॥ मासिक व्रत ॥ भगवान शिव और माता पार्वती

प्रदोष व्रत

संध्या के प्रदोष काल में भगवान शिव की पूजा का व्रत: संकट, रोग, कर्ज़ और दरिद्रता से मुक्ति और सुखी परिवार के लिए। वार के अनुसार अलग-अलग फल।

कब
हर महीने दो बार: कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी (तेरहवीं तिथि)। मुख्य पूजा प्रदोष काल में होती है, यानी सूर्यास्त के आसपास का संध्या समय। सटीक समय पंचांग से देखें। जिस वार को त्रयोदशी हो, उसी के नाम से प्रदोष कहलाता है, जैसे सोम प्रदोष, भौम प्रदोष, शनि प्रदोष।
पूजनीय
भगवान शिव और माता पार्वती

अगली तिथियाँ

  1. 6नवंबर प्रदोष व्रतशुक्रवार · शुक्र प्रदोष
  2. 22नवंबर प्रदोष व्रतरविवार · रवि प्रदोष
  3. 6दिसंबर प्रदोष व्रतरविवार · रवि प्रदोष
  4. 21दिसंबर प्रदोष व्रतसोमवार · सोम प्रदोष
  5. 5जनवरी प्रदोष व्रतमंगलवार · भौम प्रदोष
  6. 20जनवरी प्रदोष व्रतबुधवार · बुध प्रदोष
  7. 3फ़रवरी प्रदोष व्रतबुधवार · बुध प्रदोष
  8. 18फ़रवरी प्रदोष व्रतगुरुवार · गुरु प्रदोष
  9. 5मार्च प्रदोष व्रतशुक्रवार · शुक्र प्रदोष
  10. 20मार्च प्रदोष व्रतशनिवार · शनि प्रदोष
  11. 4अप्रैल प्रदोष व्रतरविवार · रवि प्रदोष
  12. 18अप्रैल प्रदोष व्रतरविवार · रवि प्रदोष
पूरा पंचांग देखें

प्रदोष व्रत का महत्व

‘प्रदोष’ का अर्थ है संध्या का समय, जब दिन ढल रहा होता है और रात शुरू होने वाली होती है। मान्यता है कि त्रयोदशी के प्रदोष काल में भगवान शिव कैलाश पर्वत पर अत्यंत प्रसन्न होकर नृत्य करते हैं और सभी देवता उनकी स्तुति करते हैं। इस समय की गई शिव पूजा का फल बहुत बड़ा माना जाता है।

स्कंद पुराण में प्रदोष व्रत की महिमा बताई गई है। यह व्रत संकटों से मुक्ति, रोगों से रक्षा, कर्ज़ से छुटकारा, दरिद्रता के नाश, संतान-सुख और दांपत्य जीवन में प्रेम के लिए किया जाता है। स्त्री-पुरुष, कोई भी यह व्रत रख सकता है।

इस व्रत की सबसे सुंदर बात यह है कि इसका फल वार के अनुसार अलग-अलग माना गया है। इसलिए कई भक्त अपनी कामना के अनुसार विशेष वार वाले प्रदोष से व्रत आरंभ करते हैं, जैसे संतान की कामना के लिए शनि प्रदोष और रोगों से मुक्ति के लिए भौम प्रदोष।

प्रदोष के दिन शिव जी के साथ पूरे शिव परिवार की पूजा होती है: माता पार्वती, श्री गणेश, कार्तिकेय और नंदी जी। संध्या के समय दीपक जलाकर शिव जी का ध्यान करना मन को गहरी शांति देता है।

पूजा सामग्री

  • शिवलिंग या शिव परिवार का चित्र
  • जल, कच्चा दूध, गंगाजल
  • पंचामृत: दूध, दही, घी, शहद, शक्कर
  • बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल
  • सफ़ेद फूल और माला
  • सफ़ेद चंदन, अक्षत
  • जनेऊ
  • धूप, घी का दीपक, कपूर
  • फल, मिठाई (भोग के लिए)
  • माता पार्वती के लिए श्रृंगार की वस्तुएँ
  • सफ़ेद वस्त्र या आसन

