कथा से पहले
सत्यनारायण भगवान विष्णु का ही रूप हैं — ‘सत्य’ ही नारायण है। इस कथा का संदेश बहुत सीधा है: सच बोलिए, दिया हुआ वचन निभाइए, और प्रसाद व श्रद्धा का आदर कीजिए। गृह-प्रवेश, विवाह, नया काम, जन्मदिन, मनोकामना पूरी होने पर, या हर पूर्णिमा को यह कथा करवाने की सुंदर परंपरा है।
ध्यायेत्सत्यं गुणातीतं गुणत्रयसमन्वितम्। लोकनाथं त्रिलोकेशं कौस्तुभाभरणं हरिम्॥
श्री सत्यनारायण पूजा — ध्यान
अर्थ:जो तीनों गुणों से परे हैं और फिर भी तीनों गुणों को धारण करते हैं, जो सब लोकों के स्वामी हैं और कौस्तुभ मणि धारण करते हैं — उन सत्य-स्वरूप श्री हरि का ध्यान करें।
कब करें
- हर पूर्णिमा — यह सबसे प्रचलित दिन है।
- संक्रांति, एकादशी या कोई भी शुभ दिन।
- गृह-प्रवेश, विवाह, नया व्यापार, संतान-जन्म या मनोकामना पूरी होने पर।
- कथा में संध्या का समय उत्तम बताया गया है, पर सुविधा अनुसार दिन में भी कर सकते हैं।
पूजा की सामग्री
- चौकी, पीला या लाल कपड़ा, और केले के पत्तों या खंभों से छोटा मंडप
- सत्यनारायण भगवान का चित्र या शालिग्राम जी
- कलश — जल, आम के पत्ते और नारियल के साथ
- पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद और शक्कर — और तुलसी दल
- सवाया प्रसाद — भुने आटे की पंजीरी या सूजी का हलवा, केले, घी, दूध और शक्कर
- रोली, अक्षत, मौली, जनेऊ, पान-सुपारी, फूल और माला
- धूप, दीप, कपूर, फल-मेवा और अपनी श्रद्धा अनुसार दक्षिणा
संक्षिप्त विधि
- स्नान करके साफ़ वस्त्र पहनें। चौकी सजाएँ और मंडप बनाएँ।
- दीपक जलाएँ। हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर अपने नाम-गोत्र से संकल्प लें।
- पहले गणेश जी, फिर गौरी, कलश और नवग्रह का पूजन करें।
- सत्यनारायण भगवान को पंचामृत से स्नान (शालिग्राम हों तो), फिर वस्त्र, चंदन, फूल, तुलसी, धूप-दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- पूरा परिवार साथ बैठकर पाँचों अध्याय की कथा श्रद्धा से सुने।
- कथा के बाद आरती करें — ‘जय लक्ष्मी रमणा’। हो सके तो छोटा हवन भी करें।
- प्रसाद सबको बाँटें। प्रसाद को न मना करें, न छोड़ें — यही इस कथा की सबसे बड़ी सीख है।
- पंडित जी को भोजन और दक्षिणा अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार दें।
कथा पंडित जी से करवाएँ या घर पर स्वयं श्रद्धा से पढ़ें — फल भाव से मिलता है, दिखावे से नहीं। पं. बजरंगलाल दाधीच जी सालासर में और ऑनलाइन संकल्प के माध्यम से भी यह कथा करवाते हैं।
पहला अध्याय: नारद जी का प्रश्न और व्रत का विधान
एकदा नैमिषारण्ये ऋषयः शौनकादयः। पप्रच्छुर्मुनयः सर्वे सूतं पौराणिकं खलु॥
सत्यनारायण व्रत कथा — प्रथम अध्याय का आरंभ
अर्थ:एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि सभी ऋषि-मुनियों ने पुराणों के ज्ञाता सूत जी से प्रश्न किया।
बहुत पुराने समय की बात है। नैमिषारण्य नाम के पवित्र वन में शौनक आदि हज़ारों ऋषि-मुनि यज्ञ और तप करते थे। एक दिन वे सब पुराणों के महान कथावाचक सूत जी के पास पहुँचे और हाथ जोड़कर बोले — “हे सूत जी! कलियुग में लोग वेद-शास्त्र कम जानते हैं, उनके पास समय भी कम है और मन भी चंचल है। ऐसे में वे किस व्रत या उपाय से अपना मनचाहा फल पा सकते हैं? कृपा करके कोई सरल मार्ग बताइए।”
सूत जी प्रसन्न होकर बोले — “हे ऋषियो! आपने संसार के भले का प्रश्न किया है। यही प्रश्न एक बार देवर्षि नारद ने स्वयं भगवान विष्णु से पूछा था। भगवान ने जो उत्तर दिया, वही मैं आपको सुनाता हूँ। ध्यान से सुनिए।”
