॥ वार्षिक व्रत-पर्व ॥ भगवान श्रीराम (राम दरबार सहित)

श्री राम नवमी

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जन्म का पर्व — मध्याह्न में जन्मोत्सव, रामचरितमानस का पाठ और पूरे परिवार के साथ राम-नाम का कीर्तन।

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कब
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी — चैत्र नवरात्रि का अंतिम दिन, प्रायः मार्च-अप्रैल में। भगवान राम का जन्म मध्याह्न (दोपहर लगभग 12 बजे) में हुआ था, इसलिए मुख्य पूजा मध्याह्न में होती है। ठीक मुहूर्त पंचांग से देखें।
पूजनीय
भगवान श्रीराम (राम दरबार सहित)
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श्री राम नवमी का महत्व

त्रेता युग में भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ और माता कौशल्या के घर श्रीराम के रूप में जन्म लिया। राम को ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहा जाता है — यानी वह आदर्श मनुष्य जिसने हर रिश्ते की मर्यादा निभाई: आज्ञाकारी पुत्र, प्रेम करने वाला भाई, निष्ठावान पति, न्यायप्रिय राजा और शरण में आए का रक्षक मित्र।

राम नवमी पर राम-जन्म का उत्सव इसलिए मनाया जाता है ताकि हम उनके गुणों को अपने जीवन में उतार सकें। गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस की रचना भी राम नवमी के दिन ही आरंभ की थी — वे स्वयं लिखते हैं:

संबत सोरह सै एकतीसा। करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥ नौमी भौम बार मधुमासा। अवधपुरीं यह चरित प्रकासा॥

रामचरितमानस, बालकांड

अर्थ:संवत् 1631 में, भगवान के चरणों में सिर रखकर मैं यह कथा आरंभ करता हूँ। चैत्र (मधुमास) की नवमी, मंगलवार के दिन अयोध्यापुरी में यह चरित्र प्रकाशित हुआ।

राम-नाम को कलियुग में सबसे सरल साधन माना गया है। राम नवमी पर दिन भर ‘श्री राम जय राम जय जय राम’ का कीर्तन, रामचरितमानस का पाठ (विशेषकर बालकांड का राम-जन्म प्रसंग) और भोजन-दान का विशेष महत्व है। यह चैत्र नवरात्रि का अंतिम दिन भी है, इसलिए कई घरों में इसी दिन कन्या पूजन और हवन भी होता है।

पूजा सामग्री

  • श्रीराम दरबार (राम, सीता, लक्ष्मण, हनुमान) की मूर्ति या चित्र; बालरूप राम (रामलला) के लिए छोटा पालना
  • गंगाजल और पंचामृत
  • पीले या केसरिया वस्त्र, फूलमाला, तुलसी दल
  • चंदन, रोली, अक्षत, केसर
  • धूप, घी का दीपक, कपूर
  • धनिया पंजीरी, खीर, फल, मिठाई
  • रामचरितमानस या सुंदरकांड की पुस्तक
  • राम-ध्वजा (केसरिया झंडा) — घर पर लगाने की परंपरा कई जगह है

व्रत और पूजा की विधि

  1. सुबह जल्दी स्नान करके व्रत का संकल्प लें और घर के मंदिर को फूलों और तोरण से सजाएँ।
  2. राम दरबार की स्थापना करें और रामलला के लिए छोटा पालना सजाएँ।
  3. सुबह से रामचरितमानस के बालकांड का पाठ आरंभ करें, या परिवार मिलकर राम-नाम का कीर्तन करे।
  4. मध्याह्न (लगभग 12 बजे, पंचांग अनुसार मुहूर्त) में जन्मोत्सव मनाएँ — घंटी और शंख बजाएँ और ‘भए प्रगट कृपाला’ स्तुति गाएँ।
  5. रामलला का पंचामृत और गंगाजल से अभिषेक करें, नए वस्त्र पहनाएँ, चंदन-केसर का तिलक लगाएँ और पालने में झुलाएँ।
  6. तुलसी दल रखकर पंजीरी, खीर और फल का भोग लगाएँ।
  7. ‘श्री रामचन्द्र कृपालु भजु मन’ स्तुति और आरती करें, फिर सबको प्रसाद बाँटें।
  8. माता सीता, लक्ष्मण जी और हनुमान जी की भी पूजा करें — हनुमान जी के बिना राम दरबार पूरा नहीं होता।
  9. नवरात्रि की परंपरा के अनुसार कन्या पूजन करें और सामर्थ्य अनुसार भोजन-दान दें।
  10. शाम को दीप जलाकर आरती करें। व्रत का पारण परंपरा अनुसार उसी शाम या अगले दिन सुबह करें।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • फल, दूध, दही, पंचामृत
  • कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना
  • मखाना और सूखे मेवे
  • सेंधा नमक

क्या न खाएँ

  • अनाज — व्रत रखने वाले के लिए (जो आंशिक व्रत रखें, वे मध्याह्न पूजा के बाद सात्त्विक भोजन कर सकते हैं)
  • प्याज़ और लहसुन
  • मांस, मदिरा और नशा

अन्य नियम

  • वाणी में मर्यादा रखें — झूठ, कटु वचन और क्रोध से बचें
  • माता-पिता और बड़ों का आशीर्वाद लें — यही राम की सबसे बड़ी सीख है
  • 108 बार ‘राम’ नाम लिखने की सुंदर परंपरा भी है — बच्चों के साथ ज़रूर करें

