॥ वार्षिक व्रत-पर्व ॥ भगवान शिव (माता पार्वती सहित)

महाशिवरात्रि

शिव और शक्ति के मिलन की महान रात्रि — फलाहार व्रत, रात भर चार प्रहर की पूजा, बेलपत्र और ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप।

व्रत की पूजा या उद्यापन करवाएँWhatsApp पर संदेश, उत्तर 24 घंटे में
कब
फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (पूर्णिमांत पंचांग से; अमांत पंचांग में इसे माघ कृष्ण चतुर्दशी कहते हैं — दिन वही रहता है)। प्रायः फरवरी-मार्च में। मुख्य पूजा रात में, विशेषकर निशीथ काल (आधी रात के आसपास)। हर महीने की कृष्ण चतुर्दशी को ‘मासिक शिवरात्रि’ भी मनाई जाती है।
पूजनीय
भगवान शिव (माता पार्वती सहित)
संबंधित ग्रह
चंद्र ग्रह

अगली तिथियाँ

  1. 6मार्च महाशिवरात्रिशनिवार
पूरा पंचांग देखें

महाशिवरात्रि का महत्व

महाशिवरात्रि भगवान शिव की सबसे बड़ी रात्रि है। इसके पीछे कई मान्यताएँ हैं। एक मान्यता के अनुसार इसी रात शिव जी और माता पार्वती का विवाह हुआ था। दूसरी मान्यता है कि इसी रात शिव जी अनंत ज्योति-स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए थे, जिसका आदि और अंत ब्रह्मा जी और विष्णु जी भी नहीं खोज पाए।

‘शिव’ का अर्थ है कल्याण। रात्रि विश्राम और भीतर उतरने का समय है। इस रात जागकर शिव का ध्यान करना मन के अंधकार से जागने का प्रतीक माना गया है। इसीलिए इस रात सोने के बजाय जागरण, जप, भजन और पूजा की परंपरा है।

शिव जी को ‘आशुतोष’ कहते हैं — जल्दी प्रसन्न होने वाले। उन्हें सोना-चाँदी नहीं चाहिए; एक लोटा जल, एक बेलपत्र और सच्चा मन पर्याप्त है। नीचे दी गई शिकारी की कथा यही बताती है कि अनजाने में हुआ छोटा-सा पुण्य भी व्यर्थ नहीं जाता — और दया सबसे बड़ी पूजा है।

कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥

परंपरागत शिव स्तुति

अर्थ:जो कपूर के समान उजले हैं, करुणा के अवतार हैं, संसार के सार हैं, जिनके गले में नागराज का हार है और जो सदा भक्तों के हृदय-कमल में बसते हैं — उन भगवान शिव को माता भवानी सहित मैं नमस्कार करता हूँ।

पूजा सामग्री

  • शिवलिंग, या शिव-पार्वती का चित्र (मंदिर जाकर भी पूजा कर सकते हैं)
  • शुद्ध जल और गंगाजल, तांबे या पीतल का लोटा
  • कच्चा दूध, दही, घी, शहद, शक्कर (पंचामृत के लिए)
  • बेलपत्र — तीन पत्तियों वाले, साबुत और साफ़
  • धतूरा, आक (मदार) के फूल, शमी पत्र
  • सफ़ेद चंदन, भस्म (विभूति), अक्षत
  • सफ़ेद फूल, फूलमाला
  • जनेऊ, मौली, वस्त्र
  • धूप, घी का दीपक, कपूर
  • मौसमी फल (बेर विशेष), मिठाई
  • रुद्राक्ष की माला (जप के लिए)

व्रत और पूजा की विधि

  1. एक दिन पहले (त्रयोदशी को) सात्त्विक भोजन करें। चतुर्दशी की सुबह स्नान करके साफ़ — हो सके तो सफ़ेद — वस्त्र पहनें।
  2. हाथ में जल, अक्षत और फूल लेकर संकल्प लें: ‘मैं (नाम, गोत्र) आज महाशिवरात्रि का व्रत भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए रखूँगा/रखूँगी।’
  3. मंदिर में या घर पर शिवलिंग पर ‘ॐ नमः शिवाय’ बोलते हुए पतली धार से धीरे-धीरे जल चढ़ाएँ।
  4. फिर क्रम से दूध, दही, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। हर बार के बाद शुद्ध जल से स्नान कराएँ और अंत में गंगाजल चढ़ाएँ।
  5. चंदन या भस्म से त्रिपुंड (तीन आड़ी रेखाएँ) लगाएँ। अक्षत, सफ़ेद फूल, धतूरा, आक के फूल और बेलपत्र अर्पित करें। बेलपत्र साबुत हों, कटे-फटे नहीं; चिकनी सतह शिवलिंग की ओर रखकर चढ़ाएँ।
  6. धूप-दीप जलाएँ और फल-मिठाई का भोग लगाएँ। दिन भर जितना हो सके, मन में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते रहें।
  7. शाम को फिर स्नान करके रात्रि-पूजा की तैयारी करें। रात चार प्रहरों में बँटी होती है — हर प्रहर में एक बार अभिषेक और पूजा करें (नीचे ‘चार प्रहर की पूजा’ देखें)।
  8. रात भर जागरण करें — शिव पुराण की कथा, भजन, शिव चालीसा, रुद्राष्टक या ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप। परिवार साथ बैठकर शिकारी वाली कथा सुने।
  9. निशीथ काल (आधी रात के आसपास का लगभग 48 मिनट का समय) की पूजा सबसे विशेष मानी जाती है — उस समय शांत मन से शिव जी का ध्यान करें।
  10. अगली सुबह स्नान करके शिव जी की पूजा करें, किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को भोजन-दान दें और फिर व्रत का पारण करें। पारण का शुभ समय पंचांग से देख लें।
  11. जो पूरी रात न जाग सकें, वे कम से कम एक प्रहर (विशेषकर निशीथ काल) की पूजा पूरे मन से करें। शिव जी भाव देखते हैं।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • फल, दूध, दही, छाछ
  • साबूदाना, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, समा के चावल
  • उबले आलू, शकरकंद
  • मखाना, मूँगफली, सूखे मेवे
  • सेंधा नमक

