- कब
- चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी — होली के आठवें दिन (कई क्षेत्रों में सप्तमी को ‘शीतला सप्तमी’), प्रायः मार्च-अप्रैल में। राजस्थान में इसे ‘बासोड़ा’ कहते हैं। कुछ परंपराओं में वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ की कृष्ण अष्टमी को भी शीतला माता की पूजा होती है।
- पूजनीय
- शीतला माता
अगली तिथियाँ
- 30मार्च शीतला अष्टमी (बासोड़ा)मंगलवार · कहीं-कहीं शीतला सप्तमी 28 मार्च को
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पूरा पंचांग देखेंशीतला अष्टमी (बासोड़ा) का महत्व
शीतला माता को आरोग्य की देवी माना जाता है — विशेषकर बच्चों को बुखार, चेचक और त्वचा के रोगों से बचाने वाली। ‘शीतला’ का अर्थ है ठंडक देने वाली। इस दिन घर में चूल्हा नहीं जलाया जाता और माता को एक दिन पहले बना ठंडा (बासी) भोजन चढ़ाया जाता है — इसीलिए इसे ‘बासोड़ा’ कहते हैं।
स्कंद पुराण से जुड़े शीतलाष्टक में माता का सुंदर ध्यान है — वे गधे पर सवार हैं, उनके हाथों में झाड़ू और कलश हैं और मस्तक पर सूप सुशोभित है। यह रूप अपने-आप में एक संदेश है: झाड़ू और सूप सफ़ाई के, कलश का जल शुद्धता का प्रतीक है। लोक-परंपरा में माता के साथ नीम के पत्ते भी जुड़े हैं, जो रोगों से बचाव के प्रतीक हैं।
वन्देऽहं शीतलां देवीं रासभस्थां दिगम्बराम्। मार्जनीकलशोपेतां शूर्पालङ्कृतमस्तकाम्॥
शीतलाष्टक (स्कंद पुराण से जुड़ा स्तोत्र)
अर्थ:मैं शीतला देवी को प्रणाम करता हूँ, जो गधे पर विराजमान हैं, दिशाएँ ही जिनके वस्त्र हैं, जो हाथ में झाड़ू और कलश लिए हैं और जिनके मस्तक पर सूप सुशोभित है।
बासोड़ा ऋतु-परिवर्तन के समय आता है — सर्दी जा रही होती है और गर्मी आ रही होती है। माना जाता है कि इसके बाद से बासी भोजन बंद कर देना चाहिए, क्योंकि गर्मी में खाना जल्दी ख़राब होता है। यानी यह पर्व हमारे पूर्वजों का ‘मौसम के अनुसार खान-पान बदलने’ का एक सुंदर तरीका था।
राजस्थान में जयपुर के पास चाकसू का शीतला माता मंदिर प्रसिद्ध है, जहाँ इस अवसर पर बड़ा मेला लगता है।
पंडित जी से सुनिए
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सप्तमी (एक दिन पहले) को घर और रसोई की अच्छी तरह सफ़ाई करें और शाम तक अगले दिन का सारा भोजन बना लें। रात को रसोई साफ़ करके चूल्हा ठंडा कर दें।
- अष्टमी की सुबह स्नान करें — इस दिन ठंडे पानी से स्नान की परंपरा है।
- पूजा की थाली में एक दिन पहले बना भोजन, ठंडा जल, रोली, हल्दी, मेहंदी, मौली, अक्षत और आटे का दीपक रखें।
- सुबह-सुबह शीतला माता के मंदिर जाएँ, या घर पर माता का चित्र रखकर पूजा करें। माता को ठंडा जल चढ़ाएँ, रोली-हल्दी-मेहंदी से टीका करें और मौली व वस्त्र अर्पित करें।
- एक दिन पहले बने भोजन का भोग लगाएँ।
- शीतला माता की कथा सुनें और शीतलाष्टक या माता की स्तुति का पाठ करें।
- पूजा का थोड़ा-सा जल घर के कोनों में छिड़कें — यह स्वच्छता और आरोग्य की प्रार्थना का प्रतीक है।
- पूरा परिवार वही भोजन प्रसाद के रूप में ग्रहण करे। परंपरा अनुसार इस दिन घर में ताज़ा खाना नहीं पकाया जाता।