देवर्षि नारद सदा लोक-लोक में घूमते रहते हैं। एक बार घूमते-घूमते वे मृत्युलोक, यानी हमारी पृथ्वी पर आए। यहाँ उन्होंने देखा कि लोग अपने-अपने कर्मों के कारण तरह-तरह के दुःख भोग रहे हैं — कोई रोग से परेशान है, कोई गरीबी से; कोई संतान के लिए तरस रहा है, तो कोई घर के कलह से दुखी है। नारद जी का कोमल मन यह देखकर भर आया। उन्होंने सोचा — “ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे इन सबका दुःख निश्चित रूप से दूर हो?” यह सोचकर वे सीधे विष्णुलोक पहुँचे।
वहाँ क्षीरसागर में शेषनाग पर भगवान नारायण विराजमान थे — चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा और पद्म, गले में वनमाला और मुख पर अपार शांति। नारद जी ने भगवान की स्तुति की और प्रणाम किया। भगवान ने प्रेम से पूछा — “हे नारद! किस काम से आए हो? जो मन में है, निःसंकोच कहो।”
नारद जी बोले — “प्रभु! मृत्युलोक में सब लोग अपने कर्मों के कारण अनेक दुःख पा रहे हैं। यदि आप मुझ पर कृपा करते हैं, तो कोई ऐसा उपाय बताइए जिसमें थोड़ा प्रयत्न हो और जिससे उनके दुःख मिट जाएँ।”
भगवान बोले — “हे वत्स! तुमने लोगों के भले के लिए उत्तम प्रश्न किया है। मैं तुम्हें एक ऐसा व्रत बताता हूँ जो स्वर्ग और पृथ्वी, दोनों में दुर्लभ है और बहुत पुण्य देने वाला है। उसका नाम है सत्यनारायण व्रत। जो मनुष्य इसे विधि और श्रद्धा से करता है, वह इस लोक में सुख पाता है और अंत में परमगति को प्राप्त होता है।”
नारद जी ने फिर पूछा — “प्रभु! इस व्रत का फल क्या है, विधि क्या है, इसे पहले किसने किया, और इसे कब करना चाहिए?”
भगवान बोले — “यह व्रत दुःख और शोक मिटाने वाला, धन-धान्य बढ़ाने वाला, सौभाग्य और संतान देने वाला और हर जगह विजय दिलाने वाला है। मनुष्य किसी भी दिन, भक्ति और श्रद्धा के साथ, संध्या के समय, ब्राह्मणों और अपने बंधु-बांधवों के साथ मिलकर सत्यनारायण का पूजन करे। नैवेद्य में केले, घी, दूध और गेहूँ का आटा — वह न हो तो चावल का आटा — तथा शक्कर या गुड़, ये सब सवाया मात्रा में लेकर भोग लगाए। फिर सबके साथ कथा सुने, ब्राह्मणों को दक्षिणा दे, बंधु-बांधवों को भोजन कराए और स्वयं भी प्रसाद ग्रहण करे। भजन-कीर्तन करे और मुझे याद करते हुए घर जाए। ऐसा करने से मनोकामना अवश्य पूरी होती है। कलियुग में यही सबसे सरल उपाय है।”
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां प्रथमोऽध्यायः ॥
अर्थ:इस प्रकार श्री स्कंद पुराण के रेवा खंड में वर्णित श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पहला अध्याय पूरा हुआ। बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
दूसरा अध्याय: निर्धन ब्राह्मण और लकड़हारा
सूत जी बोले — “हे ऋषियो! अब मैं बताता हूँ कि पहले यह व्रत किसने किया था।” सुंदर काशी नगरी में एक बहुत गरीब ब्राह्मण रहता था। कई कथा-पुस्तकों में उसका नाम शतानंद मिलता है। वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर रोज़ भिक्षा के लिए दर-दर भटकता, फिर भी मुश्किल से पेट भर पाता।
ब्राह्मणों से स्नेह रखने वाले भगवान से उसका दुःख देखा न गया। वे एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धरकर उसके पास आए और आदर से पूछा — “हे विप्र! तुम इतने दुखी होकर रोज़ क्यों भटकते हो? अपना दुःख मुझे बताओ।”
ब्राह्मण बोला — “बाबा! मैं बहुत निर्धन हूँ। भिक्षा माँगकर किसी तरह जी रहा हूँ। यदि आप इस दरिद्रता को दूर करने का कोई उपाय जानते हैं, तो कृपा करके बताइए।”