क्या न खाएँ

  • अनाज और दालें (व्रत रखने वाले के लिए)
  • प्याज़ और लहसुन
  • मांस, मदिरा और हर प्रकार का नशा
  • साधारण नमक (सेंधा नमक लें)

अन्य नियम

  • शिवलिंग पर हल्दी, कुमकुम या सिंदूर, तुलसी और केतकी का फूल परंपरा से नहीं चढ़ाए जाते
  • शिवलिंग की आधी परिक्रमा की जाती है — जलाधारी (जल बहने वाली नाली) को लाँघा नहीं जाता
  • दिन में सोने से बचें; क्रोध और कटु वचन से दूर रहें
  • रात्रि-जागरण में फ़ोन और टीवी से दूर रहकर भजन-जप करें

मंत्र

पंचाक्षर मंत्र

ॐ नमः शिवाय

अर्थ:भगवान शिव को नमस्कार है। ‘न-मः-शि-वा-य’ — इन पाँच अक्षरों के कारण इसे पंचाक्षर मंत्र कहते हैं। इसे सबसे सरल और सबसे प्रभावशाली शिव मंत्र माना गया है; इसे कोई भी जप सकता है।

जप: महाशिवरात्रि पर कम से कम 1 माला (108); सामर्थ्य हो तो 11 माला या रात भर।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

अर्थ:हम तीन नेत्रों वाले, पवित्र सुगंध (यश) वाले और सबका पोषण बढ़ाने वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं। जैसे पका हुआ खरबूजा (ककड़ी) अपनी बेल के बंधन से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हम मृत्यु के बंधन से मुक्त हों, पर अमृत (मोक्ष) से कभी दूर न हों। (ऋग्वेद 7.59.12)

जप: रोज़ 1 माला; स्वास्थ्य-संकट में संकल्पपूर्वक जप पंडित जी के मार्गदर्शन में करें — और इलाज भी जारी रखें।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
व्रत-कथा

शिकारी चित्रभानु और बेलपत्र की कथा

शिव पुराण से जुड़ी यह कथा पीढ़ियों से महाशिवरात्रि पर सुनाई जाती है। प्राचीन काल में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। जंगल में जानवरों का शिकार करके वह अपने परिवार का पेट पालता था। उस पर एक साहूकार का कर्ज़ था, जिसे वह समय पर नहीं चुका पाया।

क्रोधित साहूकार ने उसे पकड़कर एक शिव मंदिर में बंद कर दिया। संयोग से उस दिन महाशिवरात्रि थी। मंदिर में भक्त दिन भर शिव जी की पूजा करते रहे और शिवरात्रि की कथा कहते रहे। भूखा-प्यासा चित्रभानु बैठा-बैठा सब सुनता रहा और ‘शिव, शिव’ के शब्द उसके कानों में पड़ते रहे।

शाम को साहूकार ने उसे बुलाया। चित्रभानु ने वचन दिया कि वह कल तक कर्ज़ लौटा देगा। छूटते ही वह शिकार की खोज में जंगल की ओर चल पड़ा। वह दिन भर का भूखा था, पर ख़ाली हाथ घर नहीं लौट सकता था।

जंगल में एक तालाब के किनारे बेल का पेड़ था। चित्रभानु उस पर चढ़कर बैठ गया, ताकि पानी पीने आने वाले किसी जानवर का शिकार कर सके। पेड़ के ठीक नीचे पत्तों से ढका एक शिवलिंग था, जो उसे दिखाई नहीं दिया। बैठने की जगह बनाने के लिए वह टहनियाँ तोड़ता गया और बेल के पत्ते नीचे शिवलिंग पर गिरते गए। उसके पास रखे पानी की कुछ बूँदें भी शिवलिंग पर गिर पड़ीं। इस तरह अनजाने में ही रात के पहले प्रहर की पूजा हो गई — और दिन भर भूखा रहने से उसका व्रत भी हो गया।

