐतिहासिक मीनार खड़ी है।
मान्यताओं में अंतर: कुछ विद्वान प्रद्युम्न को गुजरात का कोई स्थान मानते हैं। कुछ मान्यताएँ इस पीठ को कर्नाटक के शृंगेरी से और कुछ गंगासागर से जोड़ती हैं। पांडुआ वाली पहचान भी अनुमान पर आधारित मानी जाती है।
मैसूरु के पास चामुंडी पहाड़ी पर देवी चामुंडेश्वरी का मंदिर है। कथा है कि देवी ने यहीं महिषासुर का वध किया था और इसी से नगर का नाम मैसूरु पड़ा। मान्यता है कि यहाँ सती के केश गिरे थे; पौराणिक काल में यह क्षेत्र क्रौंचपुरी कहलाता था।
विशेष पर्व
नवरात्रि और मैसूरु दशहरा, आषाढ़ मास के शुक्रवार, चामुंडी जयंती
कब जाएँ
पूरे वर्ष; दशहरा (सितंबर-अक्टूबर) और आषाढ़ के शुक्रवारों को विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
मैसूरु रेलवे स्टेशन और मैसूरु हवाई अड्डा; मंदिर मैसूरु शहर से लगभग 12-13 किमी, बेंगलुरु से लगभग 154 किमी
ध्यान दें: पहाड़ी पर सड़क से या लगभग 1000 सीढ़ियाँ चढ़कर जा सकते हैं; सीढ़ी मार्ग पर विशाल नंदी प्रतिमा है।
आलमपुर, तुंगभद्रा नदी के किनारे, ज़िला जोगुलांबा गद्वाल, तेलंगाना
तुंगभद्रा नदी के किनारे बसे आलमपुर में जोगुलांबा देवी का मंदिर है; उनका नाम 'योगुला अम्मा' यानी योगियों की माता से जुड़ा माना जाता है। पास ही चालुक्य काल के नवब्रह्म मंदिर हैं और कुछ दूरी पर तुंगभद्रा-कृष्णा का संगम है। मान्यता है कि यहाँ सती के ऊपरी दाँत गिरे थे।
विशेष पर्व
दशहरा नवरात्रि में विशेष पूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी, जब गर्मी कम रहती है
कैसे पहुँचें
आलमपुर रोड रेलवे स्टेशन लगभग 9 किमी; नज़दीकी बड़ा हवाई अड्डा हैदराबाद, जो लगभग 210-220 किमी दूर है
श्री भ्रमरांबा मल्लिकार्जुन स्वामी मंदिर परिसर, श्रीशैलम, ज़िला नंद्याल, आंध्र प्रदेश
श्रीशैलम में एक ही परिसर में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग और देवी भ्रमरांबा का शक्तिपीठ है, इसलिए यह शिव और शक्ति दोनों के भक्तों के लिए विशेष है। मान्यता है कि यहाँ सती की ग्रीवा (गर्दन) गिरी थी। पास में बहने वाली कृष्णा नदी को यहाँ पाताल गंगा कहते हैं।
विशेष पर्व
दशहरे की शरन्नवरात्रि, जिसमें देवी के नवदुर्गा अलंकार होते हैं; महाशिवरात्रि
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी अच्छा समय; नवरात्रि और महाशिवरात्रि पर बड़े उत्सव
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन मार्कापुर लगभग 85 किमी; नज़दीकी बड़ा हवाई अड्डा हैदराबाद, श्रीशैलम हैदराबाद से लगभग 213 किमी
ध्यान दें: पाताल गंगा (कृष्णा नदी) तक उतरने के लिए लगभग 852 सीढ़ियाँ हैं।
कोल्हापुर के बीचोंबीच स्थित इस मंदिर में देवी महालक्ष्मी विराजती हैं, जिन्हें लोग प्रेम से अंबाबाई कहते हैं। मंदिर चालुक्य काल का माना जाता है और इस स्थान को करवीर पीठ भी कहते हैं। मान्यता है कि यहाँ सती के नेत्र गिरे थे; यह महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में भी गिना जाता है।
विशेष पर्व
नवरात्रि, चैत्र मास का रथोत्सव और किरणोत्सव (सूर्य-किरणों का उत्सव)
कब जाएँ
पूरे वर्ष; अक्टूबर से फ़रवरी मौसम अच्छा, नवरात्रि में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
छत्रपति शाहू महाराज टर्मिनस (कोल्हापुर) रेलवे स्टेशन; कोल्हापुर हवाई अड्डा शहर से लगभग 9 किमी; पुणे से लगभग 237 किमी
स्तोत्र की 'माहुर्ये एकवीरिका' को माहुरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित रेणुका माता मंदिर से जोड़ा जाता है। कथा है कि परशुराम ने माता रेणुका का अंतिम संस्कार यहीं किया था। यह महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में गिना जाता है; पास ही दत्त शिखर और अनसूया माता के मंदिर भी हैं।
विशेष पर्व
दशहरे पर बड़ा मेला, नवरात्रि और दत्त पूर्णिमा पर महापूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च मौसम सुहावना; दशहरे पर बड़ा मेला
कैसे पहुँचें
किनवट रेलवे स्टेशन लगभग 50 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा नांदेड़, जहाँ से माहुर के लिए नियमित बसें चलती हैं
मान्यताओं में अंतर: एकवीरा को देवी रेणुका का ही रूप माना जाता है। पुणे जिले में लोणावला के पास कार्ला में एकवीरा देवी का एक अलग प्रसिद्ध मंदिर है, पर स्तोत्र का यह पीठ प्रायः माहुर से जोड़ा जाता है।
गढ़कालिका क्षेत्र, शिप्रा तट, भर्तृहरि गुफा के पास, उज्जैन, मध्य प्रदेश
स्तोत्र में 'उज्जयिन्यां महाकाली' कहा गया है, और यह महाशक्तिपीठ प्रायः उज्जैन के प्राचीन गढ़कालिका मंदिर से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि यहाँ सती का ऊपरी होंठ गिरा था। कहा जाता है कि महाकवि कालिदास को यहीं माँ काली की कृपा मिली थी।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष पूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च मौसम अच्छा; नवरात्रि में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
उज्जैन जंक्शन रेलवे स्टेशन; नज़दीकी हवाई अड्डा इंदौर, उज्जैन से लगभग 57 किमी
मान्यताओं में अंतर: 51 पीठों की परंपरा में उज्जैन का हरसिद्धि मंदिर शक्तिपीठ माना जाता है, जहाँ सती की कोहनी गिरने की मान्यता है। कुछ सूचियाँ स्तोत्र की महाकाली को महाकालेश्वर मंदिर परिसर से भी जोड़ती हैं।