बूढ़े ब्राह्मण के वेश में भगवान बोले — “सत्यनारायण स्वयं भगवान विष्णु हैं और मनचाहा फल देने वाले हैं। तुम उनका व्रत करो। इससे मनुष्य के सब दुःख दूर हो जाते हैं।” फिर उन्होंने व्रत की पूरी विधि समझाई और देखते-ही-देखते अंतर्धान हो गए।
ब्राह्मण ने मन में निश्चय किया — “जिस व्रत की बात इन वृद्ध ब्राह्मण ने कही है, वह मैं ज़रूर करूँगा।” इसी विचार में उसे रात भर नींद नहीं आई। सुबह उसने व्रत का संकल्प लिया और भिक्षा के लिए निकला। उस दिन उसे भिक्षा में इतना धन मिला जितना पहले कभी नहीं मिला था। उसी धन से उसने अपने बंधु-बांधवों के साथ श्रद्धा से सत्यनारायण का व्रत किया।
व्रत के प्रभाव से उसके सब दुःख दूर हो गए और वह धन-धान्य से संपन्न हो गया। तब से वह हर महीने यह व्रत करने लगा। जीवन भर सुख भोगकर अंत में वह सत्यपुर, यानी भगवान के धाम को गया।
ऋषियों ने पूछा — “हे सूत जी! उस ब्राह्मण से यह कथा सुनकर और किसने यह व्रत किया? हम सुनना चाहते हैं।”
सूत जी बोले — “एक बार वही ब्राह्मण अपने बंधु-बांधवों के साथ घर में सत्यनारायण की पूजा कर रहा था। उसी समय एक लकड़हारा, सिर पर लकड़ियों का गट्ठर लिए, प्यास से व्याकुल होकर वहाँ आया। उसने गट्ठर बाहर रखा और भीतर आकर पानी पिया। पूजा होते देख उसने ब्राह्मण को प्रणाम किया और पूछा — ‘महाराज, आप यह क्या कर रहे हैं? इससे क्या फल मिलता है?’”
ब्राह्मण ने कहा — “यह सत्यनारायण भगवान का व्रत है, जो सब मनोकामनाएँ पूरी करता है। इसी की कृपा से मेरे घर में धन-धान्य आया है।” लकड़हारा बहुत प्रसन्न हुआ। उसने प्रसाद लिया, जल पिया और मन में ठान लिया — “आज लकड़ियाँ बेचकर जो भी पैसा मिलेगा, उसी से मैं सत्यनारायण का व्रत करूँगा।”
वह लकड़ियाँ लेकर ऐसे मोहल्ले में गया जहाँ धनी लोग रहते थे। उस दिन उसे लकड़ियों का दाम पहले से दुगुना मिला। प्रसन्न मन से उसने केले, घी, दूध, आटा और शक्कर — सब सवाया — ख़रीदा, अपने परिवार को बुलाया और विधि से सत्यनारायण का व्रत किया। उस दिन से उसके घर में भी सुख-समृद्धि आने लगी। उसे धन और संतान का सुख मिला, और जीवन के अंत में वह भी भगवान के धाम को गया।
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां द्वितीयोऽध्यायः ॥
अर्थ:इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत कथा का दूसरा अध्याय पूरा हुआ। बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
तीसरा अध्याय: राजा उल्कामुख, साधु वैश्य और भूला हुआ वचन
सूत जी बोले — “हे मुनियो! अब आगे की कथा सुनिए।” प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक बुद्धिमान राजा था। वह सत्य बोलने वाला और इंद्रियों को वश में रखने वाला था। रोज़ मंदिर जाता और ब्राह्मणों को दान देता। उसकी रानी भी बड़ी सुशील और पति-परायण थी।
एक दिन राजा और रानी भद्रशीला नदी के किनारे सत्यनारायण का व्रत कर रहे थे। उसी समय साधु नाम का एक वैश्य (व्यापारी) व्यापार के लिए बहुत-सा धन और माल नाव में भरकर उस तट पर आया। नाव किनारे बाँधकर वह राजा के पास गया और विनम्रता से पूछा — “हे राजन! आप इतनी श्रद्धा से यह कौन-सी पूजा कर रहे हैं? मुझे भी बताइए।”
राजा ने कहा — “हे साधु! हम संतान की प्राप्ति के लिए सत्यनारायण भगवान का व्रत-पूजन कर रहे हैं।” यह सुनकर साधु बोला — “मेरे भी कोई संतान नहीं है। मुझे इसकी विधि बताइए, मैं भी यह व्रत करूँगा।” राजा ने विधि बता दी। साधु व्यापार पूरा करके घर लौटा और अपनी पत्नी लीलावती को सब बताकर बोला — “जब हमें संतान होगी, तब मैं सत्यनारायण का व्रत करूँगा।”
