कथा से पहले
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेन्द्रहारम्। सदा वसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
प्रचलित शिव-स्तुति
अर्थ:कपूर जैसे गोरे, करुणा के अवतार, संसार के सार, सर्पराज का हार पहनने वाले, और जो सदा हृदय-कमल में बसते हैं — उन भगवान शिव को माता भवानी सहित मैं प्रणाम करता हूँ।
शिव-पार्वती को आदर्श दंपती माना जाता है। उनकी कथा दो जन्मों की है — पहले जन्म में सती, दूसरे में पार्वती। यह कथा बताती है कि सच्चा संकल्प जन्मों तक साथ चलता है, और प्रेम में सम्मान सबसे बड़ा गहना है।
सती और दक्ष का यज्ञ
प्रजापति दक्ष की पुत्री सती ने भगवान शिव से विवाह किया था। दक्ष को शिव जी का वैरागी रूप — भस्म, बाघंबर, सर्प और भूत-गण — पसंद नहीं था। एक बार दक्ष ने विशाल यज्ञ किया और सब देवताओं को बुलाया, पर अपने दामाद शिव जी को नहीं बुलाया।
सती को यह पता चला तो उन्होंने पिता के घर जाने की इच्छा जताई। शिव जी ने समझाया — “बिना बुलाए जाना ठीक नहीं, वहाँ तुम्हारा मान नहीं होगा।” पर सती का मन नहीं माना और वे चली गईं। यज्ञ में न शिव जी का भाग रखा गया था, न किसी ने सती का आदर किया। उलटे दक्ष ने सबके सामने शिव जी का अपमान किया।
अपने पति का अपमान सती सह न सकीं। उन्होंने कहा कि ऐसे पिता से मिला यह शरीर उन्हें नहीं चाहिए, और योग-अग्नि में अपनी देह त्याग दी। समाचार पाकर शिव जी शोक और क्रोध से भर उठे। उनकी जटा से वीरभद्र प्रकट हुए, जिन्होंने दक्ष का यज्ञ ध्वस्त कर दिया। बाद में देवताओं की प्रार्थना पर करुणामय शिव ने दक्ष को फिर जीवन दिया और यज्ञ पूरा करवाया।
सती के वियोग में शिव जी व्याकुल होकर भटकने लगे। तब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती की देह के अंश किए। मान्यता है कि जहाँ-जहाँ वे अंश गिरे, वहाँ-वहाँ शक्तिपीठ बने। इसके बाद शिव जी गहरी समाधि में चले गए।
पार्वती का जन्म और कठोर तप
सती ने अगला जन्म पर्वतराज हिमवान और रानी मेना के घर लिया और ‘पार्वती’ कहलाईं। देवर्षि नारद ने उनका हाथ देखकर बताया कि इनका विवाह एक ऐसे वर से होगा जो वैरागी है, जिसका न घर है न ठिकाना — यानी स्वयं भगवान शिव। माता-पिता चिंता में पड़ गए, पर पार्वती जी के मन में तो पिछले जन्म से ही शिव बसे थे।
उन्होंने शिव जी को पाने के लिए तप करने का निश्चय किया। माँ मेना ने रोका। कहते हैं, उन्होंने ‘उ मा’ — यानी ‘अरी, ऐसा मत कर’ — कहा, और महाकवि कालिदास के अनुसार इसी से पार्वती जी का एक नाम ‘उमा’ पड़ा। पर पार्वती जी नहीं मानीं।
वन में जाकर उन्होंने कठोर तप शुरू किया। पहले केवल फल-फूल खाए, फिर केवल पत्ते, और फिर पत्ते भी छोड़ दिए — इसीलिए उन्हें ‘अपर्णा’ कहा गया। गर्मी, वर्षा, कड़कती ठंड — कुछ भी उनका संकल्प न डिगा सका।
सप्तर्षियों की परीक्षा और कामदेव का दहन
शिव जी ने पार्वती जी की परीक्षा के लिए सप्तर्षियों को भेजा। ऋषियों ने कहा — “बेटी, जिसके लिए तुम तप कर रही हो, वह तो श्मशान में रहता है, भस्म लगाता है, उसका न घर है न ठिकाना। तुम्हारे लिए हम सुंदर और गुणवान वर ढूँढ देंगे।” पार्वती जी ने दृढ़ता से उत्तर दिया —
जनम कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी॥
रामचरितमानस, बालकांड
अर्थ:करोड़ों जन्मों तक मेरी यही हठ रहेगी — विवाह करूँगी तो शिव जी से, नहीं तो कुँवारी ही रहूँगी।
उधर तारकासुर नाम के दैत्य ने वरदान पा लिया था कि उसे केवल शिव जी का पुत्र ही मार सकेगा। वह देवताओं को सताने लगा। देवताओं ने सोचा — शिव जी तो समाधि में हैं, उनका विवाह कैसे हो? उन्होंने प्रेम के देवता कामदेव को भेजा। कामदेव ने वसंत का वातावरण रचकर शिव जी पर पुष्प-बाण चलाया। समाधि टूटी तो शिव जी ने तीसरा नेत्र खोला और कामदेव भस्म हो गए।
कामदेव की पत्नी रति के विलाप पर करुणामय शिव ने वरदान दिया कि कामदेव बिना शरीर के, ‘अनंग’ बनकर, सबके मन में रहेंगे, और आगे चलकर श्रीकृष्ण के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में फिर जन्म लेंगे। अंत में पार्वती जी के अटल प्रेम और तप से प्रसन्न होकर शिव जी ने विवाह स्वीकार कर लिया।
भूत-गणों की बारात और मंगल विवाह
शिव जी की बारात अनोखी थी — नंदी पर सवार दूल्हा, शरीर पर भस्म, गले में सर्पों की माला, जटाओं में गंगा और माथे पर चंद्रमा। साथ में देवता भी थे और भूत-प्रेत, गण और बेताल भी — कोई बिना सिर का, कोई अनेक मुखों वाला, सब नाचते-गाते!
बारात देखकर माँ मेना घबरा गईं — “मैं अपनी कोमल बेटी इस वैरागी को नहीं दूँगी!” तब नारद जी और देवताओं ने समझाया कि पार्वती स्वयं जगदंबा हैं और शिव जी जगत के स्वामी। पार्वती जी की प्रार्थना पर शिव जी ने अत्यंत सुंदर, दिव्य रूप धारण किया, और मेना जी का मन प्रसन्न हो गया।
वेद-मंत्रों और मंगल-गीतों के बीच शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ। मान्यता है कि महाशिवरात्रि इसी दिव्य मिलन की रात है। आगे चलकर उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का अंत किया और देवताओं को भय से मुक्त किया।
यह कथा क्या सिखाती है
संकल्प की शक्ति। पार्वती जी ने न परीक्षा से डरीं, न कठिनाई से — अटल संकल्प के आगे स्वयं महादेव को भी आना पड़ा।
सम्मान ही रिश्तों की नींव है। सती की कथा सिखाती है कि जीवनसाथी का सम्मान सबसे ऊपर है, और यह भी कि जहाँ आदर न हो, वहाँ जाने से पहले ठहरकर सोचना चाहिए।
बाहरी रूप नहीं, भीतर का गुण देखिए। भस्म और सर्पों वाले वैरागी शिव ही देवों के देव महादेव हैं।
कथा के बाद आरती
श्री शिव जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
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