- कब
- साल में दो बार प्रमुख रूप से: चैत्र नवरात्रि (चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से नवमी — इसी दिन हिंदू नववर्ष और विक्रम संवत का आरंभ होता है, और नवमी को राम नवमी) और शारदीय नवरात्रि (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी, दसवें दिन विजयादशमी)। माघ और आषाढ़ में ‘गुप्त नवरात्रि’ भी आती हैं, जो विशेष साधना के लिए मानी जाती हैं। तिथि घटने-बढ़ने से कभी नवरात्रि 8 या 10 दिन की भी होती है — घटस्थापना का मुहूर्त पंचांग से देखें।
- पूजनीय
- माँ दुर्गा (नवदुर्गा)
अगली तिथियाँ
- 7अप्रैल चैत्र नवरात्रि आरंभ (घटस्थापना)बुधवार · हिंदू नववर्ष
- 30सितंबर शारदीय नवरात्रि आरंभ (घटस्थापना)गुरुवार
- 7अक्टूबर दुर्गा अष्टमीगुरुवार
- 8अक्टूबर महानवमीशुक्रवार
अगली तिथि के लिए पंडित जी से पूछें।
पूरा पंचांग देखेंनवरात्रि का महत्व
नवरात्रि का अर्थ है ‘नौ रातें’। इन नौ दिनों में माँ दुर्गा के नौ रूपों — शैलपुत्री से सिद्धिदात्री तक — की क्रम से पूजा होती है। मान्यता है कि इन दिनों माँ अपने भक्तों के घर पधारती हैं, इसलिए घर को साफ़ करके, कलश स्थापित करके और दीप जलाकर उनका स्वागत किया जाता है।
दुर्गा सप्तशती (मार्कण्डेय पुराण का अंश) में कथा आती है कि जब असुरों के अत्याचार से देवता हार गए, तब सब देवताओं के तेज से एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई — वही माँ दुर्गा हैं। उन्होंने महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, चंड-मुंड और रक्तबीज जैसे असुरों का अंत किया। इसीलिए नवरात्रि बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि हर मनुष्य के भीतर भी ‘असुर’ हैं — क्रोध, लोभ, आलस्य और अहंकार। नौ दिन का संयम, सात्त्विक भोजन, जप और पाठ इन्हें जीतने का अभ्यास है। चैत्र नवरात्रि नए वर्ष की शुरुआत है और शारदीय नवरात्रि वर्षा के बाद नई ऋतु की। ऋतु बदलते समय हल्का भोजन और संयम शरीर के लिए भी अच्छा माना गया है।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
दुर्गा सप्तशती (नारायणी स्तुति)
अर्थ:हे सब मंगलों का भी मंगल करने वाली, कल्याणमयी, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी — आपको नमस्कार है।
व्रत अपनी क्षमता से रखें। कोई नौ दिन फलाहार करता है, कोई केवल पहले और अंतिम दिन (प्रतिपदा और अष्टमी या नवमी) व्रत रखता है, और कोई एक समय सात्त्विक भोजन करता है। माँ भाव देखती हैं, भूख नहीं।
पंडित जी से सुनिए
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- प्रतिपदा की सुबह स्नान करके घर और पूजा-स्थान की अच्छी तरह सफ़ाई करें। ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में चौकी रखकर लाल कपड़ा बिछाएँ।
- मिट्टी के पात्र में मिट्टी भरकर जौ बोएँ और हल्का जल छिड़कें। ये जौ नौ दिनों में हरे होकर बढ़ते हैं — इन्हें ‘जवारे’ या ‘खेतरी’ कहते हैं।
- घटस्थापना: शुभ मुहूर्त में कलश में जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का, अक्षत और हल्दी डालें। कलश के मुँह पर आम के पत्ते रखें और उन पर लाल चुनरी में लिपटा नारियल रखें। कलश पर मौली बाँधें और रोली से स्वस्तिक बनाएँ। कलश को जवारे वाले पात्र के पास या उसके बीच में स्थापित करें।
- हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें — अपना नाम, गोत्र और मनोकामना बोलकर कहें कि मैं नौ दिन श्रद्धा से माँ की उपासना करूँगा/करूँगी।
- पहले गणेश जी का स्मरण करें, फिर कलश में वरुण देव और सब देवताओं का आवाहन करें। इसके बाद माँ दुर्गा की प्रतिमा या चित्र स्थापित करके उन्हें चुनरी और शृंगार अर्पित करें।
- घी का दीपक जलाएँ। जो अखंड ज्योति का संकल्प लें, वे घी और बत्ती का प्रबंध पहले से रखें, दीपक को हवा से बचाने के लिए काँच की चिमनी रखें और सुरक्षा का पूरा ध्यान रखें।
- हर दिन सुबह और शाम उस दिन के रूप का ध्यान करें (नीचे ‘नौ दिन, नौ रूप’ देखें) और रोली-अक्षत, फूल, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- सामर्थ्य हो तो रोज़ दुर्गा सप्तशती का पाठ करें, या नवार्ण मंत्र का जप करें। समय कम हो तो दुर्गा चालीसा और ‘या देवी सर्वभूतेषु…’ का पाठ भी श्रद्धा से पर्याप्त है।
- रोज़ जवारों में थोड़ा जल दें और सुबह-शाम माँ की आरती करें।
- अष्टमी (दुर्गाष्टमी) या नवमी को कन्या पूजन करें: 2 से 10 वर्ष की 9 कन्याओं और एक बालक (लांगुर, भैरव का रूप) को आदर से बुलाएँ, पैर धुलाएँ, तिलक करें, हलवा-पूरी-चने का भोजन कराएँ, उपहार और दक्षिणा देकर पैर छूकर विदा करें।
- परिवार की परंपरा के अनुसार अष्टमी या नवमी को हवन करें, फिर व्रत का पारण करें।
- दशमी को कलश का जल आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़कें, कलश का नारियल प्रसाद के रूप में बाँटें और जवारों को आदर से बहते जल में प्रवाहित करें या किसी पेड़ की जड़ में रख दें। माँ से अगले वर्ष फिर पधारने की प्रार्थना करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- फल, दूध, दही, छाछ, मखाना, मूँगफली
- कुट्टू, सिंघाड़ा या राजगिरा का आटा, साबूदाना, समा के चावल (व्रत के चावल)
- उबले आलू, शकरकंद, अरबी, लौकी, कद्दू
- सेंधा नमक, काली मिर्च, जीरा
- नारियल पानी और नींबू पानी — शरीर में पानी की कमी न होने दें
क्या न खाएँ
- अनाज और दालें (गेहूँ, चावल, दाल) — व्रत रखने वाले के लिए
- साधारण नमक (सेंधा नमक लें)
- प्याज़ और लहसुन
- मांस, मछली, अंडा, शराब और हर प्रकार का नशा — पूरे घर में
- बहुत तला-भुना, बासी या पैकेट वाला ‘व्रत का नमकीन’ बार-बार
अन्य नियम
- घर में कलह न करें; वाणी मधुर रखें
- ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करें
- अखंड ज्योति हो तो घर को पूरी तरह ख़ाली न छोड़ें
- कन्याओं और स्त्रियों का सम्मान करें — यही नवरात्रि की असली पूजा है
- बाल-दाढ़ी न कटवाना या ज़मीन पर सोना जैसे नियम कई परिवार मानते हैं — यह अपनी परंपरा का विषय है, अनिवार्य नहीं
मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
अर्थ:माँ के तीन स्वरूपों — महासरस्वती (ऐं — ज्ञान), महालक्ष्मी (ह्रीं — ऐश्वर्य) और महाकाली (क्लीं — शक्ति) — के बीज अक्षरों के साथ माँ चामुंडा को नमन। ‘विच्चे’ का भाव माना जाता है — माँ, मेरे बंधन और कष्ट काट दो।
जप: नवरात्रि में रोज़ 1 से 11 माला (108 की माला)। सवा लाख जप जैसे अनुष्ठान की विधि पंडित जी से समझकर ही करें।