भगवान की कृपा से कुछ समय बाद लीलावती गर्भवती हुई और दसवें महीने एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया। उसका नाम कलावती रखा गया। वह शुक्ल पक्ष के चंद्रमा की तरह दिन-दिन बढ़ने लगी। एक दिन लीलावती ने पति को याद दिलाया — “आपने संतान होने पर व्रत करने का वचन दिया था। अब उसे पूरा कीजिए।” साधु बोला — “कलावती के विवाह के समय करूँगा।” और फिर व्यापार में लग गया।
कलावती बड़ी हुई तो साधु ने दूत भेजकर योग्य वर ढुँढ़वाया। एक सुयोग्य वणिक-पुत्र से — कई कथा-पुस्तकों में उसका नाम शंखपति मिलता है — बड़े धूमधाम से कलावती का विवाह हुआ। पर इस बार भी साधु व्रत की बात भूल गया। बार-बार वचन टालने से भगवान अप्रसन्न हुए, और साधु को उसकी भूल याद दिलाने का समय आ गया।
कुछ समय बाद साधु अपने दामाद को साथ लेकर व्यापार के लिए समुद्र-तट के पास बसे रत्नसारपुर नगर पहुँचा, जहाँ चंद्रकेतु नाम का राजा राज्य करता था। दोनों वहाँ व्यापार करने लगे। एक दिन कुछ चोर राजा का धन चुराकर भागे। राजा के सिपाही पीछा कर रहे थे, तो घबराए चोर वह धन उसी जगह फेंक गए जहाँ साधु और उसका दामाद ठहरे थे। सिपाहियों ने धन उनके पास देखा तो उन्हें ही चोर समझकर पकड़ लिया और राजा के सामने ले गए। राजा ने बिना पूरी जाँच के दोनों को कारागार में डाल दिया और उनका सारा धन ज़ब्त कर लिया।
उधर घर पर भी लीलावती और कलावती पर विपदा आ गई। चोर घर का धन भी ले गए। लीलावती बीमार रहने लगी और घर में खाने तक के लाले पड़ गए। कलावती भूख से व्याकुल होकर भोजन की तलाश में इधर-उधर जाने लगी।
एक दिन कलावती एक ब्राह्मण के घर पहुँची, जहाँ सत्यनारायण का व्रत हो रहा था। वह वहीं बैठ गई, श्रद्धा से कथा सुनी, प्रसाद लिया और रात को देर से घर लौटी। माँ ने चिंता से पूछा — “बेटी, इतनी रात तक कहाँ थी?” कलावती बोली — “माँ, मैंने एक ब्राह्मण के घर सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा।” यह सुनते ही लीलावती को पति का भूला हुआ वचन याद आ गया।
अगले दिन लीलावती ने बंधु-बांधवों के साथ, जितना हो सका उतने में, श्रद्धा से सत्यनारायण का व्रत किया और प्रार्थना की — “हे प्रभु! मेरे पति और दामाद से जो भूल हुई है, उसे क्षमा कीजिए। वे जल्दी सकुशल घर लौट आएँ।”
भगवान इस भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसी रात राजा चंद्रकेतु को स्वप्न में दर्शन देकर कहा — “हे राजन! जिन दोनों वैश्यों को तुमने कारागार में डाला है, वे निर्दोष हैं। सुबह होते ही उन्हें छोड़ दो और उनका सारा धन लौटा दो।” सुबह राजा ने सभा में स्वप्न की बात बताई, दोनों को बुलवाया और उनसे क्षमा माँगी। फिर उनका धन लौटाया, ऊपर से उतना ही धन और देकर दुगुना किया, और आदर सहित विदा किया।
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां तृतीयोऽध्यायः ॥
अर्थ:इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत कथा का तीसरा अध्याय पूरा हुआ। बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
चौथा अध्याय: दंडी संन्यासी, लता-पत्र और कलावती का प्रसाद
सूत जी बोले — साधु ने मंगलाचार करके ब्राह्मणों को दान दिया और दामाद के साथ नाव से अपने नगर की ओर चल पड़ा। थोड़ी ही दूर गए थे कि सत्यनारायण भगवान ने उसकी परीक्षा लेने के लिए एक दंडी संन्यासी का रूप धरा और किनारे से पूछा — “हे साधु! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?”
