- कब
- भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, प्रायः अगस्त-सितंबर में — गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले। हस्त नक्षत्र का योग शुभ माना जाता है। व्रत तृतीया के सूर्योदय से अगले दिन के सूर्योदय तक रहता है; मुख्य पूजा प्रदोष काल (शाम) में और रात भर जागरण।
- पूजनीय
- भगवान शिव और माता पार्वती
हरतालिका तीज का महत्व
हरतालिका तीज वह दिन है जब माता पार्वती ने वर्षों की तपस्या के बाद भगवान शिव को पति रूप में पाने का वरदान प्राप्त किया था। सुहागिनें अखंड सौभाग्य के लिए और कुँवारी कन्याएँ मनचाहे, गुणवान वर के लिए यह व्रत रखती हैं।
‘हरतालिका’ दो शब्दों से बना है — ‘हरत’ यानी हरण करना (ले जाना) और ‘आलिका’ यानी सखी। कथा के अनुसार पार्वती जी की सखियाँ उन्हें पिता के घर से चुपके से घने वन में ले गई थीं, जहाँ उन्होंने तप किया।
यह व्रत अपने कठोर नियमों के लिए जाना जाता है — कई स्त्रियाँ निर्जला रहकर रात भर जागरण करती हैं। पर इसका असली भाव है पार्वती जी जैसा अटूट संकल्प: जो सही लगे, उसके लिए धैर्य से डटे रहना।
इस मौसम में तीन ‘तीज’ आती हैं — श्रावण शुक्ल तृतीया की हरियाली तीज, भाद्रपद कृष्ण तृतीया की कजरी (बड़ी) तीज और भाद्रपद शुक्ल तृतीया की हरतालिका तीज। राजस्थान में श्रावण की तीज झूलों, लहरियों और गीतों के साथ बड़े उत्साह से मनाई जाती है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- तृतीया की सुबह स्नान करके निर्जला — या स्वास्थ्य के अनुसार — व्रत का संकल्प लें: ‘मैं उमा-महेश्वर की प्रसन्नता और अखंड सौभाग्य के लिए हरतालिका व्रत करूँगी।’
- दिन में पूजा की तैयारी करें। शाम को (प्रदोष काल में) फिर स्नान करके सोलह शृंगार करें।
- पूजा-स्थान को केले के पत्तों और फूलों से मंडप की तरह सजाएँ। चौकी पर बालू या मिट्टी से शिवलिंग, पार्वती जी और गणेश जी की प्रतिमा बनाएँ — कथा में पार्वती जी ने भी बालू का शिवलिंग बनाया था।
- पहले गणेश जी की पूजा करें। फिर शिव जी को जल, बेलपत्र, धतूरा, चंदन और वस्त्र, और पार्वती जी को सुहाग सामग्री अर्पित करें।
- दीपक जलाकर धूप दें और फल-मिठाई का भोग लगाएँ।
- सब स्त्रियाँ मिलकर हरतालिका तीज की कथा सुनें।
- शिव जी और पार्वती जी की आरती करें।
- रात भर जागरण करें — भजन, कीर्तन और शिव-पार्वती की कथाएँ। रात के हर प्रहर में एक बार पूजा करने की भी परंपरा है।
- अगली सुबह (चतुर्थी को) स्नान करके फिर पूजा करें और पार्वती जी को अर्पित सुहाग सामग्री किसी सुहागिन को दान दें।
- बालू या मिट्टी की प्रतिमाओं का आदर से जल में विसर्जन करें; घर में बाल्टी या गमले में विसर्जन करके वह मिट्टी पौधों में डाल सकते हैं।
- फिर जल पीकर व्रत का पारण करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- व्रत से पहले की रात हल्का सात्त्विक भोजन
- जो निर्जला व्रत न रख सकें: जल, फल और दूध
क्या न खाएँ
- व्रत के 24 घंटे अन्न-जल — निर्जला व्रत में (स्वास्थ्य के अनुसार छूट लें)
- मांस, मदिरा और प्याज़-लहसुन वाला तामसिक भोजन
अन्य नियम
- रात्रि-जागरण की परंपरा है; दिन में सोने से बचें
- मन में क्रोध, ईर्ष्या और कलह न रखें
- कहा जाता है कि एक बार यह व्रत आरंभ करें तो हर वर्ष करें — पर बीमारी या मजबूरी में छूट जाए तो इसे दोष न मानें; आंशिक व्रत रखें या परिवार की कोई सदस्य आपकी ओर से पूजा कर दे
मंत्र
ॐ उमामहेश्वराभ्यां नमः
अर्थ:माता उमा (पार्वती) और भगवान महेश्वर (शिव) — दोनों को नमस्कार है।
जप: पूजा और जागरण में 1 माला (108)।
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
अर्थ:हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री, आपकी जय हो! महादेव के मुख-रूपी चंद्रमा को चकोर की तरह निहारने वाली, आपकी जय हो! हे गणेश जी और कार्तिकेय जी की माता, जगत की जननी, बिजली जैसी कांति वाली, आपकी जय हो। (रामचरितमानस, बालकांड)