पहला प्रहर बीतते-बीतते एक हिरणी पानी पीने आई। चित्रभानु ने जैसे ही धनुष पर बाण चढ़ाया, हिरणी बोली — ‘मैं गर्भवती हूँ। अभी मुझे मारोगे तो एक साथ दो जीवों की हत्या होगी। मुझे जाने दो; बच्चे को जन्म देकर मैं स्वयं तुम्हारे पास लौट आऊँगी।’ चित्रभानु का मन पसीज गया और उसने उसे जाने दिया। धनुष ढीला करते समय फिर कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए — दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गई।

कुछ देर बाद दूसरी हिरणी आई। उसने कहा — ‘मैं अपने पति को खोज रही हूँ। उनसे मिल लूँ, फिर तुम्हारे पास लौट आऊँगी।’ चित्रभानु ने उसे भी जाने दिया। फिर तीसरी हिरणी अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ आई और विनती की कि बच्चों को उनके पिता के पास छोड़कर वह लौट आएगी। शिकारी ने उसे भी जाने दिया। हर बार पत्ते गिरते रहे और पूजा होती रही।

भोर होने को थी, तभी एक हृष्ट-पुष्ट हिरण आया। चित्रभानु ने सोचा, अब इसे नहीं छोड़ूँगा। हिरण बोला — ‘अगर तुमने मेरी पत्नियों और बच्चों को मार दिया है, तो मुझे भी मार दो; उनके बिना मैं जीकर क्या करूँगा। और यदि उन्हें जीवन दिया है, तो मुझे भी थोड़ा समय दो — मैं उनसे मिलकर लौट आऊँगा।’ चित्रभानु ने रात की सारी बात बता दी और उसे भी जाने दिया।

रात भर के उपवास, जागरण और अनजाने में हुई शिव-पूजा से शिकारी का हृदय बदल चुका था। थोड़ी देर बाद वह हिरण अपने पूरे परिवार के साथ वचन निभाने लौट आया। जानवरों की यह सच्चाई और आपसी प्रेम देखकर चित्रभानु की आँखों में आँसू आ गए। उसने धनुष-बाण फेंक दिया और उन सबको मुक्त कर दिया। उसी क्षण से उसने हिंसा छोड़ दी।

तभी भगवान शिव प्रकट हुए और बोले — ‘अनजाने में ही सही, तुमने महाशिवरात्रि का व्रत, जागरण और चारों प्रहर की पूजा की है, और सबसे बढ़कर दया की है। मैं तुमसे प्रसन्न हूँ।’ शिव जी ने उसे सुख-समृद्धि का वरदान दिया, और कथा के अनुसार अंत में उसे शिवलोक प्राप्त हुआ। वचन निभाने वाले हिरण परिवार को भी मोक्ष मिला।

कथा का संदेश: शिव जी को प्रसन्न करने के लिए आडंबर नहीं चाहिए। एक बेलपत्र, एक लोटा जल और — सबसे ज़रूरी — हर जीव के प्रति दया।

चार प्रहर की पूजा

महाशिवरात्रि की रात (सूर्यास्त से अगले सूर्योदय तक) चार प्रहरों में बाँटी जाती है — हर प्रहर लगभग 3 घंटे का होता है। हर प्रहर में एक बार अभिषेक और पूजा करने की परंपरा है। ठीक समय सूर्यास्त के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने शहर का पंचांग देख लें।

  • पहला प्रहर (सूर्यास्त के बाद, लगभग शाम 6 से रात 9 बजे): जल और दूध से अभिषेक, बेलपत्र अर्पण, आरती।
  • दूसरा प्रहर (लगभग रात 9 से 12 बजे): दही से अभिषेक, फूल और धतूरा अर्पण।
  • तीसरा प्रहर (लगभग रात 12 से 3 बजे): घी से अभिषेक। आधी रात के आसपास का निशीथ काल इसी समय के आसपास आता है — यह सबसे विशेष पूजा का समय है।
  • चौथा प्रहर (लगभग रात 3 बजे से सूर्योदय तक): शहद से अभिषेक, फिर गंगाजल से स्नान और आरती।

कई घरों में चारों प्रहर के लिए दूध, दही, घी और शहद का यह क्रम माना जाता है; कुछ परिवार हर प्रहर में पंचामृत से अभिषेक करते हैं। अपनी परंपरा के अनुसार करें। हर प्रहर में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप, बेलपत्र और आरती ज़रूर करें।

चारों प्रहर की पूजा संभव न हो तो एक प्रहर में ही पूरे मन से पूजा करें — शिकारी की कथा याद रखिए, शिव जी भाव से रीझते हैं।

सावधानी

यह व्रत लंबा होता है और रात्रि-जागरण भी होता है। बीमार, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा लेने वाले फलाहार रखें, पर्याप्त पानी पिएँ और डॉक्टर की सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। मंदिरों में भीड़ बहुत होती है — बुज़ुर्गों और बच्चों का ध्यान रखें; घर पर श्रद्धा से की गई पूजा का फल भी उतना ही है।

पूजा के अंत में आरती

श्री शिव जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।