व्रत और पूजा की विधि

  1. त्रयोदशी की सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और हाथ में जल-अक्षत लेकर प्रदोष व्रत का संकल्प लें।
  2. दिन भर अपनी शक्ति के अनुसार निराहार या फलाहार रहें और मन में ‘ॐ नमः शिवाय’ का जप करते रहें।
  3. सूर्यास्त से कुछ पहले दोबारा स्नान करें या हाथ-पैर धोकर स्वच्छ वस्त्र पहनें। प्रदोष पूजा से पहले यह दूसरा स्नान परंपरा का अंग है।
  4. पूजा-स्थान को साफ़ करें, पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें। पहले गणेश जी का स्मरण करें।
  5. प्रदोष काल में शिवलिंग का जल, दूध और पंचामृत से अभिषेक करें, फिर शुद्ध जल चढ़ाएँ।
  6. सफ़ेद चंदन, अक्षत, बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और जनेऊ अर्पित करें।
  7. माता पार्वती, श्री गणेश, कार्तिकेय जी और नंदी जी की भी पूजा करें।
  8. धूप और घी का दीपक जलाएँ, फल-मिठाई का भोग लगाएँ।
  9. प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें।
  10. ‘ॐ नमः शिवाय’ की कम से कम एक माला जप करें। चाहें तो महामृत्युंजय मंत्र का जप करें।
  11. “ॐ जय शिव ओंकारा” से आरती करें और प्रसाद बाँटें।
  12. पूजा के बाद फलाहार या सात्त्विक भोजन से व्रत खोलें। कुछ परिवारों में पारण अगले दिन सुबह किया जाता है।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • फल, दूध, दही, मखाना
  • पूजा के बाद एक बार सात्त्विक भोजन या फलाहार
  • सेंधा नमक

क्या न खाएँ

  • पूजा से पहले अन्न
  • प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा
  • बहुत तला और तामसिक भोजन

अन्य नियम

  • मुख्य पूजा प्रदोष काल में ही करें। सुबह की पूजा के साथ संध्या पूजा न छोड़ें।
  • शिवलिंग पर हल्दी, सिंदूर-कुमकुम, तुलसी और केतकी के फूल नहीं चढ़ाए जाते।
  • दिन में क्रोध, निंदा और झगड़े से दूर रहें।
  • संध्या के समय घर में दीपक अवश्य जलाएँ।

मंत्र

पंचाक्षर मंत्र

ॐ नमः शिवाय

अर्थ:भगवान शिव को नमस्कार।

जप: प्रदोष काल में कम से कम 1 माला (108 बार), रुद्राक्ष की माला से

माला / बोलकर जाप
महामृत्युंजय मंत्र

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥

अर्थ:हम तीन नेत्रों वाले भगवान शिव की पूजा करते हैं, जो जीवन को सुगंध की तरह सुंदर बनाते हैं और पोषण देते हैं। जैसे पका खरबूजा बेल से सहज ही अलग हो जाता है, वैसे ही हमें मृत्यु के भय से मुक्त करें, पर अमृत से नहीं।

जप: रोग-शांति और रक्षा के लिए 1 माला

माला / बोलकर जाप
व्रत-कथा

प्रदोष व्रत कथा: विधवा ब्राह्मणी और विदर्भ का राजकुमार

प्राचीन समय में एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो चुका था। अपने छोटे-से पुत्र के साथ वह भिक्षा माँगकर किसी तरह गुज़ारा करती थी। वह बहुत धर्मपरायण और दयालु थी।

एक दिन भिक्षा माँगकर लौटते समय उसे नदी के किनारे एक सुंदर, तेजस्वी बालक अकेला बैठा मिला। वह बहुत डरा हुआ और भूखा था। ब्राह्मणी ने प्रेम से पूछा तो पता चला कि वह विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त है। शत्रुओं ने आक्रमण करके उसके पिता को मार डाला था और राज्य छीन लिया था। माता भी नहीं रहीं और वह अनाथ होकर भटक रहा था।

ब्राह्मणी का हृदय पसीज गया। वह उसे अपने घर ले आई और अपने पुत्र की तरह ही प्रेम से पालने लगी। अब दोनों बालक साथ-साथ बड़े होने लगे।

एक दिन ब्राह्मणी दोनों बालकों को लेकर शांडिल्य ऋषि के आश्रम में गई। ऋषि ने राजकुमार को देखते ही पहचान लिया और उसके पिता के युद्ध में मारे जाने की सारी कथा सुनाई। ब्राह्मणी ने पूछा, “महाराज, इन बालकों का भविष्य कैसे सँवरेगा?” ऋषि ने कहा, “तुम तीनों श्रद्धा से प्रदोष व्रत करो और भगवान शिव की पूजा करो। उनकी कृपा से सब अच्छा होगा।” उन्होंने प्रदोष व्रत की पूरी विधि बताई। ब्राह्मणी और दोनों बालकों ने उसी दिन से प्रदोष व्रत करना शुरू कर दिया।

