- कब
- उत्तर भारत (राजस्थान, उत्तर प्रदेश, बिहार आदि) में ज्येष्ठ मास की अमावस्या को, प्रायः मई-जून में। महाराष्ट्र, गुजरात और दक्षिण के कुछ भागों में यही व्रत ज्येष्ठ पूर्णिमा को ‘वट पूर्णिमा’ के नाम से रखा जाता है। कई स्त्रियाँ त्रयोदशी से अमावस्या तक तीन दिन का व्रत भी रखती हैं।
- पूजनीय
- सावित्री-सत्यवान, वट (बरगद) वृक्ष में त्रिदेव, यमराज
अगली तिथियाँ
- 4जून वट सावित्री व्रतशुक्रवार · शनि जयंती भी
अगली तिथि के लिए पंडित जी से पूछें।
पूरा पंचांग देखेंवट सावित्री व्रत का महत्व
इस व्रत में सुहागिनें पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए वट (बरगद) वृक्ष की पूजा करती हैं और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनती हैं। यह वही सावित्री हैं जिन्होंने अपनी निष्ठा, धैर्य और बुद्धिमानी से यमराज से अपने पति के प्राण लौटा लिए थे — यह कथा महाभारत के वन पर्व में आती है।
बरगद ही क्यों? बरगद बहुत लंबी आयु वाला, फैलकर बढ़ने वाला और घनी छाया देने वाला वृक्ष है — इसलिए यह दीर्घायु और परिवार के विस्तार का प्रतीक है। मान्यता है कि वट वृक्ष की जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास है। कथा के अनुसार सावित्री ने इसी वृक्ष के नीचे पति के प्राण वापस पाए थे।
यह व्रत केवल ‘पति के लिए उपवास’ नहीं है — सावित्री की कथा स्त्री की बुद्धि, साहस और दृढ़ता का उत्सव है। उन्होंने रोकर नहीं, विवेक और विनम्र तर्क से यमराज का मन जीता।
पर्यावरण की दृष्टि से भी यह सुंदर परंपरा है — बरगद को पूजना यानी पेड़ों को बचाना। इस दिन एक बरगद या पीपल का पौधा लगाना भी पुण्य का काम है।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह स्नान करके सोलह शृंगार करें और व्रत का संकल्प लें।
- पूजा की थाली में जल, रोली, अक्षत, हल्दी, कच्चा सूत, भीगे चने, फल, मिठाई और पंखा रखें।
- वट वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में जल चढ़ाएँ। रोली-अक्षत, हल्दी, फूल और सिंदूर अर्पित करें।
- पेड़ के नीचे सावित्री-सत्यवान का स्मरण करें; मूर्ति या चित्र हो तो उसकी पूजा करें।
- कच्चे सूत को वट वृक्ष के तने पर लपेटते हुए परिक्रमा करें — 7, 11, 21 या 108 बार, जितना सामर्थ्य हो। हर परिक्रमा में पति और परिवार के मंगल की प्रार्थना करें।
- बाँस के पंखे से वृक्ष को हवा करें — मानो सावित्री अपने पति को पंखा झल रही हों।
- सब स्त्रियाँ मिलकर सावित्री-सत्यवान की कथा सुनें।
- भीगे चने, फल और मिठाई का भोग लगाएँ। चने का प्रसाद और बायना (सुहाग सामग्री) सास या बड़ी स्त्री को देकर आशीर्वाद लें।
- कई जगह भीगे चने के दाने जल के साथ निगलकर व्रत खोलने की परंपरा है; कई जगह शाम को फलाहार या सात्त्विक भोजन से पारण होता है — अपनी परंपरा मानें।
- सामर्थ्य हो तो इस दिन एक पेड़ लगाएँ और ज़रूरतमंदों को भोजन-वस्त्र दान करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- फल, विशेषकर आम
- भीगे चने (प्रसाद रूप में)
- दूध और दही
- पारण के बाद सात्त्विक भोजन
क्या न खाएँ
- व्रत के दौरान अन्न (परंपरा अनुसार)
- प्याज़, लहसुन और तामसिक भोजन
- मांस, मदिरा और नशा
अन्य नियम
- वट वृक्ष की टहनी या पत्ते बेवजह न तोड़ें
- जो स्त्रियाँ बरगद तक न जा सकें, वे घर पर गमले में बरगद की टहनी या चित्र की पूजा करें — भाव ही मुख्य है
- मन में ईर्ष्या, कलह और कटुता न रखें
मंत्र
ॐ सावित्र्यै नमः
अर्थ:देवी सावित्री को नमस्कार है।
जप: परिक्रमा करते समय मन में जपती रहें।
ॐ वटवृक्षाय नमः
अर्थ:वट वृक्ष (बरगद) को नमस्कार है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना जाता है।
जप: जल चढ़ाते समय 3 या 11 बार।
सावित्री और सत्यवान की कथा
मद्र देश के राजा अश्वपति धर्मात्मा थे, पर उनकी कोई संतान नहीं थी। उन्होंने अठारह वर्ष तक देवी सावित्री की उपासना की। प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी कन्या का वरदान दिया। देवी की कृपा से जन्मी इस कन्या का नाम भी सावित्री रखा गया।
सावित्री बड़ी होकर अत्यंत सुंदर और बुद्धिमान निकलीं। उनके तेज के कारण कोई राजकुमार उनसे विवाह का प्रस्ताव लेकर नहीं आया। तब राजा ने कहा — ‘बेटी, तुम स्वयं अपने योग्य वर ढूँढ लो।’ सावित्री वृद्ध मंत्रियों के साथ यात्रा पर निकलीं।