कुक्कुटेश्वर स्वामी मंदिर परिसर, पीठापुरम, ज़िला काकीनाडा, आंध्र प्रदेश
पीठापुरम के कुक्कुटेश्वर स्वामी मंदिर परिसर में देवी पुरुहूतिका का मंदिर है, जिसे स्तोत्र में 'पीठिकायां पुरुहूतिका' कहा गया है। यहीं पाद गया सरोवर है, जहाँ पिंडदान को काशी के समान फलदायी माना जाता है। श्रीपाद श्रीवल्लभ की जन्मभूमि होने से यह दत्त भक्तों के लिए भी पवित्र है।
विशेष पर्व
दशहरा नवरात्रि, महाशिवरात्रि और कार्तिक मास
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी; नवरात्रि और कार्तिक मास में विशेष उत्सव
कैसे पहुँचें
पीठापुरम रेलवे स्टेशन (हावड़ा-चेन्नई मुख्य लाइन); राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी) हवाई अड्डा लगभग 55 किमी; काकीनाडा लगभग 20 किमी
ओडिशा के जाजपुर में देवी बिरजा का मंदिर है, जिन्हें स्तोत्र में 'ओढ्यायां गिरिजा देवी' कहा गया है। दो भुजाओं वाली देवी महिषासुरमर्दिनी रूप में हैं। मान्यता है कि यहाँ सती की नाभि गिरी थी; मंदिर के नाभि गया कुएँ पर पितरों के लिए पिंडदान भी होता है।
विशेष पर्व
16 दिन की शारदीय दुर्गा पूजा, सिंहध्वज रथ यात्रा
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; शारदीय नवरात्रि में विशेष पूजा
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन जाजपुर-क्योंझर रोड और कटक; नज़दीकी हवाई अड्डा भुवनेश्वर, जाजपुर भुवनेश्वर से लगभग 125 किमी
श्री भीमेश्वर स्वामी मंदिर परिसर, द्राक्षारामम, ज़िला कोनसीमा, आंध्र प्रदेश
द्राक्षारामम के भीमेश्वर स्वामी मंदिर में देवी माणिक्यांबा का शक्तिपीठ है; यह मंदिर शिव जी के पंचाराम क्षेत्रों में भी गिना जाता है। कथा है कि दक्ष प्रजापति ने यहीं यज्ञ किया था, इसी से नाम 'दक्षाराम' पड़ा। मान्यता है कि यहाँ सती का बायाँ गाल गिरा था।
विशेष पर्व
शरन्नवरात्रि (अक्टूबर), कार्तिक मास के सोमवार, महाशिवरात्रि
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; कार्तिक मास और महाशिवरात्रि पर विशेष उत्सव
कैसे पहुँचें
काकीनाडा लगभग 28 किमी और राजमहेंद्रवरम लगभग 50 किमी, दोनों में रेलवे स्टेशन; नज़दीकी हवाई अड्डा राजमहेंद्रवरम
गुवाहाटी में ब्रह्मपुत्र के पास नीलाचल पहाड़ी पर स्थित कामाख्या मंदिर शक्ति उपासना का बड़ा केंद्र है। गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है; योनि आकार की शिला की पूजा होती है, जिसे भूमिगत जलधारा सदा गीला रखती है। मान्यता है कि यहाँ सती का योनि भाग गिरा था। वर्तमान मंदिर 1565 में कोच राजा नरनारायण के समय फिर से बना।
विशेष पर्व
जून में अंबुबाची मेला, नवरात्रि की दुर्गा पूजा, मनसा पूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से अप्रैल मौसम सुहावना; जून में अंबुबाची मेला
कैसे पहुँचें
कामाख्या रेलवे स्टेशन लगभग 7 किमी, गुवाहाटी स्टेशन लगभग 8 किमी; गुवाहाटी हवाई अड्डा लगभग 20 किमी
ध्यान दें: अंबुबाची मेले (जून) के दिनों में गर्भगृह के कपाट कुछ दिन बंद रहते हैं और मेले के अंतिम दिन खुलते हैं।
स्तोत्र में 'प्रयागे माधवेश्वरी' कहा गया है, और प्रयागराज के अलोपी देवी मंदिर को यह महाशक्तिपीठ माना जाता है। मान्यता है कि यहाँ सती के हाथ की उँगलियाँ गिरी थीं। मंदिर में देवी की मूर्ति नहीं है; भक्त एक लकड़ी के पालने (डोली) की पूजा करते हैं।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष पूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; माघ मेले के समय प्रयागराज में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
प्रयागराज जंक्शन रेलवे स्टेशन; प्रयागराज (बमरौली) हवाई अड्डा
मान्यताओं में अंतर: 51 शक्तिपीठों की कुछ सूचियों में प्रयाग की देवी का नाम ललिता बताया गया है, इसलिए प्रयागराज का ललिता देवी मंदिर भी यह पीठ माना जाता है।
हिमाचल के कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है; यहाँ जलती प्राकृतिक ज्योतियों (ज्वालाओं) को ही माता का रूप मानकर पूजा होती है। स्तोत्र में इसे 'ज्वालायां वैष्णवी देवी' कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ सती की जीभ गिरी थी।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में बड़े मेले
कब जाएँ
पूरे वर्ष; नवरात्रि में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
नज़दीकी हवाई अड्डा कांगड़ा (गग्गल); कांगड़ा घाटी की छोटी रेल लाइन पर ज्वालामुखी रोड स्टेशन
गया शहर को तीन ओर से घेरने वाली छोटी पहाड़ियों में से एक, मंगलागौरी पहाड़ी पर यह महाशक्तिपीठ स्थित है। स्तोत्र में इसे 'गया माङ्गल्यगौरिका' कहा गया है। मान्यता है कि यहाँ सती का स्तन भाग गिरा था।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष पूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च, जब मौसम सुहावना रहता है
कैसे पहुँचें
गया जंक्शन रेलवे स्टेशन; गया हवाई अड्डा शहर से लगभग 7 किमी
मीरघाट, काशी विश्वनाथ मंदिर के पास, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