जप: पूजा में 3 या 11 बार।
हरतालिका तीज की कथा
मान्यता है कि यह कथा स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को उनके पिछले जीवन की याद दिलाते हुए सुनाई थी।
शिव जी बोले — ‘पार्वती, पिछले जन्म में तुम सती थीं। अपने पिता दक्ष के यज्ञ में मेरा अपमान सह न सकीं और तुमने योगाग्नि में देह त्याग दी। इस जन्म में तुमने पर्वतराज हिमालय और मैना की पुत्री बनकर जन्म लिया। बचपन से ही तुम्हारा मन मुझमें लगा था।’
‘तुमने मुझे पति रूप में पाने के लिए हिमालय की गुफाओं में कठोर तप शुरू किया। वर्षों तक तुमने कभी केवल सूखे पत्ते खाए, कभी केवल वायु पीकर तप किया। माघ की ठंड में जल में खड़ी रहीं, वैशाख की गर्मी में अग्नि के बीच बैठीं, सावन की बारिश में खुले आकाश के नीचे भीगती रहीं। तुम्हें इस हालत में देखकर तुम्हारे पिता बहुत दुखी रहते थे।’
‘एक दिन देवर्षि नारद तुम्हारे पिता के पास आए और बोले कि भगवान विष्णु आपकी पुत्री से विवाह करना चाहते हैं — मैं उन्हीं का संदेश लाया हूँ। हिमालय बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने हाँ कर दी।’
‘जब पिता ने तुम्हें यह बताया, तो तुम बहुत दुखी हुईं, क्योंकि मन से तुम मुझे पति मान चुकी थीं। तुमने अपनी सखी को अपना दुख बताया। सखी बोली — ‘घबराओ मत, मैं तुम्हें ऐसे घने वन में ले चलती हूँ जहाँ तुम्हारे पिता भी न ढूँढ सकें।’ और सखियाँ तुम्हें चुपके से ले जाकर घने जंगल की एक गुफा में छोड़ आईं। इसीलिए इस व्रत का नाम ‘हरतालिका’ पड़ा।’
‘इधर पुत्री को घर में न पाकर हिमालय बहुत चिंतित हुए — उन्होंने विष्णु जी को वचन दिया था, अब क्या उत्तर देंगे! उन्होंने चारों ओर खोज करवाई।’
‘उधर गुफा में तुमने भाद्रपद शुक्ल तृतीया के दिन, हस्त नक्षत्र में, नदी किनारे की बालू से शिवलिंग बनाया। तुमने निर्जला रहकर फूल-पत्तों से मेरी पूजा की और रात भर जागकर मेरा ध्यान किया। तुम्हारी इस कठोर तपस्या से मेरा आसन डोल उठा।’
‘मैं तुम्हारे सामने प्रकट हुआ और कहा — वर माँगो। तुमने कहा — ‘मैंने आपको ही पति रूप में वरण किया है; यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे अपनी अर्धांगिनी स्वीकार कीजिए।’ मैंने ‘तथास्तु’ कहा और कैलाश लौट गया।’
‘अगली सुबह तुमने पूजा की सामग्री नदी में प्रवाहित की और सखी के साथ व्रत का पारण किया। तभी तुम्हारे पिता तुम्हें खोजते हुए वहाँ पहुँचे। तुमने उन्हें सारी बात बताई और कहा कि मैं तभी घर चलूँगी जब आप मेरा विवाह शिव जी से करेंगे। पिता ने तुम्हारी बात मान ली, और समय आने पर विधि-विधान से हमारा विवाह हुआ।’
अंत में शिव जी ने कहा — ‘जो स्त्री इस दिन श्रद्धा से यह व्रत करती है, उसे मैं वैसा ही अखंड सौभाग्य देता हूँ जैसा तुम्हें दिया।’
कथा का संदेश: अपने सच्चे संकल्प पर अडिग रहना, और ऐसी सखी का होना जो कठिन समय में साथ दे। शिव-पार्वती विवाह की पूरी कथा ‘शिव-पार्वती कथा’ पृष्ठ पर पढ़ें।
उद्यापन
जो स्त्रियाँ वर्षों से यह व्रत करती आई हैं और अब स्वास्थ्य या आयु के कारण निर्जला व्रत न कर सकें, वे परंपरा अनुसार उद्यापन करके इस व्रत को विराम दे सकती हैं। उद्यापन में सुहागिनों को भोजन, सुहाग सामग्री और वस्त्र दान किए जाते हैं — विधि पंडित जी से पूछकर करें।
सावधानी
24 घंटे का निर्जला व्रत और रात्रि-जागरण बहुत कठिन है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बीमार, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, किडनी या नियमित दवा वाली स्त्रियाँ जल और फल लेकर व्रत रखें और डॉक्टर की सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। चक्कर, कमज़ोरी या घबराहट हो तो तुरंत जल पी लें — माता पार्वती अपनी बेटियों को कष्ट में नहीं देखना चाहतीं।
पूजा के अंत में आरती
श्री शिव जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।