वन में उन्होंने सत्यवान को देखा। सत्यवान शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र थे। राजा की आँखों की रोशनी चली गई थी और शत्रुओं ने उनका राज्य छीन लिया था, इसलिए वे परिवार सहित वन में आश्रम बनाकर रहते थे। सत्यवान सत्यवादी, सरल और माता-पिता के सेवक थे। सावित्री ने मन ही मन उन्हें पति चुन लिया।
लौटकर सावित्री ने पिता को बताया, तब वहाँ देवर्षि नारद भी उपस्थित थे। नारद जी बोले — ‘सत्यवान में सब गुण हैं, पर एक बात है — आज से ठीक एक वर्ष बाद उनकी आयु पूरी हो जाएगी।’ पिता ने सावित्री को कोई और वर चुनने को कहा, पर सावित्री ने दृढ़ता से उत्तर दिया — ‘मैंने एक बार मन से जिसे चुन लिया, वही मेरे पति हैं। मैं अपना वचन नहीं बदलूँगी।’
विवाह हुआ और सावित्री राजसी सुख छोड़कर वन के आश्रम में पति और सास-ससुर की सेवा करने लगीं। वे मन ही मन दिन गिनती रहीं। जब वह दिन तीन दिन दूर रह गया, तो उन्होंने तीन दिन का कठोर व्रत रखा — इसी कारण कई स्त्रियाँ आज भी तीन दिन का वट सावित्री व्रत रखती हैं।
उस दिन सत्यवान लकड़ी काटने जंगल जाने लगे, तो सावित्री भी सास-ससुर की आज्ञा लेकर उनके साथ चल पड़ीं। लकड़ी काटते-काटते सत्यवान के सिर में तेज़ दर्द हुआ। वे एक वट वृक्ष के नीचे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी सावित्री ने देखा कि सामने लाल वस्त्र पहने, हाथ में पाश लिए एक तेजस्वी पुरुष खड़े हैं — वे स्वयं यमराज थे।
यमराज सत्यवान के प्राण लेकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगीं। यमराज ने कहा — ‘पुत्री, लौट जाओ। जहाँ तक कोई मनुष्य आ सकता है, तुम आ चुकी हो।’ सावित्री विनम्रता से बोलीं — ‘जहाँ मेरे पति जाएँगे, वहीं जाना मेरा धर्म है। और कहते हैं, सज्जनों के साथ सात कदम चलने से मित्रता हो जाती है — आप तो स्वयं धर्मराज हैं।’ फिर उन्होंने धर्म के बारे में ऐसी सुंदर बातें कहीं कि यमराज प्रसन्न हो गए।
यमराज बोले — ‘सत्यवान के प्राणों के अलावा कोई वर माँग लो।’ सावित्री ने पहला वर माँगा — ‘मेरे ससुर की आँखों की रोशनी लौट आए।’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कहा। सावित्री फिर भी पीछे चलती रहीं। दूसरे वर में उन्होंने ससुर का खोया राज्य माँगा, और तीसरे वर में अपने पिता के लिए सौ पुत्र। यमराज हर बार प्रसन्न होकर वर देते गए।
सावित्री फिर भी साथ चलती रहीं। यमराज ने एक और वर माँगने को कहा, तो सावित्री बोलीं — ‘मुझे सत्यवान से सौ पुत्र हों।’ यमराज ने ‘तथास्तु’ कह दिया। तब सावित्री ने हाथ जोड़कर कहा — ‘धर्मराज, आपने मुझे सत्यवान से सौ पुत्रों का वर दिया है; पति के बिना यह वर कैसे पूरा होगा?’ यमराज समझ गए कि सावित्री ने अपनी बुद्धि से उन्हें धर्मसंकट में डाल दिया है। उसकी निष्ठा, धैर्य और बुद्धिमानी से प्रसन्न होकर उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और लंबी आयु का आशीर्वाद दिया।
सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे लौटीं, जहाँ सत्यवान का शरीर था। सत्यवान ऐसे उठ बैठे मानो गहरी नींद से जागे हों। आश्रम लौटे तो ससुर की आँखें ठीक हो चुकी थीं, और कुछ ही समय में उनका राज्य भी लौट आया।
कथा का संदेश: सावित्री ने न डर दिखाया, न हार मानी — उन्होंने प्रेम के साथ विवेक और विनम्रता से सबसे कठिन परिस्थिति भी बदल दी। इसीलिए भारत में आज भी ‘सावित्री’ नाम निष्ठा और बुद्धि का पर्याय है।
उद्यापन
जो स्त्रियाँ कई वर्षों से यह व्रत रखती आई हैं, वे परंपरा अनुसार किसी वर्ष उद्यापन करती हैं — सुहागिनों को भोजन कराकर सुहाग सामग्री, वस्त्र और पंखे का दान करती हैं। विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग है; पंडित जी से पूछकर करें।
सावधानी
ज्येष्ठ की तेज़ गर्मी में व्रत — लू और पानी की कमी से बचें। बीमार, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा लेने वाली स्त्रियाँ जल और फल लेकर व्रत रखें, डॉक्टर की सलाह लें और दवा कभी न छोड़ें। तीन दिन का व्रत केवल वही रखें जिनका स्वास्थ्य अच्छा हो। धूप में बहुत देर परिक्रमा न करें; सुबह जल्दी पूजा कर लें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।