धन के घमंड में डूबा साधु हँसकर बोला — “दंडी महाराज! क्या आप धन लेना चाहते हैं? मेरी नाव में तो बस लता-पत्र, यानी बेलें और पत्ते भरे हैं।” संन्यासी बोले — “तुम्हारा वचन सत्य हो।” और कुछ दूर जाकर बैठ गए।
नित्य-कर्म करके साधु लौटा तो देखा कि नाव बहुत हल्की होकर पानी के ऊपर तैर रही है। भीतर झाँका तो सचमुच धन की जगह लता-पत्र भरे थे! वह मूर्छित होकर गिर पड़ा। होश आने पर विलाप करने लगा। तब दामाद ने समझाया — “आप शोक न करें। यह उन दंडी संन्यासी के वचन का फल है। वे सब कुछ करने में समर्थ हैं। चलिए, उन्हीं की शरण में चलें। वही हमारा मनोरथ पूरा करेंगे।”
दोनों संन्यासी के पास गए और चरणों में गिरकर क्षमा माँगी। साधु ने कहा — “प्रभु! मैंने झूठ बोला और अहंकार किया। आपकी माया से तो ब्रह्मा आदि देवता भी मोहित हो जाते हैं, मैं साधारण मनुष्य हूँ। मुझे क्षमा कीजिए। मैं अपनी सामर्थ्य से आपका पूजन करूँगा।”
संन्यासी बोले — “हे साधु! तुमने बार-बार मेरा व्रत करने का वचन दिया और भूल गए। इसी से तुम्हें इतना कष्ट मिला।” उसकी पश्चाताप-भरी प्रार्थना सुनकर भगवान प्रसन्न हुए, मनचाहा वर दिया और अंतर्धान हो गए। साधु ने नाव पर लौटकर देखा — नाव फिर से धन-रत्नों से भरी थी! उसने वहीं अपने साथियों के साथ सत्यनारायण का पूजन किया और आगे बढ़ा।
अपने नगर के पास पहुँचकर साधु ने एक दूत को घर भेजा। दूत ने लीलावती को प्रणाम करके कहा — “सेठ जी दामाद के साथ नगर के पास आ गए हैं।” लीलावती उस समय कलावती के साथ सत्यनारायण का पूजन कर रही थी। ख़ुशी से भरकर वह बोली — “बेटी, मैं तेरे पिता के दर्शन को जाती हूँ। तू पूजा पूरी करके जल्दी आ जाना।”
पर कलावती अपने पति को देखने की जल्दी में प्रसाद लिए बिना ही दौड़ पड़ी। प्रसाद के इस अनादर से, जैसे ही वह तट पर पहुँची, सबके देखते-देखते उसके पति की नाव जल में समा गई। पति को न देखकर कलावती विलाप करने लगी। सब दुखी हो गए। साधु बोला — “यह अवश्य सत्यनारायण भगवान की माया है। मैं उनका पूजन करूँगा।”
तभी आकाशवाणी हुई — “हे साधु! तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर पति को देखने आई है, इसी कारण उसका पति अदृश्य हुआ है। यदि वह घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके लौटे, तो उसे पति अवश्य मिलेगा।”
कलावती तुरंत घर लौटी, श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया और वापस आई — तो देखा, पति नाव सहित सकुशल सामने खड़ा है! सबकी आँखों में ख़ुशी के आँसू आ गए। उसी दिन साधु ने बंधु-बांधवों सहित विधि से सत्यनारायण का व्रत किया। उसके बाद वह हर पूर्णिमा और संक्रांति पर यह व्रत करने लगा। इस लोक में सुख भोगकर अंत में वह सत्यपुर को गया।
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां चतुर्थोऽध्यायः ॥
अर्थ:इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत कथा का चौथा अध्याय पूरा हुआ। बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
पाँचवाँ अध्याय: राजा तुंगध्वज और ग्वालों का प्रसाद