वाराणसी में मीरघाट के पास, काशी विश्वनाथ मंदिर से लगभग 250 मीटर दूर विशालाक्षी देवी का मंदिर है। मान्यता है कि यहाँ सती का कर्णकुंडल (कान का आभूषण) गिरा था। गर्भगृह में काले पत्थर की दो मूर्तियाँ हैं; वर्तमान भवन 1893 में तमिलनाडु के चेट्टिनाड क्षेत्र के व्यापारियों ने बनवाया।
विशेष पर्व
भाद्रपद कृष्ण तृतीया की कजली तीज; चैत्र और शारदीय नवरात्रि, विशेषकर पंचमी
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; नवरात्रि की पंचमी को विशेष दर्शन
कैसे पहुँचें
वाराणसी जंक्शन (कैंट) रेलवे स्टेशन; लाल बहादुर शास्त्री हवाई अड्डा, बाबतपुर। मंदिर तक गलियों से पैदल जाना होता है
शारदा गाँव, नीलम घाटी, पाक-अधिकृत कश्मीर (नियंत्रण रेखा के पार)
नियंत्रण रेखा से लगभग 10 किमी दूर, नीलम (किशनगंगा) नदी के किनारे एक पहाड़ी पर शारदा पीठ के प्राचीन खंडहर हैं। 6वीं से 12वीं सदी के बीच यह विद्या का बड़ा केंद्र था, और शारदा लिपि का नाम इसी से जुड़ा है। मान्यता है कि यहाँ सती का दाहिना हाथ गिरा था।
विशेष पर्व
आज यहाँ नियमित पूजा या उत्सव नहीं होते; मंदिर खंडहर रूप में है
कब जाएँ
नियंत्रण रेखा के कारण भारत से सामान्य यात्रा अभी संभव नहीं है
कैसे पहुँचें
भारत से कोई खुला रास्ता नहीं; स्थान मुज़फ़्फ़राबाद से लगभग 150 किमी और श्रीनगर से लगभग 130 किमी है
ध्यान दें: भारतीयों को जाने के लिए विशेष अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) चाहिए। मार्च 2023 में भारत की ओर टीटवाल (कुपवाड़ा) में माँ शारदा मंदिर का उद्घाटन हुआ।
त्रिकूट पर्वत, कटरा, ज़िला रियासी, जम्मू और कश्मीर
त्रिकूट पर्वत पर लगभग 5,200 फ़ुट की ऊँचाई पर स्थित पवित्र गुफा में माता वैष्णो देवी तीन प्राकृतिक पिंडियों के रूप में विराजती हैं, जिन्हें महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का रूप माना जाता है। आधार शिविर कटरा से लगभग 12 किमी पैदल चढ़ाई है। मान्यता है कि लौटते समय भैरों मंदिर के दर्शन से ही यात्रा पूरी होती है।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि; दीपावली और नववर्ष पर भी विशेष आयोजन
कब जाएँ
मई-जून अच्छा समय; बरसात में रास्ता फिसलन भरा रहता है और दिसंबर-जनवरी में कड़ाके की ठंड
कैसे पहुँचें
श्री माता वैष्णो देवी कटरा रेलवे स्टेशन; नज़दीकी हवाई अड्डा जम्मू, जो कटरा से सड़क मार्ग से लगभग 50 किमी है
ध्यान दें: यात्रा पंजीकरण अनिवार्य है; RFID यात्रा कार्ड कटरा में या ऑनलाइन बनता है, इसके बिना बाणगंगा चौकी से आगे जाने नहीं दिया जाता।
मान्यताओं में अंतर: इसे प्रायः 108 शक्तिपीठों में गिना जाता है। सती के किस अंग से इसका संबंध है, इस पर दो मान्यताएँ हैं: एक के अनुसार यहाँ कपाल (सिर) गिरा, दूसरी के अनुसार दाहिनी भुजा। कुछ ग्रंथ दाहिनी भुजा का स्थान कश्मीर के गांदरबल में बताते हैं।
श्री नैना देवी जी, पहाड़ी की चोटी पर, ज़िला बिलासपुर, हिमाचल प्रदेश
पंजाब की सीमा के पास पहाड़ी की चोटी पर बने इस मंदिर से गोबिंद सागर झील और भाखड़ा बाँध दिखते हैं। मान्यता है कि यहाँ सती के नेत्र (नैन) गिरे थे। एक कथा यह भी है कि ग्वाले नैना ने सफ़ेद गाय को एक पत्थर पर दूध बरसाते देखा; देवी ने सपने में उसे अपनी पिंडी बताया।
विशेष पर्व
श्रावण अष्टमी; चैत्र, श्रावण और आश्विन नवरात्रि के मेले
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; मार्च से अक्टूबर मौसम सुहावना, श्रावण अष्टमी और नवरात्रि मेलों में विशेष रौनक
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन आनंदपुर साहिब (पंजाब), लगभग 20 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा चंडीगढ़, लगभग 100 किमी
ध्यान दें: पहाड़ी की चोटी तक सीढ़ियों के अलावा रोपवे (केबल कार) से भी पहुँचा जा सकता है।
मान्यताओं में अंतर: नैनीताल (उत्तराखंड) के नैना देवी मंदिर के बारे में भी मान्यता है कि वहाँ सती के नेत्र गिरे थे।
चिंतपूर्णी, भरवाईं के पास, तहसील अंब, ज़िला ऊना, हिमाचल प्रदेश
शिवालिक पहाड़ियों में लगभग 977 मीटर की ऊँचाई पर स्थित इस मंदिर में माता छिन्नमस्तिका की पिंडी रूप में पूजा होती है। मान्यता है कि यहाँ सती के चरण गिरे थे। भक्तों की चिंता दूर करने वाली माता होने से इन्हें चिंतपूर्णी कहा जाता है; मान्यता है कि चारों दिशाओं के शिव मंदिर इस धाम की रक्षा करते हैं।
विशेष पर्व
चैत्र, श्रावण (सावन अष्टमी) और आश्विन नवरात्रि के मेले; हर महीने की संक्रांति
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; चैत्र, श्रावण और आश्विन नवरात्रि के मेलों में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन अंब अंदौरा लगभग 19 किमी, होशियारपुर लगभग 42 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा गग्गल (कांगड़ा), लगभग 60 किमी
ध्यान दें: मंदिर परिसर में वाहन नहीं जाते, अंतिम हिस्सा पैदल चलना होता है।
बिलासपुर गाँव, मनीमाजरा के पास, शिवालिक की तलहटी, ज़िला पंचकूला, हरियाणा
शिवालिक की तलहटी में लगभग 100 एकड़ में फैले इस परिसर का मुख्य मंदिर मनीमाजरा के महाराजा गोपाल सिंह ने 1811 से 1815 के बीच बनवाया था। कथा है कि एक गाय रोज़ पहाड़ी पर तीन पिंडियों पर दूध चढ़ाती थी। मान्यता है कि यहाँ सती के मस्तक का अगला भाग गिरा था।
