॥ कथा ॥ शिव पुराण, गणेश पुराण और लोक-परंपरा

श्री गणेश जी की कथा

उबटन से बने बालक के गजमुख होने, प्रथम-पूज्य बनने, माता-पिता की परिक्रमा करने और ‘एकदंत’ कहलाने की कथा।

फ़ोन कथा बोलकर सुनाएगा। बीच के किसी भाग से सुनना हो, तो उस भाग के ऊपर ‘यह भाग सुनें’ दबाइए।

कथा से पहले

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

प्रचलित गणेश-वंदना

अर्थ:हे टेढ़ी सूँड़ और विशाल शरीर वाले, करोड़ों सूर्यों जैसे तेजस्वी गणेश जी! मेरे सब कामों को सदा बिना विघ्न के पूरा कीजिए।

हमारे यहाँ हर शुभ काम ‘श्री गणेश’ से शुरू होता है — शादी का कार्ड हो, नई दुकान, नई गाड़ी या बच्चे की पहली कॉपी। गणेश जी विघ्नहर्ता हैं, बुद्धि और विवेक के देवता हैं। उनकी हर कथा में एक सीख छिपी है।

भाग १

माँ पार्वती का द्वारपाल

पुराणों में कथा आती है कि एक दिन माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं। द्वार पर पहरा देने के लिए कोई अपना न था। तब उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन से एक सुंदर बालक का रूप बनाया और उसमें प्राण डाल दिए। बालक ने माँ को प्रणाम किया। माँ ने कहा — “बेटा, तुम मेरे पुत्र हो। मैं स्नान करने जा रही हूँ। द्वार पर खड़े रहना और किसी को भीतर मत आने देना।”

थोड़ी देर बाद भगवान शिव आए। बालक ने उन्हें भी रोक दिया — “माँ की आज्ञा है, कोई भीतर नहीं जाएगा।” शिव जी ने समझाया कि यह उनका ही घर है, पर बालक अपनी बात पर अड़ा रहा। शिव जी के गणों ने बालक को हटाना चाहा, पर उस अकेले बालक ने सबको हरा दिया। बात बढ़ती गई और युद्ध में शिव जी के त्रिशूल से बालक का सिर कट गया।

पार्वती जी बाहर आईं तो अपने पुत्र को इस दशा में देखकर शोक और क्रोध से भर उठीं। माँ के इस दुःख से तीनों लोक काँप उठे। देवताओं ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की, और शिव जी ने वचन दिया कि बालक फिर से जीवित होगा।

भाग २

गजमुख और प्रथम-पूज्य का वरदान

शिव जी ने गणों को उत्तर दिशा में भेजा और कहा — “जो पहला प्राणी मिले, उसका सिर ले आओ।” गणों को सबसे पहले एक हाथी का बच्चा मिला। उसका सिर लाकर बालक के धड़ पर लगाया गया और शिव जी ने उसमें फिर से प्राण डाल दिए। बालक मुस्कराता हुआ उठ बैठा — अब वे ‘गजानन’ थे, हाथी के मुख वाले।

पार्वती जी का मन खिल उठा। शिव जी ने बालक को अपने सब गणों का स्वामी बनाया — इसीलिए वे ‘गणपति’ और ‘गणेश’ कहलाए। ब्रह्मा, विष्णु और सब देवताओं ने वरदान दिया — “हर पूजा और हर शुभ काम में सबसे पहले इनकी पूजा होगी।” इसीलिए आज भी हम कहते हैं — ‘किसी काम का श्रीगणेश करना’, यानी शुरुआत करना।

बड़े-बुज़ुर्ग गणेश जी के रूप का अर्थ भी समझाते हैं — बड़ा सिर: बड़ी सोच; बड़े कान: ज़्यादा सुनना; छोटी आँखें: ध्यान से देखना; छोटा मुँह: कम बोलना; बड़ा पेट: सबकी बातें धैर्य से पचा लेना; और छोटा-सा वाहन मूषक: बुद्धि हो तो छोटे साधन से भी बड़े काम हो जाते हैं।

भाग ३

माता-पिता की परिक्रमा

एक कथा के अनुसार, एक बार शिव-पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों — कार्तिकेय और गणेश — से कहा, “जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके लौटेगा, वही श्रेष्ठ माना जाएगा।” कुछ कथाओं में आता है कि उसी का विवाह पहले होगा।

कार्तिकेय जी तुरंत अपने तेज़ वाहन मोर पर बैठकर उड़ चले। गणेश जी का वाहन तो छोटा-सा मूषक था। वे मुस्कराए, कुछ सोचा, फिर माता-पिता को आसन पर बिठाया, उनकी सात बार परिक्रमा की और प्रणाम करके हाथ जोड़कर खड़े हो गए।

शिव जी ने पूछा — “तुमने पृथ्वी की परिक्रमा क्यों नहीं की?” गणेश जी बोले — “शास्त्र कहते हैं कि माता-पिता की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के बराबर है। मेरे लिए तो आप ही पूरा संसार हैं।” शिव-पार्वती गद्गद हो गए। जब कार्तिकेय जी लौटे, तब तक गणेश जी विजयी घोषित हो चुके थे।

यह कथा सिखाती है कि बुद्धि बल से बड़ी है, और माता-पिता का सम्मान ही सबसे बड़ा तीर्थ है।

भाग ४

एकदंत — महाभारत का लेखन

गणेश जी को ‘एकदंत’ कहते हैं, क्योंकि उनका एक दाँत आधा टूटा हुआ है। इसकी कई कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार, जब महर्षि वेदव्यास महाभारत की रचना करना चाहते थे, तो उन्हें ऐसे लेखक की ज़रूरत थी जो उनके बोलने की गति से लिख सके। उन्होंने गणेश जी से प्रार्थना की।

गणेश जी ने शर्त रखी — “मैं लिखूँगा, पर मेरी लेखनी एक पल भी नहीं रुकेगी। आप रुके, तो मैं लिखना छोड़ दूँगा।” व्यास जी ने भी शर्त रखी — “आप हर श्लोक का अर्थ समझकर ही लिखेंगे।” जब भी व्यास जी को सोचने का समय चाहिए होता, वे कोई कठिन श्लोक बोल देते, और गणेश जी उसका अर्थ समझने में लग जाते।

लिखते-लिखते एक समय गणेश जी की लेखनी टूट गई। शर्त थी कि लेखन रुकना नहीं चाहिए — तो उन्होंने बिना एक पल गँवाए अपना एक दाँत तोड़ा और उसी से लिखना जारी रखा। इस तरह महाभारत जैसा महाग्रंथ लिखा गया।

एक दूसरी प्रसिद्ध कथा में आता है कि परशुराम जी के फरसे के वार को, उसे पिता शिव जी का दिया अस्त्र जानकर, गणेश जी ने आदर से अपने दाँत पर झेल लिया था। दोनों कथाओं का भाव एक है — लिए हुए काम के लिए त्याग, और बड़ों का आदर।

यह कथा क्या सिखाती है

कर्तव्य निभाइए। बालक गणेश ने माँ की आज्ञा निभाने के लिए स्वयं शिव जी को भी रोक दिया।

बुद्धि से रास्ता निकालिए। छोटे-से मूषक पर बैठकर भी परिक्रमा की प्रतियोगिता जीत ली — साधन छोटे हों तो विवेक बड़ा रखिए।

शुरुआत ईश्वर-स्मरण से कीजिए। हर नया काम ‘श्री गणेश’ से शुरू करने का अर्थ है — मन को शांत, विनम्र और एकाग्र करके काम आरंभ करना।

कथा के बाद आरती

श्री गणेश जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।