कुछ समय बाद एक दिन दोनों बालक वन में घूमने गए। वहाँ कुछ गंधर्व कन्याएँ खेल रही थीं। ब्राह्मण-पुत्र तो जल्दी घर लौट आया, पर राजकुमार धर्मगुप्त वहीं रुक गया। उन कन्याओं में अंशुमती नाम की एक गंधर्व कन्या थी। राजकुमार और अंशुमती की भेंट हुई, दोनों ने एक-दूसरे को पसंद किया और अंशुमती ने उसे अपने पिता से मिलने बुलाया।

इधर भगवान शिव ने गंधर्वराज को स्वप्न में आदेश दिया कि अपनी पुत्री अंशुमती का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कर दो। गंधर्वराज ने भगवान की आज्ञा मानकर धूमधाम से दोनों का विवाह कर दिया।

इसके बाद गंधर्वराज की सेना की सहायता से धर्मगुप्त ने विदर्भ पर चढ़ाई की, शत्रुओं को हराया और अपने पिता का राज्य फिर से प्राप्त कर लिया। राजा बनकर धर्मगुप्त ने उस ब्राह्मणी को राजमाता का सम्मान दिया और ब्राह्मण-पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया।

राजा धर्मगुप्त जानता था कि यह सब प्रदोष व्रत और भगवान शिव की कृपा का फल है। कथा आती है कि उसी दिन से उसके राज्य में प्रदोष व्रत का प्रचलन हुआ, और जो भी श्रद्धा से यह व्रत करता है, उसके दुख-दारिद्र्य दूर होते हैं।

कथा का सार: किसी अनाथ और असहाय को अपनाना सबसे बड़ा पुण्य है। ब्राह्मणी की करुणा और व्रत की श्रद्धा ने तीनों का भाग्य बदल दिया।

वार के अनुसार प्रदोष और उनका फल

जिस वार को त्रयोदशी पड़ती है, प्रदोष व्रत उसी वार के नाम से जाना जाता है। परंपरा में हर वार के प्रदोष का अलग फल माना गया है:

  • रवि प्रदोष (रविवार): अच्छे स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए।
  • सोम प्रदोष (सोमवार): मनोकामना-पूर्ति और मन की शांति के लिए। सोमवार और प्रदोष, दोनों शिव जी के दिन हैं, इसलिए यह विशेष माना जाता है।
  • भौम प्रदोष (मंगलवार): रोगों और कर्ज़ से मुक्ति के लिए।
  • बुध प्रदोष (बुधवार): कामनाओं की पूर्ति और बुद्धि के लिए।
  • गुरु प्रदोष (गुरुवार): शत्रुओं पर विजय और पितरों के आशीर्वाद के लिए।
  • शुक्र प्रदोष (शुक्रवार): सौभाग्य और सुखी दांपत्य के लिए।
  • शनि प्रदोष (शनिवार): संतान-सुख की कामना के लिए।

ये फल परंपरा से चली आ रही मान्यताएँ हैं। किसी भी वार का प्रदोष हो, सच्चे मन से की गई शिव पूजा कभी व्यर्थ नहीं जाती।

उद्यापन

परंपरा में 11 या 26 प्रदोष व्रत पूरे होने पर उद्यापन किया जाता है। उद्यापन त्रयोदशी तिथि को ही करें।

  • उद्यापन से एक दिन पहले श्री गणेश का पूजन करें और रात को भजन-कीर्तन करें।
  • उद्यापन के दिन सुबह मंडप बनाकर शिव-पार्वती का विधिवत पूजन करें।
  • हवन करवाएँ। परंपरा में ‘ॐ उमा सहित शिवाय नमः’ मंत्र से 108 आहुतियाँ दी जाती हैं।
  • सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराएँ, वस्त्र और दक्षिणा दें।
  • उद्यापन की पूरी विधि पंडित जी के मार्गदर्शन में करें।

सावधानी

दिन भर निराहार रहकर संध्या तक पूजा करना कठिन हो सकता है। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग फलाहार और पर्याप्त पानी के साथ व्रत करें और डॉक्टर की सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। संध्या पूजा का भाव ही इस व्रत का प्राण है।

पूजा के अंत में आरती

श्री शिव जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।