विशेष पर्व
चैत्र और आश्विन (शारदीय) नवरात्रि के नौ दिन के मेले
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; चैत्र और आश्विन नवरात्रि के मेलों में सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं
कैसे पहुँचें
चंडीगढ़ रेलवे स्टेशन लगभग 8 किमी; चंडीगढ़ अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 31 किमी
मान्यताओं में अंतर: मंदिर की परंपरा इसे सती के मस्तक से जोड़ती है और इसे शक्तिपीठ कहा जाता है, पर शक्तिपीठों की कुछ प्रचलित सूचियों में इसका नाम नहीं मिलता।
त्रिकूट पहाड़ी, मैहर, ज़िला मैहर (पहले सतना), मध्य प्रदेश
मैहर में त्रिकूट पहाड़ी की चोटी पर माँ शारदा का मंदिर है। मान्यता है कि यहाँ सती का हार गिरा था, इसी से नाम 'माई का हार' यानी मैहर पड़ा। लोक मान्यता है कि वीर आल्हा आज भी प्रतिदिन माँ की पूजा करने आते हैं; पहाड़ी के नीचे आल्हा-ऊदल का अखाड़ा माना जाने वाला स्थान है।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष पूजा-अनुष्ठान
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च मौसम सुहावना; नवरात्रि में विशेष रौनक
कैसे पहुँचें
मैहर रेलवे स्टेशन (कटनी-सतना के बीच); हवाई अड्डे खजुराहो लगभग 140 किमी और जबलपुर लगभग 160 किमी
ध्यान दें: मंदिर तक 1,000 से अधिक सीढ़ियाँ हैं; चढ़ाई कठिन लगे तो रोपवे से भी जा सकते हैं।
नैनी झील का उत्तरी किनारा (मल्लीताल), नैनीताल, उत्तराखंड
नैनीताल में नैनी झील के उत्तरी किनारे पर माँ नैना देवी का मंदिर है, जहाँ देवी की पूजा दो नेत्रों के रूप में होती है। मान्यता है कि यहाँ सती का दाहिना नेत्र गिरा था, इसी से झील और नगर का नाम नैनीताल पड़ा। पुराना मंदिर 1880 के भूस्खलन में नष्ट हो गया था, बाद में नया मंदिर बना।
विशेष पर्व
नंदा अष्टमी पर नंदा देवी मेला (प्रायः सितंबर में)
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; नंदा देवी मेले के समय विशेष रौनक
कैसे पहुँचें
काठगोदाम रेलवे स्टेशन लगभग 35 किमी; पंतनगर हवाई अड्डा लगभग 71 किमी
मान्यताओं में अंतर: हिमाचल के बिलासपुर जिले के श्री नैना देवी जी मंदिर के बारे में भी मान्यता है कि वहाँ सती के नेत्र गिरे थे; शक्तिपीठों की कुछ सूचियों में नैनीताल के बजाय वही स्थान मिलता है।
अन्नपूर्णा चोटी, टनकपुर के पास, ज़िला चंपावत, उत्तराखंड
टनकपुर से लगभग 20 किमी दूर अन्नपूर्णा चोटी पर माँ पूर्णागिरि का मंदिर है, जिसके पास से शारदा (काली) नदी बहती है। मान्यता है कि यहाँ सती की नाभि गिरी थी; इसे शक्तिपीठ और 108 सिद्धपीठों में गिना जाता है। मान्यता है कि माँ के दर्शन के बाद सिद्ध बाबा के मंदिर जाने से ही यात्रा सफल होती है।
विशेष पर्व
चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) में विशेष रौनक; पूर्णागिरि मेला लगभग तीन महीने चलता है
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; चैत्र नवरात्रि और पूर्णागिरि मेले के समय सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं
कैसे पहुँचें
टनकपुर रेलवे स्टेशन लगभग 20-22 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा पंतनगर, लगभग 160 किमी
ध्यान दें: सड़क के अंतिम पड़ाव ठुलीगाड़ से आगे मंदिर तक लगभग 3 किमी की सीढ़ीदार पैदल चढ़ाई है।
मान्यताओं में अंतर: तंत्र चूड़ामणि के अनुसार सती की नाभि उत्कल (ओडिशा) के विरजा क्षेत्र में गिरी थी, जिसे जाजपुर के बिरजा देवी मंदिर से जोड़ा जाता है।
तारापीठ, द्वारका नदी के किनारे, रामपुरहाट के पास, ज़िला बीरभूम, पश्चिम बंगाल
बीरभूम जिले में द्वारका नदी के किनारे दस महाविद्याओं में से एक, माँ तारा का प्रसिद्ध मंदिर है; पास का महाश्मशान तंत्र साधना के लिए जाना जाता है। मान्यता है कि यहाँ सती के नेत्र का तारा (पुतली) गिरा था। कथा है कि ऋषि वशिष्ठ ने यहाँ तारा की साधना की; संत वामाखेपा भी यहीं साधक रहे।
विशेष पर्व
भादों की कौशिकी अमावस्या सबसे बड़ा उत्सव; काली पूजा और दुर्गा पूजा
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; अक्टूबर से मार्च मौसम सुहावना, कौशिकी अमावस्या (अगस्त-सितंबर) पर विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन रामपुरहाट, जहाँ से टैक्सी मिलती है; नज़दीकी हवाई अड्डा दुर्गापुर (काज़ी नज़रुल इस्लाम), लगभग 100 किमी
मान्यताओं में अंतर: एक मत के अनुसार यह सती का पीठ नहीं है; इसकी पवित्रता ऋषि वशिष्ठ की तारा साधना से जुड़ी है। इसे शक्तिपीठ के साथ सिद्धपीठ भी माना जाता है। कुछ सूचियाँ यहाँ पुतली की जगह सती का तीसरा नेत्र गिरना बताती हैं।
अंबाजी, आरासुर पहाड़ियाँ (अरावली), गुजरात-राजस्थान सीमा के पास, ज़िला बनासकांठा, गुजरात
अरावली की आरासुर पहाड़ियों पर स्थित अंबाजी में माँ अंबा का प्राचीन मंदिर है। यहाँ कोई मूर्ति नहीं है; ढके हुए श्री वीसा यंत्र की पूजा होती है और गोख को ऐसे सजाते हैं कि दूर से देवी का रूप दिखे। मान्यता है कि यहाँ सती का हृदय गिरा था; गब्बर पर्वत को माता का मूल स्थान माना जाता है।
विशेष पर्व
भादरवी पूनम (भाद्रपद पूर्णिमा) का बड़ा मेला, जिसमें कई भक्त पैदल आते हैं; नवरात्रि में गरबा; दीपावली
