- कब
- होली के अगले दिन (चैत्र कृष्ण प्रतिपदा, धुलंडी) से गौर-पूजन शुरू होता है और चैत्र शुक्ल तृतीया को मुख्य गणगौर पर्व मनाया जाता है — लगभग 16 से 18 दिन। प्रायः मार्च-अप्रैल में। राजस्थान, मध्य प्रदेश के मालवा, गुजरात के कुछ भागों और देश-विदेश में बसे राजस्थानी परिवारों में यह बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
- पूजनीय
- ईसर जी (भगवान शिव) और गौर (माता पार्वती)
गणगौर का महत्व
‘गण’ यानी शिव (गणों के स्वामी) और ‘गौर’ यानी गौरी — माता पार्वती। गणगौर शिव-पार्वती के अटूट प्रेम और सौभाग्य का पर्व है। राजस्थान में शिव जी को प्यार से ‘ईसर जी’ और पार्वती जी को ‘गौर’ या ‘गवर’ कहते हैं।
मान्यता है कि माता पार्वती होली के बाद अपने मायके आती हैं, और लगभग सोलह दिन बाद ईसर जी उन्हें लेने आते हैं — चैत्र शुक्ल तृतीया को गौर की विदाई होती है। इसीलिए गणगौर के गीतों में बेटी के मायके आने का आनंद भी है और विदाई की कसक भी।
कुँवारी कन्याएँ अच्छे वर की कामना से और विवाहित स्त्रियाँ अखंड सौभाग्य और पति के प्रेम के लिए गौर पूजती हैं। नवविवाहिताएँ अपनी पहली गणगौर प्रायः मायके में पूरे सोलह दिन पूजती हैं।
गणगौर राजस्थान की संस्कृति का भी उत्सव है — रंग-बिरंगे लहरिये, मेहंदी, घूमर, सिर पर कलश रखकर गीत गाती स्त्रियाँ, और कई शहरों में गणगौर की शाही सवारी। ‘गोर गोर गोमती, ईसर पूजे पार्वती’ जैसे लोक-गीत पीढ़ियों से गाए जा रहे हैं।
पंडित जी से सुनिए
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- होली के अगले दिन (धुलंडी) से पूजा शुरू करें। कई जगह होलिका की राख या मिट्टी से सोलह पिंडियाँ बनाकर पूजा आरंभ होती है; कुछ दिनों बाद मिट्टी की ईसर-गौर बनाई या लाई जाती हैं।
- रोज़ सुबह स्नान करके कन्याएँ और स्त्रियाँ गीत गाती हुई बाग़-बगीचे से दूब-फूल और कुएँ या नल से ताज़ा जल लाती हैं।
- दूब से जल के छींटे देकर गौर का पूजन करें — दीवार या काग़ज़ पर रोली, मेहंदी, काजल और हल्दी की सोलह-सोलह बिंदियाँ लगाने की परंपरा है।
- पूजा के समय ‘गोर गोर गोमती…’ जैसे पारंपरिक गीत गाएँ। यह क्रम हर दिन चलता है।
- पूजा के बाद गणगौर की कहानी (नीचे) और बिनायक जी (गणेश जी) की कहानी सुनें।
- बीच के दिनों में शाम को गीत, घूमर और गौर को ‘पानी पिलाने’ की रौनक कई मोहल्लों में होती है; मारवाड़ के कई भागों में इन्हीं दिनों घुड़ले का त्योहार भी मनाया जाता है।
- चैत्र शुक्ल द्वितीया को ‘सिंजारा’ मनाया जाता है — बेटियों और बहुओं को मेहंदी, शृंगार, वस्त्र, घेवर और मिठाइयाँ भेजी जाती हैं और स्त्रियाँ मेहंदी लगाती हैं।
- चैत्र शुक्ल तृतीया को मुख्य पूजा करें — ईसर-गौर को सुंदर वस्त्र-आभूषण पहनाएँ, सुहाग सामग्री अर्पित करें और गुने व मिठाई का भोग लगाएँ।
- विवाहित स्त्रियाँ गौर को अर्पित सिंदूर से अपनी माँग भरती हैं और बायना सास को देकर आशीर्वाद लेती हैं।