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥
अर्थ:जो देवी सब प्राणियों में शक्ति के रूप में स्थित हैं, उन्हें बार-बार नमस्कार है। (दुर्गा सप्तशती में ‘शक्तिरूपेण’ की जगह ‘मातृरूपेण’, ‘बुद्धिरूपेण’, ‘शान्तिरूपेण’ आदि बोलकर भी स्तुति की गई है।)
जप: रोज़ पूजा के अंत में 3 या 11 बार।
महिषासुर वध की कथा (दुर्गा सप्तशती से)
बहुत पहले महिषासुर नाम का एक बलवान असुर था, जिसका एक रूप भैंसे (महिष) का था। प्रचलित कथा के अनुसार उसने कठोर तप करके ब्रह्मा जी से वरदान लिया था कि कोई देवता या पुरुष उसे न मार सके — उसे लगता था कि कोई स्त्री उसे क्या हरा पाएगी! वरदान के घमंड में उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया।
दुर्गा सप्तशती बताती है कि देवताओं और असुरों के बीच पूरे सौ वर्ष तक युद्ध चला। अंत में इंद्र सहित सब देवता हार गए। महिषासुर स्वयं इंद्र के आसन पर बैठ गया और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया। दुखी देवता ब्रह्मा जी को आगे करके भगवान शिव और भगवान विष्णु के पास पहुँचे और अपनी व्यथा सुनाई।
देवताओं का दुख सुनकर शिव जी और विष्णु जी को बहुत क्रोध आया। उनके मुख से एक महान तेज निकला। ब्रह्मा जी, इंद्र और सब देवताओं के शरीर से भी तेज निकला। यह सारा तेज एक जगह इकट्ठा होकर जलते पर्वत की तरह चमकने लगा, जिसकी ज्वालाएँ दसों दिशाओं में फैल गईं। उसी तेज से एक दिव्य नारी प्रकट हुईं — यही आदिशक्ति माँ दुर्गा थीं।
सप्तशती में सुंदर वर्णन है कि शिव जी के तेज से माँ का मुख बना, यमराज के तेज से केश, विष्णु जी के तेज से भुजाएँ और ब्रह्मा जी के तेज से चरण। फिर देवताओं ने अपने-अपने अस्त्र माँ को अर्पित किए — शिव जी ने त्रिशूल, विष्णु जी ने चक्र, वरुण देव ने शंख, अग्निदेव ने शक्ति, वायुदेव ने धनुष-बाण, इंद्र ने वज्र और ऐरावत हाथी का घंटा, यमराज ने कालदंड और ब्रह्मा जी ने कमंडलु दिया। पर्वतराज हिमालय ने सवारी के लिए सिंह दिया।
माँ ने ऊँचे स्वर में अट्टहास किया तो पृथ्वी काँप उठी और समुद्र उछलने लगे। महिषासुर की विशाल सेना माँ से लड़ने आई। चिक्षुर, चामर, उदग्र जैसे बड़े-बड़े सेनापति आए। माँ ने अपने अस्त्रों से और उनके सिंह ने अपने पंजों से एक-एक करके सबका अंत कर दिया। माँ की साँसों से ही सैकड़ों-हज़ारों गण प्रकट होकर युद्ध करने लगे।
अंत में महिषासुर स्वयं आया। वह छल से रूप बदलता रहा — कभी भैंसा बनता, कभी सिंह, कभी हाथ में तलवार लिए पुरुष, कभी विशाल हाथी। माँ ने हर रूप को परास्त किया। जब वह फिर भैंसे के रूप में गरजता हुआ आया, तो माँ उछलकर उस पर चढ़ गईं, चरण से उसकी गर्दन दबाई और त्रिशूल से प्रहार किया। भैंसे के मुख से वह आधा ही बाहर निकल पाया था कि माँ ने तलवार से उसका अंत कर दिया।
देवताओं ने फूल बरसाए, गंधर्व गाने लगे और ऋषियों ने माँ की स्तुति की। प्रसन्न होकर माँ ने वरदान दिया — ‘जब-जब तुम संकट में मुझे याद करोगे, मैं आकर तुम्हारी रक्षा करूँगी।’ महिषासुर का अंत करने के कारण ही माँ को ‘महिषासुरमर्दिनी’ कहा जाता है।