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; भादरवी पूनम (प्रायः सितंबर) और नवरात्रि पर बड़े आयोजन
कैसे पहुँचें
आबू रोड रेलवे स्टेशन लगभग 20 किमी, पालनपुर लगभग 65 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा अहमदाबाद, लगभग 180 किमी
ध्यान दें: गर्भगृह में फ़ोटो खींचना मना है।
मान्यताओं में अंतर: झारखंड के देवघर (बैद्यनाथ धाम) को भी वह स्थान माना जाता है जहाँ सती का हृदय गिरा था। कुछ परंपराएँ अंबाजी में हृदय की जगह दाहिनी भुजा गिरने की बात भी कहती हैं।
पावागढ़ पहाड़ी की चोटी, चांपानेर के पास, ज़िला पंचमहाल, गुजरात
पंचमहाल जिले में लगभग 800 मीटर ऊँची पावागढ़ पहाड़ी की चोटी पर माँ कालिका (महाकाली) का मंदिर है, जो यूनेस्को विश्व धरोहर चांपानेर-पावागढ़ पुरातत्व उद्यान में आता है। गर्भगृह में माता के लाल रंग के मुख (मुखवटो) की पूजा होती है। मान्यता है कि यहाँ सती के दाहिने पैर का अंगूठा गिरा था। 2022 में मंदिर का नया शिखर बना।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि; नवरात्रि की रातों में गरबा और डांडिया
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; सबसे अधिक भक्त नवरात्रि में आते हैं; अक्टूबर से फ़रवरी मौसम सुहावना
कैसे पहुँचें
चांपानेर रोड रेलवे स्टेशन लगभग 25 किमी; वडोदरा हवाई अड्डा लगभग 48 किमी, वडोदरा जंक्शन बड़ा रेलवे स्टेशन
ध्यान दें: सड़क पहाड़ी के बीच तक जाती है; आगे लगभग 5 किमी का पैदल जंगल रास्ता है, या रोपवे से जा सकते हैं।
मान्यताओं में अंतर: कोलकाता के कालीघाट को भी वह स्थान माना जाता है जहाँ सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरी थीं।
भारत के दक्षिणी छोर पर, जहाँ बंगाल की खाड़ी, अरब सागर और हिंद महासागर मिलते हैं, देवी कन्याकुमारी का मंदिर है। कथा है कि बाणासुर का वध करने के लिए देवी ने कुमारी रूप लिया; शिव जी से उनका विवाह शुभ मुहूर्त निकल जाने से नहीं हो सका। मान्यता है कि यहाँ सती की पीठ (रीढ़) गिरी थी।
विशेष पर्व
नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर), वैशाख उत्सव (मई-जून) में देवी की नौका यात्रा, आडि मास का कलभम (चंदन लेप)
कब जाएँ
नवंबर से मार्च मौसम ठंडा और सुहावना; गर्मियों में बहुत गर्मी रहती है
कैसे पहुँचें
कन्याकुमारी रेलवे स्टेशन लगभग 1 किमी; तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा लगभग 90 किमी
ध्यान दें: मंदिर का पूर्वी द्वार सामान्यतः बंद रहता है और वर्ष में कुछ विशेष दिनों पर ही खुलता है; दर्शन दूसरे द्वार से होते हैं।
हिंगोल नदी के किनारे पहाड़ी गुफा, हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान, मकरान तट, बलूचिस्तान, ज़िला लसबेला, पाकिस्तान
पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हिंगोल नदी के किनारे एक पहाड़ी गुफा में माँ हिंगलाज का प्राचीन स्थान है। मान्यता है कि यहाँ सती का ब्रह्मरंध्र (सिर का ऊपरी भाग) गिरा था। स्थानीय बलोच मुसलमान भी देवी को 'नानी' कहकर आदर देते हैं। दुर्गा चालीसा में 'हिंगलाज में तुम्हीं भवानी' कहकर इनकी महिमा गाई गई है।
विशेष पर्व
अप्रैल के आसपास होने वाली वार्षिक हिंगलाज यात्रा (मेला); नवरात्रि में विशेष पूजा
कब जाएँ
वार्षिक हिंगलाज यात्रा प्रायः अप्रैल में होती है, तभी सबसे अधिक श्रद्धालु पहुँचते हैं
कैसे पहुँचें
कराची से मकरान कोस्टल हाईवे होकर लगभग 330 किमी (लगभग 4 घंटे); नज़दीकी बड़ा हवाई अड्डा और रेलवे स्टेशन कराची
ध्यान दें: भारत से पासपोर्ट और पाकिस्तान का वीज़ा चाहिए; 2014 में संसद को बताया गया कि हिंगलाज तीर्थ-वीज़ा वाली सूची में नहीं है।
माताबाड़ी, उदयपुर के पास पहाड़ी पर, ज़िला गोमती, त्रिपुरा
गोमती जिले में उदयपुर के पास कछुए की पीठ जैसी पहाड़ी पर माँ त्रिपुरा सुंदरी का मंदिर है, इसलिए इसे कूर्म पीठ कहते हैं; लोग इसे माताबाड़ी कहते हैं। महाराजा धन्य माणिक्य ने इसे 1501 में बनवाया। मान्यता है कि यहाँ सती का दाहिना पैर गिरा था। गर्भगृह में बड़ी मूर्ति के साथ 'छोटो-माँ' की छोटी मूर्ति भी है।
विशेष पर्व
दीपावली पर बड़ा मेला; नवरात्रि; माघ पूर्णिमा पर ललिता जयंती
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; अक्टूबर से मार्च मौसम सुहावना; दीपावली मेले के समय विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
अगरतला से लगभग 55 किमी और उदयपुर शहर से लगभग 5 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा अगरतला, जहाँ से रेल और सड़क दोनों मार्ग हैं
मान्यताओं में अंतर: राजस्थान के बांसवाड़ा जिले का त्रिपुरा सुंदरी मंदिर भी कुछ सूचियों में शक्तिपीठ गिना जाता है; वह एक अलग मंदिर है। 'सती का दाहिना पैर' वाली मान्यता त्रिपुरा के उदयपुर से जुड़ी है।
रजरप्पा, दामोदर और भैरवी नदियों के संगम पर, ज़िला रामगढ़, झारखंड
रामगढ़ जिले में दामोदर और भैरवी (भेड़ा) नदियों के संगम पर एक टीले पर माँ छिन्नमस्तिका का मंदिर है; छिन्नमस्ता दस महाविद्याओं में से एक हैं। यहाँ अष्टधातु के आवरण से ढकी प्राकृतिक शिला की देवी रूप में पूजा होती है। परिसर में सूर्य, हनुमान और शिव जी के मंदिर हैं, और पास में अन्य महाविद्याओं के मंदिर भी हैं।