सूत जी बोले — “हे ऋषियो! अब एक और कथा सुनिए।” तुंगध्वज नाम का एक राजा था, जो प्रजा का पालन बड़े ध्यान से करता था। एक बार वह वन में शिकार खेलने गया। लौटते समय उसने देखा कि एक बरगद के पेड़ के नीचे कुछ ग्वाले अपने बंधु-बांधवों के साथ बड़ी भक्ति से सत्यनारायण का पूजन कर रहे हैं।
राजा अपने अहंकार में न तो पूजा के स्थान पर गया, न भगवान को प्रणाम किया। पूजा पूरी होने पर ग्वाले प्रेम से प्रसाद लेकर राजा के पास आए, आदर से उसके सामने रखा और लौट गए। राजा ने सोचा — “ग्वालों का प्रसाद मैं क्यों लूँ?” और प्रसाद वहीं छोड़कर अपने नगर चला गया।
नगर पहुँचते ही उसे संकट घेरने लगे। राज्य का धन-वैभव नष्ट होने लगा और उसके पुत्रों पर भी विपदा आ पड़ी। राजा व्याकुल हो गया। तब उसे याद आया — “मैंने सत्यदेव के प्रसाद का अनादर किया था। हो न हो, यह उसी का फल है।”
वह तुरंत उसी वन में ग्वालों के पास लौटा। उनके साथ बैठकर उसने विनम्रता से सत्यनारायण का पूजन किया, कथा सुनी और श्रद्धा से प्रसाद ग्रहण किया। भगवान की कृपा से उसका सब कुछ लौट आया — पुत्र सकुशल हुए और राज्य फिर समृद्ध हुआ। राजा ने जीवन भर यह व्रत किया और अंत में भगवान के धाम को गया।
फलश्रुति
सूत जी बोले — “हे ऋषियो! जो मनुष्य इस परम दुर्लभ व्रत को करता है और यह पवित्र कथा भक्ति से सुनता है, भगवान की कृपा से उसके दुःख दूर होते हैं। निर्धन को धन, संतान चाहने वाले को संतान, बंधन में पड़े को मुक्ति और भयभीत को निर्भयता मिलती है। मनचाहा फल भोगकर अंत में वह भगवान के धाम को जाता है।”
अगले जन्म की कथा (लोक-परंपरा)
प्रचलित कथा-पुस्तकों में यह भी आता है कि जिन्होंने पहले यह व्रत किया, वे अगले जन्मों में भी भगवान के भक्त बने — निर्धन ब्राह्मण शतानंद ने सुदामा बनकर श्रीकृष्ण की मित्रता पाई; लकड़हारा निषादराज गुह बना, जिसने वनवास में श्रीराम की सेवा की; राजा उल्कामुख राजा दशरथ बने; साधु वैश्य धर्मनिष्ठ राजा मोरध्वज बने; और राजा तुंगध्वज स्वायंभुव मनु हुए।
॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे रेवाखण्डे श्रीसत्यनारायणव्रतकथायां पञ्चमोऽध्यायः ॥
अर्थ:इस प्रकार श्री सत्यनारायण व्रत कथा का पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ। अब आरती करें और प्रसाद सबको बाँटें। बोलिए श्री सत्यनारायण भगवान की जय!
यह कथा क्या सिखाती है
वचन निभाइए। साधु वैश्य का सारा कष्ट उसके भूले हुए वचन से शुरू हुआ। भगवान से किया वादा हो या किसी इंसान से — टालते रहना भी एक तरह का झूठ है।
सच बोलिए। ‘नाव में लता-पत्र हैं’ — यह एक छोटा-सा झूठ था, पर उसने सब कुछ पत्तों में बदल दिया। इस कथा का नाम ही ‘सत्य’ नारायण है: सत्य ही भगवान का रूप है।
प्रसाद और श्रद्धा का आदर कीजिए। कलावती ने जल्दी में प्रसाद छोड़ा, राजा तुंगध्वज ने अहंकार में। प्रसाद छोटा-बड़ा नहीं होता — ग्वालों के हाथ का प्रसाद भी उतना ही पवित्र है जितना राजमहल का।
यह कथा डराने के लिए नहीं, याद दिलाने के लिए है। हर बार जैसे ही भूल मानी गई और पश्चाताप हुआ, भगवान ने तुरंत क्षमा किया और सब लौटा दिया। सत्यनारायण दंड देने वाले नहीं, सुधारने वाले भगवान हैं।
कथा के बाद आरती
श्री सत्यनारायण जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।