लोक-मान्यता है कि यह युद्ध नौ दिन-रात चला और दसवें दिन माँ की विजय हुई — इसीलिए नवरात्रि के बाद विजयादशमी मनाई जाती है। भगवान राम द्वारा रावण पर विजय का उत्सव भी इसी दिन मनाया जाता है।
कथा का संदेश: जब सबकी शक्ति एक होती है, तभी बड़ा संकट हारता है। और भीतर का ‘महिषासुर’ — अहंकार, जो हर बार नया रूप लेकर आता है — उसे भी माँ की कृपा और अपने संयम से ही जीता जाता है।
नौ दिन, नौ रूप
नवरात्रि के हर दिन माँ के एक रूप की पूजा होती है। उस दिन पूजा से पहले यह ध्यान-श्लोक पढ़ें और माँ के उस रूप को मन की आँखों से देखें। श्लोक कठिन लगे तो केवल अर्थ पढ़कर माँ का ध्यान करें — भाव ही मुख्य है।
पहला दिन (प्रतिपदा) — माँ शैलपुत्री
वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:मनचाहे फल की प्राप्ति के लिए मैं उन यशस्विनी शैलपुत्री को प्रणाम करता हूँ, जिनके मस्तक पर अर्धचंद्र सुशोभित है, जो वृषभ (बैल) पर सवार हैं और हाथ में त्रिशूल धारण करती हैं।
पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने से ‘शैलपुत्री’। पिछले जन्म में यही सती थीं। इनकी पूजा से नवरात्रि आरंभ होती है — यह रूप स्थिरता और दृढ़ संकल्प का है।
दूसरा दिन (द्वितीया) — माँ ब्रह्मचारिणी
दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू। देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:जो अपने कमल जैसे हाथों में जप की माला और कमंडलु धारण करती हैं, वे सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मचारिणी देवी मुझ पर प्रसन्न हों।
शिव जी को पाने के लिए पार्वती जी ने वर्षों कठोर तप किया — उसी तपस्विनी रूप को ब्रह्मचारिणी कहते हैं। यह रूप सिखाता है कि बड़े लक्ष्य के लिए धैर्य और तप चाहिए।
तीसरा दिन (तृतीया) — माँ चंद्रघंटा
पिण्डजप्रवरारूढा चण्डकोपास्त्रकैर्युता। प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:जो श्रेष्ठ वाहन सिंह पर सवार हैं, प्रचंड अस्त्र-शस्त्रों से युक्त हैं और ‘चंद्रघंटा’ नाम से प्रसिद्ध हैं — वे देवी मुझ पर कृपा करें।
इनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसलिए ‘चंद्रघंटा’। यह रूप शांत भी है और दुष्टों के लिए युद्ध को तैयार भी — भक्तों का भय दूर करने वाला।
चौथा दिन (चतुर्थी) — माँ कूष्मांडा
सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च। दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:जो अपने कमल जैसे हाथों में अमृत से भरा कलश और (शक्ति का प्रतीक) रक्त से भरा कलश धारण करती हैं, वे कूष्मांडा देवी मेरे लिए शुभ देने वाली हों।
मान्यता है कि जब सृष्टि नहीं थी और चारों ओर अंधकार था, तब इन्हीं की मंद मुस्कान से ब्रह्मांड (अंड) की रचना हुई — इसलिए ‘कूष्मांडा’। इनका निवास सूर्यमंडल में माना जाता है।
पाँचवाँ दिन (पंचमी) — माँ स्कंदमाता
सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया। शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:जो सदा सिंहासन पर विराजमान रहती हैं और जिनके दोनों हाथों में कमल हैं — वे यशस्विनी स्कंदमाता सदा शुभ देने वाली हों।
भगवान स्कंद (कार्तिकेय) की माता। इनकी गोद में बालरूप स्कंद विराजते हैं। यह रूप माँ के वात्सल्य (ममता) का प्रतीक है।