मंत्र

राम तारक मंत्र (कीर्तन)

श्री राम जय राम जय जय राम

अर्थ:श्रीराम की जय हो, जय हो, जय हो। यह तेरह अक्षरों का सरल मंत्र है, जिसे कोई भी, कभी भी जप सकता है।

जप: दिन भर कीर्तन; कम से कम 1 माला (108)।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
राम प्रणाम मंत्र

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥

अर्थ:राम को, कल्याण करने वाले रामभद्र को, चंद्रमा जैसे शीतल रामचंद्र को, सृष्टि के विधाता को, रघुकुल के नाथ और सबके स्वामी, सीता जी के पति श्रीराम को नमस्कार है। (श्रीरामरक्षा स्तोत्र)

जप: पूजा में 11 बार।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
व्रत-कथा

श्रीराम जन्म की कथा

अयोध्या के राजा दशरथ बहुत धर्मात्मा और प्रजा-प्रिय थे। उनकी तीन रानियाँ थीं — कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा। राज्य में सब सुख था, पर एक ही दुख था — राजा की कोई संतान नहीं थी।

दुखी राजा अपने कुलगुरु वशिष्ठ जी के पास गए। गुरुदेव ने उन्हें धीरज बँधाया और कहा कि श्रृंगी ऋषि को बुलाकर पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराइए। बड़े विधि-विधान से यज्ञ हुआ।

यज्ञ की पूर्णाहुति पर अग्निदेव स्वयं हाथ में खीर (हविष्य) का पात्र लेकर प्रकट हुए और बोले — ‘राजन, यह खीर अपनी रानियों में बाँट दीजिए।’ राजा ने खीर तीनों रानियों में बाँट दी; रामचरितमानस के अनुसार सुमित्रा जी को दो भाग मिले।

समय आने पर चैत्र मास की शुक्ल नवमी आई। तुलसीदास जी उस घड़ी का सुंदर वर्णन करते हैं — न बहुत ठंड थी, न तेज़ धूप; शीतल, मंद, सुगंधित हवा बह रही थी, वन फूलों से भरे थे और नदियों में अमृत जैसा जल बह रहा था।

नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥ मध्यदिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥

रामचरितमानस, बालकांड

अर्थ:पवित्र चैत्र मास की नवमी तिथि थी, शुक्ल पक्ष और भगवान का प्रिय अभिजित मुहूर्त था। दोपहर का समय था — न बहुत ठंड, न तेज़ धूप। वह पवित्र समय सारे संसार को सुख देने वाला था।

ठीक मध्याह्न में माता कौशल्या के सामने प्रभु प्रकट हुए — पहले चतुर्भुज रूप में, हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए, गले में वनमाला, नीले मेघ जैसा सुंदर शरीर। यह अद्भुत रूप देखकर माता हर्ष से भर गईं।

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥ लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥

रामचरितमानस, बालकांड

अर्थ:दीनों पर दया करने वाले, कौशल्या जी का हित करने वाले कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरने वाले उनके अद्भुत रूप को देखकर माता हर्ष से भर गईं। सुंदर नेत्र, मेघ जैसा श्याम शरीर, चारों भुजाओं में अपने आयुध, आभूषण और वनमाला, बड़े-बड़े नेत्र — शोभा के सागर, खर राक्षस के शत्रु प्रभु प्रकट हुए।

माता कौशल्या ने हाथ जोड़कर स्तुति की और विनती की — ‘प्रभु, यह रूप छोड़कर बालक बन जाइए और बाल-लीला कीजिए; यह सुख सबसे अनुपम है।’ माता की बात सुनकर प्रभु मुस्कुराए और नन्हे बालक बनकर रोने लगे।

बालक के रोने की मधुर आवाज़ सुनकर रानियाँ दौड़ी आईं और दासियाँ ख़ुशी से नाचने लगीं। राजा दशरथ ने जब पुत्र-जन्म का समाचार सुना, तो मानो ब्रह्मानंद में डूब गए। पूरी अयोध्या में मंगल-गीत गूँजने लगे, घर-घर बंदनवार बँधे और खुले हाथों दान दिया गया।

इसी शुभ समय में कैकेयी जी के पुत्र भरत और सुमित्रा जी के पुत्र लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी जन्म हुआ। गुरु वशिष्ठ जी ने नामकरण किया और कहा — जो आनंद के सागर हैं और सारे संसार को विश्राम (शांति) देते हैं, उनका नाम ‘राम’ होगा।

कथा का संदेश: भगवान स्वयं ‘बालक’ बनकर माँ की गोद में आते हैं — यानी भगवान प्रेम से बँधते हैं, शक्ति से नहीं। राम-जन्म का उत्सव तभी सार्थक है जब हम उनकी मर्यादा को अपने घर में जगह दें।

सावधानी

मध्याह्न तक का व्रत और गर्मी का मौसम — शरीर में पानी की कमी न होने दें। बीमार, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा लेने वाले फलाहार रखें, डॉक्टर की सलाह लें और दवा कभी न छोड़ें। नवरात्रि के नौ दिन के व्रत के बाद पारण हल्के भोजन से करें।

पूजा के अंत में आरती

श्री राम स्तुति, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।