- किसी ज़रूरतमंद को भोजन और दक्षिणा दें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- एक दिन पहले बना भोजन — मीठे चावल, राबड़ी, पुए, पूड़ी, दही आदि (सुरक्षित रखा हुआ)
- ठंडा जल और छाछ
क्या न खाएँ
- इस दिन ताज़ा पका भोजन (परंपरा अनुसार चूल्हा नहीं जलता)
- गरम भोजन और गरम पेय
- मांस, मदिरा और नशा
अन्य नियम
- बासोड़ा से पहले घर और रसोई की गहरी सफ़ाई करें — यही माता की सच्ची पूजा है
- भोजन ढककर, साफ़ बर्तनों में और ठंडी जगह रखें
- माना जाता है कि बासोड़ा के बाद से गर्मियों में बासी भोजन बंद कर दिया जाए
मंत्र
ॐ शीतलायै नमः
अर्थ:शीतला माता को नमस्कार है।
जप: पूजा में 11 या 108 बार।
शीतला माता की कथा
बहुत पहले की बात है। एक गाँव में शीतला अष्टमी के दिन सब लोग माता की पूजा करने निकले। पर उस वर्ष गाँव वालों ने सोचा — माता को ताज़ा और गरम भोजन चढ़ाएँगे, बासी क्यों? सबने सुबह-सुबह गरम-गरम पकवान बनाए और माता को गरम भोग लगा दिया।
शीतला माता तो ठंडक की देवी हैं। गरम भोग से उनका मुख और शरीर झुलस गया और वे व्याकुल हो उठीं।
उसी गाँव में एक गरीब बुढ़िया रहती थी। उसने परंपरा के अनुसार एक दिन पहले ही भोजन बना लिया था और सुबह चूल्हा नहीं जलाया था। उसने माता को ठंडा भोजन — राबड़ी, दही और बासी पुए — और ठंडा जल चढ़ाया। उस ठंडे भोग से माता की जलन शांत हो गई, और वे उस बुढ़िया पर बहुत प्रसन्न हुईं।
उसी रात गाँव में भयंकर आग लगी। एक-एक करके बहुत से घर जल गए, पर बुढ़िया की झोंपड़ी को आग छू भी न सकी। सुबह गाँव वाले हैरान होकर बुढ़िया के पास पहुँचे और पूछा — ‘माँ, यह चमत्कार कैसे हुआ?’
बुढ़िया ने सारी बात बताई — ‘मैंने माता को परंपरा के अनुसार ठंडा भोग लगाया था और चूल्हा नहीं जलाया था। तुम सबने माता को गरम भोग लगाकर उनका कष्ट बढ़ा दिया।’ गाँव वालों को अपनी भूल समझ आई। सबने मिलकर माता से क्षमा माँगी और प्रण किया कि आगे से शीतला अष्टमी पर ठंडा भोग ही लगाएँगे और उस दिन चूल्हा नहीं जलाएँगे।
माता ने सबको क्षमा किया और आरोग्य का आशीर्वाद दिया। तभी से बासोड़ा पर एक दिन पहले बना ठंडा भोजन चढ़ाने और ग्रहण करने की परंपरा चली आ रही है।
कथा का संदेश: परंपराओं के पीछे अक्सर गहरी समझ छिपी होती है। और दूसरों की पीड़ा पर ध्यान देना — बुढ़िया की तरह — सबसे बड़ी पूजा है। यह कथा डराने के लिए नहीं, सीख देने के लिए है; माता अपने भक्तों की भूल क्षमा करती हैं।
सावधानी
बासी भोजन तभी सुरक्षित है जब वह साफ़-सुथरे ढंग से बना और रखा गया हो — भोजन ढककर, साफ़ बर्तनों में, ठंडी जगह रखें। दही, दूध और राबड़ी जैसी चीज़ें गर्म मौसम में जल्दी ख़राब होती हैं; गंध या स्वाद बदला लगे तो न खाएँ। छोटे बच्चे, गर्भवती माताएँ, बुज़ुर्ग और बीमार थोड़ा-सा प्रसाद लेकर बाकी भोजन ताज़ा और सुरक्षित खाएँ, और नियमित दवा कभी न छोड़ें। शीतला माता की पूजा के साथ बच्चों का टीकाकरण और बुखार-बीमारी में डॉक्टर की सलाह भी कभी न छोड़ें — माता आरोग्य की देवी हैं, और अच्छा इलाज भी उन्हीं की कृपा है।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।