छठा दिन (षष्ठी) — माँ कात्यायनी
चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहना। कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:जिनके हाथ में चमकती चंद्रहास तलवार है और जो श्रेष्ठ सिंह पर सवार हैं, दानवों का नाश करने वाली वे कात्यायनी देवी शुभ प्रदान करें।
महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर माँ उनकी पुत्री के रूप में प्रकट हुईं — इसलिए ‘कात्यायनी’। श्रीमद्भागवत में कथा है कि ब्रज की गोपियों ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए इन्हीं का व्रत किया था; अच्छे वर की कामना से कन्याएँ इनकी उपासना करती हैं।
सातवाँ दिन (सप्तमी) — माँ कालरात्रि
ॐ देवी कालरात्र्यै नमः
नाम मंत्र
अर्थ:देवी कालरात्रि को नमस्कार है।
माँ का सबसे उग्र रूप — काला वर्ण, बिखरे केश और गधे की सवारी। देखने में भयंकर, पर भक्तों को सदा शुभ फल देने वाली, इसलिए इन्हें ‘शुभंकरी’ भी कहते हैं। यह रूप हर डर और अंधकार का नाश करता है।
आठवाँ दिन (अष्टमी) — माँ महागौरी
श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचिः। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:जो सफ़ेद वृषभ पर सवार हैं, श्वेत वस्त्र धारण करती हैं, पवित्र हैं और महादेव को आनंद देने वाली हैं — वे महागौरी शुभ प्रदान करें।
कथा है कि कठोर तप से माँ का शरीर काला पड़ गया था; शिव जी ने गंगाजल से स्नान कराया तो वे अत्यंत गौर (उजली) हो गईं — इसलिए ‘महागौरी’। यह रूप शांति और पवित्रता का है।
नौवाँ दिन (नवमी) — माँ सिद्धिदात्री
सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी॥
ध्यान श्लोक (परंपरागत)
अर्थ:सिद्ध, गंधर्व, यक्ष, असुर और देवता भी जिनकी सदा सेवा करते हैं, वे सिद्धियाँ देने वाली सिद्धिदात्री देवी मुझे भी सिद्धि (सफलता) प्रदान करें।
सब सिद्धियाँ देने वाली माँ। मान्यता है कि शिव जी को भी इन्हीं की कृपा से सिद्धियाँ मिलीं और उनका आधा शरीर देवी का हुआ — ‘अर्धनारीश्वर’। नवमी को इनकी पूजा के साथ नवरात्रि पूर्ण होती है।
उद्यापन
नवरात्रि का समापन नवमी को हवन और कन्या पूजन से होता है। हवन में दुर्गा सप्तशती के मंत्रों या नवार्ण मंत्र से आहुति दी जाती है; घर पर छोटा हवन भी श्रद्धा से किया जा सकता है।
दशमी को कलश का जल आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़कें और कलश का नारियल प्रसाद के रूप में परिवार में बाँटें। जवारे बहते जल में प्रवाहित करें — कई घरों में स्त्रियाँ इन्हें सिर पर रखकर गीत गाते हुए ले जाती हैं।
भूल हो जाए तो चिंता न करें — पूजा के अंत में क्षमा-प्रार्थना करें। माँ अपने बच्चे की भूल का बुरा नहीं मानतीं।
सावधानी
नौ दिन का व्रत लंबा होता है। बीमार, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर या नियमित दवा लेने वाले लोग फलाहार रखें या केवल पहले और अंतिम दिन का व्रत करें, और डॉक्टर की सलाह ज़रूर लें। दवा कभी न छोड़ें। दिन भर पर्याप्त पानी पिएँ, और अखंड ज्योति को पर्दों और बच्चों की पहुँच से दूर सुरक्षित जगह रखें।
पूजा के अंत में आरती
श्री अम्बे जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।