- शाम को गीत गाते हुए गणगौर की सवारी निकालकर गौर को जल में विदा (विसर्जित) किया जाता है। पर्यावरण के लिए घर पर बाल्टी या गमले में विसर्जन करके मिट्टी पौधों में डाल सकते हैं।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- व्रत के दिन (तृतीया) पूजा के बाद एक समय सात्त्विक भोजन
- गुने, घेवर और फल — प्रसाद रूप में
क्या न खाएँ
- मांस, मदिरा और तामसिक भोजन
- व्रत रखने वाली स्त्रियाँ पूजा से पहले अन्न न लें
अन्य नियम
- रोज़ ताज़े जल और दूब से ही पूजा करें
- गीत-संगीत और आनंद इस पर्व की आत्मा है — सखियों और परिवार के साथ मिलकर मनाएँ
- जो रोज़ पूजा न कर पाएँ, वे पहले और अंतिम दिन अवश्य करें
- हर घर की रीत अलग है — घर की बड़ी स्त्रियों से अपनी परंपरा पूछ लें
मंत्र
ॐ गौर्यै नमः
अर्थ:माता गौरी (पार्वती) को नमस्कार है।
जप: पूजा में 11 या 108 बार।
ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः
अर्थ:माता उमा और भगवान महेश्वर — यानी गौर और ईसर जी — दोनों को नमस्कार है।
जप: विदाई के दिन की पूजा में 11 बार।
गणगौर की कथा
एक बार चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन भगवान शिव, माता पार्वती और नारद जी धरती पर भ्रमण करने निकले। वे एक गाँव में पहुँचे। गाँव की स्त्रियों को पता चला कि शिव-पार्वती पधारे हैं, तो सब उनकी पूजा की तैयारी करने लगीं।
गाँव की साधारण, निर्धन स्त्रियाँ सबसे पहले पहुँचीं। उनके पास न सोने-चाँदी की थाली थी, न मेवे-मिठाई — थी तो बस हल्दी, अक्षत, जल और सच्चा मन। उन्होंने बड़ी श्रद्धा से माता का पूजन किया। माता पार्वती उनके भाव से बहुत प्रसन्न हुईं और उन पर सुहाग-रस छिड़ककर अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। वे स्त्रियाँ धन्य होकर लौट गईं।
कुछ देर बाद गाँव की धनी स्त्रियाँ सोने-चाँदी की थालियों में तरह-तरह के पकवान सजाकर पहुँचीं। शिव जी ने मुस्कुराकर पार्वती जी से पूछा — ‘सारा सुहाग-रस तो तुमने पहले आई स्त्रियों को दे दिया, अब इन्हें क्या दोगी?’ पार्वती जी बोलीं — ‘प्रभु, उन्हें ऊपर का सुहाग दिया था; इन्हें मैं अपना सुहाग दूँगी।’
पूजा के बाद माता पार्वती ने अपनी उँगली से सुहाग के छींटे उन स्त्रियों पर छिड़के — कथा कहती है, जिस पर जैसे छींटे पड़े, उसे वैसा ही सौभाग्य मिला। इसका भाव यह है कि माता ने अपने भक्तों को अपना सबसे कीमती आशीर्वाद दे दिया।
फिर पार्वती जी शिव जी से आज्ञा लेकर नदी पर स्नान करने गईं। वहाँ उन्होंने बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा की, बालू के ही पकवान बनाकर भोग लगाया और दो कण प्रसाद रूप में ग्रहण किए। शिव जी प्रकट हुए और वरदान दिया — ‘आज के दिन जो स्त्री मेरी और तुम्हारी पूजा करेगी, उसका सुहाग अमर रहेगा।’