विशेष पर्व
मकर संक्रांति (जनवरी) का बड़ा मेला, विजयादशमी का मेला; अमावस्या और पूर्णिमा की रातों को बहुत भक्त आते हैं
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; सर्दियों में मौसम सुहावना रहता है, तब पास का गर्म पानी का कुंड भी लोकप्रिय है
कैसे पहुँचें
रामगढ़ कैंट रेलवे स्टेशन लगभग 28 किमी, जहाँ से टैक्सी-जीप मिलती है; नज़दीकी हवाई अड्डा रांची, लगभग 70 किमी
मान्यताओं में अंतर: 51 शक्तिपीठों की प्रचलित सूचियों में रजरप्पा का नाम नहीं मिलता; उनमें छिन्नमस्तिका पीठ हिमाचल प्रदेश के चिंतपूर्णी को माना जाता है। फिर भी स्थानीय मान्यता में इसे पूर्वी भारत के सबसे पूज्य शक्तिपीठों में गिना जाता है।
तुलजापुर, यमुनाचल पहाड़ी (बालाघाट श्रेणी), ज़िला धाराशिव (उस्मानाबाद), महाराष्ट्र
तुलजापुर में बालाघाट पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर देवी दुर्गा के तुलजा भवानी रूप को समर्पित है, जो महाराष्ट्र के अनेक परिवारों की कुलदेवी हैं। आठ भुजाओं वाली ग्रेनाइट की स्वयंभू मूर्ति के पास महिषासुर का सिर दिखता है। कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज यहाँ अक्सर दर्शन को आते थे।
विशेष पर्व
नवरात्रि और दशहरे पर बड़ा मेला, कोजागिरी पूर्णिमा
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी अच्छा; नवरात्रि और कोजागिरी पूर्णिमा पर विशेष उत्सव
कैसे पहुँचें
धाराशिव (उस्मानाबाद) रेलवे स्टेशन लगभग 25 किमी, सोलापुर रेलवे स्टेशन लगभग 45 किमी
सप्तशृंगी गढ़, नांदुरी (वणी के पास), ज़िला नासिक, महाराष्ट्र
नासिक से लगभग 60 किमी दूर सह्याद्रि की सात चोटियों के बीच सप्तशृंगी देवी का मंदिर है। अठारह भुजाओं वाली देवी महिषासुरमर्दिनी रूप में हैं और मूर्ति सिंदूर से लेपी रहती है। मान्यता है कि यहाँ सती की दाहिनी भुजा गिरी थी; इसे महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में आधा पीठ माना जाता है।
विशेष पर्व
चैत्रोत्सव (राम नवमी से चैत्र पूर्णिमा), आश्विन नवरात्रि, कोजागिरी पूर्णिमा
कब जाएँ
पूरे वर्ष; चैत्रोत्सव और आश्विन नवरात्रि में विशेष उत्सव
कैसे पहुँचें
नासिक रोड रेलवे स्टेशन और नासिक (ओझर) हवाई अड्डा; मंदिर नासिक से लगभग 60 किमी
ध्यान दें: मंदिर तक 500 से अधिक सीढ़ियाँ हैं; 2018 से फ़्यूनिकुलर ट्रॉली भी चलती है।
मान्यताओं में अंतर: मंदिर का आधिकारिक पक्ष इसे पूर्ण शक्तिपीठ बताता है, जबकि प्रचलित परंपरा इसे आधा पीठ मानती है।
सालासर-लक्ष्मणगढ़ मार्ग, सालासर, ज़िला चूरू, राजस्थान
सालासर धाम से लक्ष्मणगढ़ की ओर लगभग 2 किमी पर हनुमान जी की माता अंजनी का मंदिर है, जहाँ चतुर्भुज माता अंजनी की गोद में बाल हनुमान विराजमान हैं। बहुत से श्रद्धालु बालाजी के साथ माता अंजनी के दर्शन भी करते हैं। सुहागिनें सुखी दांपत्य की कामना से यहाँ पूजा करती हैं।
विशेष पर्व
हनुमान जयंती मुख्य पर्व है; सुहागिनें नारियल और सुहाग की सामग्री चढ़ाती हैं।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुहावना रहता है।
कैसे पहुँचें
सालासर से लगभग 2 किमी (लक्ष्मणगढ़ मार्ग पर)। नज़दीकी रेलवे स्टेशन सुजानगढ़, हवाई अड्डा जयपुर।
जीणमाता गाँव, अरावली की पहाड़ियाँ, ज़िला सीकर, राजस्थान
सीकर से लगभग 29 किमी दक्षिण में अरावली की पहाड़ियों पर जीण माता का प्राचीन मंदिर है; इन्हें शक्ति का रूप माना जाता है। लोककथा है कि जीण अपने भाई हर्ष से रूठकर काजल शिखर पर तप करने लगीं, और हर्ष ने पास के पर्वत पर भैरव की तपस्या की।
विशेष पर्व
चैत्र और आश्विन के नवरात्र में सबसे अधिक श्रद्धालु आते हैं।
कब जाएँ
नवरात्र के समय, या अक्टूबर से मार्च।
कैसे पहुँचें
सीकर से लगभग 29 किमी, जयपुर से लगभग 108 किमी। नज़दीकी बड़ा रेलवे स्टेशन सीकर, हवाई अड्डा जयपुर।
उदयपुरवाटी के पास अरावली की घाटी में सकराय गाँव में शाकम्भरी माता का प्राचीन मंदिर है, जिसे सकराय माता भी कहते हैं। गर्भगृह में ब्रह्माणी और रुद्राणी की आठ भुजाओं वाली जुड़वाँ प्रतिमाएँ हैं, जिनमें देवी सिंह पर सवार होकर महिषासुर का वध करती दिखाई गई हैं।
विशेष पर्व
दोनों नवरात्रों में विशेष भीड़ रहती है; भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को मेला भरता है।
कब जाएँ
नवरात्र के समय, या अक्टूबर से मार्च।
कैसे पहुँचें
उदयपुरवाटी के पास। नज़दीकी रेलवे स्टेशन सीकर या झुंझुनूं, हवाई अड्डा जयपुर।
मान्यताओं में अंतर: जयपुर ज़िले में सांभर झील के पास शाकम्भरी माता का एक अलग प्राचीन मंदिर है; दोनों अलग स्थान हैं।
झुंझुनूं शहर के इस मंदिर में नारायणी देवी की ‘रानी सती दादी’ के नाम से पूजा होती है। मारवाड़ी परिवारों में इनकी विशेष मान्यता है, और अनेक परिवार इन्हें कुलदेवी मानते हैं। सफ़ेद संगमरमर से बने मंदिर में देवी का प्रतीक त्रिशूल पूजा जाता है; परिसर में हनुमान, गणेश, शिव और ठाकुर जी के मंदिर भी हैं।
विशेष पर्व
भाद्रपद अमावस्या को मंदिर में विशेष पूजन होता है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुहावना रहता है।
कैसे पहुँचें
