महाराष्ट्र में देवी के चार बड़े स्थानों को मिलाकर 'साढ़े तीन शक्तिपीठ' कहा जाता है। कोल्हापुर की महालक्ष्मी (अंबाबाई), तुलजापुर की तुलजा भवानी और माहुर की रेणुका माता पूर्ण पीठ माने जाते हैं। नासिक जिले में वणी के पास की सप्तशृंगी देवी को आधा पीठ माना जाता है।
कोल्हापुर के बीचोंबीच स्थित इस मंदिर में देवी महालक्ष्मी विराजती हैं, जिन्हें लोग प्रेम से अंबाबाई कहते हैं। मंदिर चालुक्य काल का माना जाता है और इस स्थान को करवीर पीठ भी कहते हैं। मान्यता है कि यहाँ सती के नेत्र गिरे थे; यह महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में भी गिना जाता है।
विशेष पर्व
नवरात्रि, चैत्र मास का रथोत्सव और किरणोत्सव (सूर्य-किरणों का उत्सव)
कब जाएँ
पूरे वर्ष; अक्टूबर से फ़रवरी मौसम अच्छा, नवरात्रि में विशेष आयोजन
कैसे पहुँचें
छत्रपति शाहू महाराज टर्मिनस (कोल्हापुर) रेलवे स्टेशन; कोल्हापुर हवाई अड्डा शहर से लगभग 9 किमी; पुणे से लगभग 237 किमी
तुलजापुर, यमुनाचल पहाड़ी (बालाघाट श्रेणी), ज़िला धाराशिव (उस्मानाबाद), महाराष्ट्र
तुलजापुर में बालाघाट पहाड़ियों पर स्थित यह मंदिर देवी दुर्गा के तुलजा भवानी रूप को समर्पित है, जो महाराष्ट्र के अनेक परिवारों की कुलदेवी हैं। आठ भुजाओं वाली ग्रेनाइट की स्वयंभू मूर्ति के पास महिषासुर का सिर दिखता है। कहा जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज यहाँ अक्सर दर्शन को आते थे।
विशेष पर्व
नवरात्रि और दशहरे पर बड़ा मेला, कोजागिरी पूर्णिमा
कब जाएँ
अक्टूबर से फ़रवरी अच्छा; नवरात्रि और कोजागिरी पूर्णिमा पर विशेष उत्सव
कैसे पहुँचें
धाराशिव (उस्मानाबाद) रेलवे स्टेशन लगभग 25 किमी, सोलापुर रेलवे स्टेशन लगभग 45 किमी
स्तोत्र की 'माहुर्ये एकवीरिका' को माहुरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित रेणुका माता मंदिर से जोड़ा जाता है। कथा है कि परशुराम ने माता रेणुका का अंतिम संस्कार यहीं किया था। यह महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में गिना जाता है; पास ही दत्त शिखर और अनसूया माता के मंदिर भी हैं।
विशेष पर्व
दशहरे पर बड़ा मेला, नवरात्रि और दत्त पूर्णिमा पर महापूजा
कब जाएँ
अक्टूबर से मार्च मौसम सुहावना; दशहरे पर बड़ा मेला
कैसे पहुँचें
किनवट रेलवे स्टेशन लगभग 50 किमी; नज़दीकी हवाई अड्डा नांदेड़, जहाँ से माहुर के लिए नियमित बसें चलती हैं
मान्यताओं में अंतर: एकवीरा को देवी रेणुका का ही रूप माना जाता है। पुणे जिले में लोणावला के पास कार्ला में एकवीरा देवी का एक अलग प्रसिद्ध मंदिर है, पर स्तोत्र का यह पीठ प्रायः माहुर से जोड़ा जाता है।
सप्तशृंगी गढ़, नांदुरी (वणी के पास), ज़िला नासिक, महाराष्ट्र
नासिक से लगभग 60 किमी दूर सह्याद्रि की सात चोटियों के बीच सप्तशृंगी देवी का मंदिर है। अठारह भुजाओं वाली देवी महिषासुरमर्दिनी रूप में हैं और मूर्ति सिंदूर से लेपी रहती है। मान्यता है कि यहाँ सती की दाहिनी भुजा गिरी थी; इसे महाराष्ट्र के साढ़े तीन शक्तिपीठों में आधा पीठ माना जाता है।
विशेष पर्व
चैत्रोत्सव (राम नवमी से चैत्र पूर्णिमा), आश्विन नवरात्रि, कोजागिरी पूर्णिमा
कब जाएँ
पूरे वर्ष; चैत्रोत्सव और आश्विन नवरात्रि में विशेष उत्सव
कैसे पहुँचें
नासिक रोड रेलवे स्टेशन और नासिक (ओझर) हवाई अड्डा; मंदिर नासिक से लगभग 60 किमी
ध्यान दें: मंदिर तक 500 से अधिक सीढ़ियाँ हैं; 2018 से फ़्यूनिकुलर ट्रॉली भी चलती है।
मान्यताओं में अंतर: मंदिर का आधिकारिक पक्ष इसे पूर्ण शक्तिपीठ बताता है, जबकि प्रचलित परंपरा इसे आधा पीठ मानती है।