पार्वती जी को लौटने में देर हो गई। शिव जी ने कारण पूछा तो उन्होंने बात टालते हुए कहा कि मायके वाले मिल गए थे, उन्होंने दूध-भात खिलाया। शिव जी अंतर्यामी थे — उन्होंने कहा, चलो, तुम्हारे मायके वालों से मिलते हैं। नदी किनारे पहुँचे तो वहाँ सचमुच एक सुंदर महल दिखाई दिया, जहाँ पार्वती जी के माता-पिता और भाई ने उनका भव्य स्वागत किया।
कुछ समय रुककर वे लौट चले। रास्ते में शिव जी ने कहा कि अपनी माला वहीं भूल आया हूँ। नारद जी माला लेने गए, तो वहाँ न महल था, न कोई — बस घना जंगल, और एक पेड़ पर शिव जी की माला टँगी थी। नारद जी समझ गए कि यह माता पार्वती की लीला थी, जिससे उन्होंने अपनी पूजा की बात गुप्त रखी।
मान्यता है कि तभी से गणगौर की पूजा स्त्रियाँ मन लगाकर, चुपचाप श्रद्धा से करती हैं, और अपनी मनोकामना किसी को बताती नहीं — क्योंकि सच्ची पूजा दिखावे के लिए नहीं, मन से होती है।
कथा का संदेश: माता को सोने की थाली नहीं, सच्चा मन प्रिय है। जो पहले श्रद्धा से आया, उसे पहले आशीर्वाद मिला।
16 दिन की गणगौर पूजा कैसे होती है
गणगौर पूजा हर घर और क्षेत्र में थोड़ी अलग होती है, पर मूल क्रम लगभग ऐसा रहता है:
- पहला दिन (धुलंडी, होली के अगले दिन): होलिका की राख या मिट्टी से सोलह पिंडियाँ बनाकर गौर-पूजन की शुरुआत। नवविवाहिताओं के लिए यह विशेष दिन होता है।
- रोज़ सुबह: बाग़ से दूब और फूल, ताज़ा जल, गीत गाते हुए लाना; दूब से जल के छींटे देकर पूजा; रोली, मेहंदी और काजल की सोलह-सोलह बिंदियाँ; ‘गोर गोर गोमती’ गीत; फिर गणगौर और बिनायक जी की कहानी।
- बीच के दिन: कई जगह मिट्टी लाकर ईसर-गौर की नई प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं; मारवाड़ के कई भागों में इन्हीं दिनों घुड़ले का त्योहार मनाया जाता है।
- शाम: कई मोहल्लों में गीत, घूमर और गौर को ‘पानी पिलाने’ की रौनक।
- चैत्र शुक्ल द्वितीया — सिंजारा: मेहंदी, नए वस्त्र, घेवर और मायके-ससुराल से उपहार।
- चैत्र शुक्ल तृतीया — गणगौर: शृंगार, गुने का भोग, सुहाग पूजन, बायना, और शाम को गीतों के साथ गौर की विदाई।
गणगौर की सुंदरता यही है कि हर घर की रीत अपनी है। अपने घर की बड़ी स्त्रियों से अपनी परंपरा पूछकर ही पूजा करें।
उद्यापन
नवविवाहिता की पहली गणगौर का उद्यापन (राजस्थान में ‘उजमना’) कई परिवारों में धूमधाम से होता है — सुहागिनों या कन्याओं को भोजन कराकर सुहाग सामग्री और उपहार दिए जाते हैं। विधि परिवार की परंपरा के अनुसार करें।
सावधानी
गणगौर का व्रत प्रायः हल्का होता है, पर लंबे दिनों तक सुबह जल्दी उठना, धूप में आना-जाना और देर तक गीत-नृत्य थका देता है। गर्भवती, बुज़ुर्ग और बीमार स्त्रियाँ अपनी क्षमता के अनुसार ही भाग लें, पानी भरपूर पिएँ, व्रत रखें तो फलाहार लें, और नियमित दवा कभी न छोड़ें। विसर्जन के समय कुएँ-तालाब के किनारे बच्चों का विशेष ध्यान रखें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।