झुंझुनूं शहर में; नज़दीकी रेलवे स्टेशन झुंझुनूं। हवाई अड्डा जयपुर (झुंझुनूं से लगभग 190 किमी)।
ध्यान दें: भारत में सती प्रथा और उसका महिमामंडन कानून द्वारा प्रतिबंधित है।
आमेर महल परिसर में शिला देवी का मंदिर है, जहाँ देवी दुर्गा के रूप की पूजा होती है। शिला देवी को आमेर-जयपुर राजपरिवार की आराध्य देवी माना जाता है। प्रचलित मान्यता है कि यह प्रतिमा राजा मान सिंह प्रथम बंगाल से लाए थे।
विशेष पर्व
चैत्र और आश्विन नवरात्र में विशेष पूजा होती है और भक्तों की भीड़ रहती है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; नवरात्र में विशेष दर्शन।
कैसे पहुँचें
जयपुर शहर के केंद्र से लगभग 11 किमी, आमेर में। नज़दीकी रेलवे स्टेशन जयपुर जंक्शन, हवाई अड्डा जयपुर।
ध्यान दें: मंदिर आमेर महल के भीतर ऊँचाई पर है; बुज़ुर्गों के लिए चढ़ाई थकाने वाली हो सकती है।
कैलादेवी गाँव, कालीसिल नदी के किनारे, ज़िला करौली, राजस्थान
करौली से लगभग 23 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों में कालीसिल नदी के किनारे कैला देवी का मंदिर है। यहाँ कैला देवी और चामुंडा देवी की प्रतिमाएँ हैं; कैला देवी को महालक्ष्मी और योगमाया का रूप माना जाता है। वर्तमान मंदिर 18वीं सदी में करौली के महाराजा गोपाल सिंह ने बनवाया।
विशेष पर्व
चैत्र मास में लगभग पंद्रह दिन का वार्षिक मेला भरता है।
कब जाएँ
चैत्र मेले के समय, या अक्टूबर से मार्च।
कैसे पहुँचें
नज़दीकी रेलवे स्टेशन गंगापुर सिटी (लगभग 34 किमी), हिंडौन सिटी (लगभग 58 किमी)। हवाई अड्डा जयपुर (लगभग 170 किमी)।
बीकानेर से लगभग 30 किमी दूर देशनोक में करणी माता का मंदिर है; करणी माता 14वीं सदी की संत थीं, जिन्हें माँ दुर्गा का अवतार माना जाता है। मंदिर में हज़ारों चूहे रहते हैं, जिन्हें ‘काबा’ कहकर पवित्र माना जाता है। वर्तमान मंदिर बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने बनवाया था।
विशेष पर्व
चैत्र और आश्विन नवरात्र में मेले भरते हैं; सफ़ेद चूहे का दिखना बहुत शुभ माना जाता है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च का मौसम अच्छा रहता है; गर्मियों में बहुत तेज़ गर्मी पड़ती है।
कैसे पहुँचें
बीकानेर से लगभग 30 किमी; देशनोक में रेलवे स्टेशन है। नज़दीकी बड़ा शहर बीकानेर।
ध्यान दें: मंदिर में जूते-चप्पल बाहर उतारने होते हैं; चूहे खुले घूमते हैं, इसलिए ध्यान से चलें।
तनोट, भारत-पाकिस्तान सीमा के पास, ज़िला जैसलमेर, राजस्थान
जैसलमेर से लगभग 120 किमी दूर, भारत-पाकिस्तान सीमा के पास तनोट माता का मंदिर है; इन्हें देवी दुर्गा का स्थानीय रूप माना जाता है। मान्यता है कि 1965 और 1971 के युद्धों में मंदिर के आसपास गिरे बम नहीं फटे। ऐसे बम मंदिर के संग्रहालय में रखे गए हैं।
विशेष पर्व
नवरात्र में मंदिर दीपों से सजाया जाता है और विशेष पूजा होती है।
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च; गर्मियों में तापमान बहुत अधिक रहता है।
कैसे पहुँचें
जैसलमेर से लगभग 120 किमी। नज़दीकी रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा जैसलमेर; जोधपुर हवाई अड्डा भी विकल्प है।
ध्यान दें: तनोट से आगे सीमा क्षेत्र देखने के लिए पहले से अधिकारियों की अनुमति ज़रूरी है।
विंध्याचल, गंगा तट, ज़िला मिर्ज़ापुर, उत्तर प्रदेश
मिर्ज़ापुर से लगभग 8 किमी दूर गंगा किनारे विंध्याचल में माँ विंध्यवासिनी का मंदिर है, जिसे शक्तिपीठ और सिद्धपीठ माना जाता है। कथा है कि कृष्ण जन्म के समय नंद-यशोदा की पुत्री योगमाया कंस के हाथ से छूटकर आकाश में गईं और फिर विंध्य पर्वत पर बस गईं।
विशेष पर्व
चैत्र और आश्विन नवरात्रि में बड़े मेले; ज्येष्ठ में कजली
कब जाएँ
चैत्र और आश्विन नवरात्रि विशेष; अक्टूबर से मार्च मौसम अच्छा
कैसे पहुँचें
विंध्याचल और मिर्ज़ापुर रेलवे स्टेशन; नज़दीकी हवाई अड्डा वाराणसी (वाराणसी लगभग 65 किमी, प्रयागराज लगभग 85 किमी)
ध्यान दें: भक्त परिक्रमा में अष्टभुजा देवी (सरस्वती) और काली खोह मंदिरों के भी दर्शन करते हैं।
दक्षिणेश्वर, हुगली नदी के किनारे, ज़िला उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल
कोलकाता के उत्तर में हुगली नदी के किनारे दक्षिणेश्वर में माँ भवतारिणी काली का प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे रानी रासमणि ने 1855 में बनवाया था। श्री रामकृष्ण परमहंस ने यहीं माँ काली की पूजा और साधना की, इसलिए उनके भक्तों के लिए भी यह स्थान बहुत पवित्र है।
विशेष पर्व
काली पूजा (दीपावली की अमावस्या) और नवरात्रि
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी, जब मौसम सुहावना रहता है
कैसे पहुँचें
दक्षिणेश्वर रेलवे स्टेशन और मेट्रो स्टेशन पास में; हावड़ा और सियालदह बड़े स्टेशन; कोलकाता हवाई अड्डा
कालीघाट, आदि गंगा के किनारे, कोलकाता, पश्चिम बंगाल
कोलकाता के कालीघाट में आदि गंगा के किनारे माँ काली का प्राचीन शक्तिपीठ है, जिसे कालीपीठ भी कहते हैं। मान्यता है कि यहाँ सती के दाहिने पैर की उँगलियाँ गिरी थीं। यहाँ देवी को कालिका (दक्षिणा काली) और भैरव को नकुलेश्वर कहा जाता है।
विशेष पर्व
काली पूजा (दीपावली की अमावस्या) और नवरात्रि
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी, जब मौसम सुहावना रहता है
कैसे पहुँचें
शहर के भीतर; नज़दीकी मेट्रो स्टेशन कालीघाट; हावड़ा और सियालदह बड़े रेलवे स्टेशन; कोलकाता हवाई अड्डा
बनेर नदी का तट, धर्मशाला और पालमपुर के बीच, ज़िला कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश
धर्मशाला से लगभग 15 किमी दूर बनेर नदी के तट पर स्थित इस धाम में देवी चामुंडा के साथ गुफा में स्वयंभू शिवलिंग रूप में नंदिकेश्वर महादेव पूजे जाते हैं, इसलिए इसे चामुंडा नंदिकेश्वर धाम कहते हैं। देवी महात्म्य के अनुसार चंड और मुंड असुरों का वध करने से देवी चामुंडा कहलाईं। मंदिर लगभग 400 वर्ष पुराना माना जाता है।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि, श्रावण की गुप्त नवरात्रि, शिवरात्रि; चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर ध्वजारोहण
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष रौनक
कैसे पहुँचें
नज़दीकी हवाई अड्डा गग्गल (कांगड़ा) लगभग 25 किमी; बड़ी रेल लाइन का स्टेशन पठानकोट लगभग 90 किमी, छोटी लाइन का कांगड़ा स्टेशन लगभग 14 किमी
ध्यान दें: पुराना मूल स्थान, आदि हिमानी चामुंडा, धौलाधार पर्वत पर है; वहाँ तक लगभग 16 किमी की कठिन चढ़ाई है।
मान्यताओं में अंतर: स्थानीय परंपरा इसे शक्तिपीठ मानती है और यह हिमाचल के प्रमुख शक्ति मंदिरों में गिना जाता है, पर 51 या 52 शक्तिपीठों की पारंपरिक सूचियों में इसका नाम नहीं आता।
बिल्व पर्वत (शिवालिक पहाड़ियाँ), हरिद्वार, उत्तराखंड
हरिद्वार में शिवालिक पहाड़ियों की बिल्व पर्वत चोटी पर माता मनसा देवी का मंदिर है, जिसे हरिद्वार के पंच तीर्थों में और चंडी देवी व माया देवी के साथ सिद्धपीठों में गिना जाता है। मनसा का अर्थ है मन की इच्छा; भक्त मंदिर के पेड़ पर धागा बाँधकर मनौती माँगते हैं और मनोकामना पूरी होने पर उसे खोलने आते हैं।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशेष पूजा
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; नवरात्रि में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
हरिद्वार रेलवे स्टेशन लगभग 3 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा जॉली ग्रांट (देहरादून)
ध्यान दें: मंदिर तक लगभग 3 किमी की पैदल चढ़ाई है; उड़न खटोला (रोपवे) से भी पहुँचा जा सकता है।
कालकाजी, नेहरू प्लेस के सामने, दक्षिण दिल्ली, ज़िला दक्षिण-पूर्वी दिल्ली, दिल्ली
दक्षिण दिल्ली में नेहरू प्लेस के सामने स्थित इस मंदिर में माँ कालका (काली) की पूजा होती है; कालकाजी इलाके का नाम इसी मंदिर से पड़ा। कथा है कि देवी ने यहीं रक्तबीज का संहार किया था। माना जाता है कि मंदिर का पुराना भाग 1764 में मराठों ने बनवाया और 1816 में राजा केदारनाथ ने इसका विस्तार कराया।
विशेष पर्व
चैत्र और शारदीय नवरात्रि में बड़ा मेला
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; दोनों नवरात्रि में विशेष रौनक
कैसे पहुँचें
मंदिर के पास कालकाजी मंदिर मेट्रो स्टेशन; नज़दीकी रेलवे स्टेशन ओखला और हज़रत निज़ामुद्दीन; हवाई अड्डा इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय, नई दिल्ली
मदुरै शहर का मध्य भाग, वैगई नदी के दक्षिण में, तमिलनाडु
मदुरै में वैगई नदी के दक्षिणी किनारे पर स्थित इस विशाल मंदिर में देवी मीनाक्षी (पार्वती का रूप) और भगवान सुंदरेश्वर (शिव) विराजते हैं। कथा है कि पांड्य राजा मलयध्वज के घर जन्मी मीनाक्षी का विवाह यहीं शिव जी से हुआ। मंदिर में 14 गोपुरम हैं; सबसे ऊँचा दक्षिणी गोपुरम लगभग 52 मीटर का है।
विशेष पर्व
चित्तिरै उत्सव (अप्रैल-मई) में मीनाक्षी तिरुकल्याणम; नवरात्रि; थाई मास (जनवरी-फ़रवरी) का तेप्पम (नौका) उत्सव
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; अक्टूबर से मार्च मौसम अपेक्षाकृत ठंडा; चित्तिरै उत्सव (अप्रैल-मई) सबसे बड़ा आयोजन
कैसे पहुँचें
मदुरै जंक्शन रेलवे स्टेशन शहर के भीतर ही है; मदुरै हवाई अड्डा शहर के केंद्र से लगभग 12 किमी दक्षिण में
मान्यताओं में अंतर: कुछ परंपराएँ और मंदिर-परिचय इसे 'राजमातंगी श्यामला पीठ' नाम से शक्तिपीठ बताते हैं, पर 51 शक्तिपीठों की प्रचलित सूचियों में मदुरै का नाम नहीं मिलता।
कोल्लूर, सौपर्णिका नदी के किनारे, कोडचाद्री पहाड़ी की तलहटी, ज़िला उडुपी, कर्नाटक
पश्चिमी घाट में कोडचाद्री पहाड़ी की तलहटी पर, सौपर्णिका नदी के किनारे कोल्लूर में देवी मूकांबिका का मंदिर है। यहाँ स्वयंभू लिंग पूजा जाता है, जिसे एक सुनहरी रेखा दो भागों में बाँटती है। कथा है कि देवी ने यहाँ मूकासुर (कौमासुर) का वध किया। मान्यता है कि देवी की पंचलोह मूर्ति आदि शंकराचार्य ने स्थापित की थी।
विशेष पर्व
नवरात्रि; विजयादशमी पर बच्चों का विद्यारंभ (अक्षर-आरंभ); फाल्गुन मास का वार्षिक रथोत्सव
कब जाएँ
पूरे वर्ष दर्शन; नवरात्रि और फाल्गुन मास (मार्च के आसपास) के वार्षिक रथोत्सव में सबसे अधिक भक्त आते हैं
कैसे पहुँचें
मूकांबिका रोड (बैंदूर) रेलवे स्टेशन लगभग 30 किमी, कुंदापुर लगभग 36 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा मंगलूरु, लगभग 130 किमी