- कब
- हर रविवार। किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष के पहले रविवार से आरंभ करना शुभ माना जाता है। संकल्प के अनुसार 12, 30 या 52 रविवार तक व्रत रखा जाता है।
- पूजनीय
- भगवान सूर्य (सूर्य नारायण)
- संबंधित ग्रह
- सूर्य ग्रह
रविवार व्रत का महत्व
सूर्य ऐसे देवता हैं जिन्हें हम रोज़ अपनी आँखों से देखते हैं, इसलिए उन्हें ‘प्रत्यक्ष देवता’ कहा जाता है। धरती पर जीवन, अन्न, प्रकाश और ऊर्जा, सब सूर्य की कृपा से है। रविवार उनका दिन है।
शास्त्रों का वचन है, “आरोग्यं भास्करादिच्छेत्”, यानी अच्छा स्वास्थ्य सूर्य देव से माँगें। इसीलिए रविवार का व्रत आरोग्य, आँखों की ज्योति, शरीर की शक्ति और रोगों से रक्षा के लिए किया जाता है।
ज्योतिष में सूर्य आत्मा, आत्मविश्वास, पिता, मान-सम्मान, नेतृत्व और सरकारी कामकाज के कारक माने जाते हैं। जिनके मन में आत्मविश्वास की कमी हो, नौकरी या सरकारी कामों में बार-बार अड़चन आती हो, या पिता से संबंध में खटास हो, वे श्रद्धा से यह व्रत करते हैं।
इस व्रत का सबसे सुंदर अंग है सुबह का अर्घ्य। उगते सूरज को जल चढ़ाना केवल पूजा नहीं, एक अनुशासन भी है: जल्दी उठना, पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुछ पल शांत खड़े होना और दिन की शुरुआत कृतज्ञता से करना।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सूर्योदय से पहले उठें, स्नान करें और हो सके तो लाल या केसरिया रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें।
- तांबे के लोटे में जल भरें। उसमें थोड़ी रोली या लाल चंदन, कुछ अक्षत, एक लाल फूल और ज़रा-सा गुड़ डालें।
- सूर्योदय के समय पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े हों। लोटे को दोनों हाथों से छाती की ऊँचाई तक उठाएँ और धीरे-धीरे जल की धारा गिराते हुए सूर्य देव को अर्घ्य दें। जल की धारा के बीच से सूर्य के दर्शन करें।
- अर्घ्य देते समय “ॐ घृणि सूर्याय नमः” या अर्घ्य मंत्र बोलें। फिर अपनी जगह पर ही तीन बार घूमकर परिक्रमा करें।
- हाथ में जल-अक्षत लेकर रविवार व्रत का संकल्प लें। कितने रविवार व्रत करेंगे, यह भी मन में तय कर लें।
- घर के पूजा-स्थान पर घी का दीपक और धूप जलाएँ। सूर्य देव को लाल फूल, लाल चंदन और गुड़ अर्पित करें।
- रविवार व्रत की कथा पढ़ें या परिवार के साथ बैठकर सुनें।
- दीपक या कपूर से सूर्य देव की आरती करें और प्रसाद बाँटें।
- दिन में ‘ॐ घृणि सूर्याय नमः’ की कम से कम एक माला (108 बार) जप करें।
- सूर्यास्त से पहले एक ही बार भोजन करें: गेहूँ की रोटी या दलिया, गुड़, घी, दूध। परंपरा में इस व्रत में नमक और तेल नहीं खाया जाता।
- हो सके तो किसी ज़रूरतमंद को गेहूँ, गुड़ या लाल वस्त्र दान करें।
- परंपरा है कि भोजन सूर्यास्त से पहले ही कर लिया जाए। देर हो जाए तो उस दिन फल-दूध लेकर अगले दिन सामान्य भोजन करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- गेहूँ की रोटी, दलिया या आटे का हलवा
- गुड़, घी, दूध, दही
- मौसमी फल
- भोजन एक ही बार, सूर्यास्त से पहले
क्या न खाएँ
- नमक (परंपरा के अनुसार)
- तेल में तली हुई चीज़ें
- प्याज़, लहसुन
- मांस, मदिरा और हर तरह का नशा
अन्य नियम
- सूर्योदय के बाद देर तक न सोएँ।
- पिता और घर के बड़ों का आदर करें, उनका आशीर्वाद लें।
- अहंकार और क्रोध से बचें। सूर्य का तेज विनम्रता में ही शोभा देता है।
- लाल या केसरिया वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है।
मंत्र
एहि सूर्य सहस्रांशो तेजोराशे जगत्पते। अनुकम्पय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥
अर्थ:हे हज़ार किरणों वाले, तेज के भंडार, जगत के स्वामी सूर्य देव! पधारिए, मुझ पर कृपा कीजिए और भक्ति से दिया यह अर्घ्य स्वीकार कीजिए।
जप: अर्घ्य देते समय 1 या 3 बार
ॐ घृणि सूर्याय नमः
अर्थ:हे प्रकाशमान सूर्य देव, आपको नमस्कार।
जप: रोज़ 1 माला (108 बार); अर्घ्य के समय 11 बार भी बोल सकते हैं
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रौं सः सूर्याय नमः
अर्थ:बीजाक्षरों सहित सूर्य देव को नमस्कार। यह सूर्य ग्रह की शांति का मंत्र है।
जप: रोज़ 1 माला; पूरा अनुष्ठान 7000 जप, पंडित जी के मार्गदर्शन में
रविवार व्रत कथा: बुढ़िया और सोने का गोबर देने वाली गाय
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक बुढ़िया रहती थी। वह बहुत सरल और भक्त थी। हर रविवार वह सुबह जल्दी उठती, स्नान करती, पड़ोसन की गाय के गोबर से अपना आँगन लीपती, फिर भोजन बनाकर सूर्य देव को भोग लगाती और उसके बाद ही स्वयं भोजन करती। सूर्य देव की कृपा से उसके घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। घर में सुख भी था और शांति भी।
बुढ़िया का यह सुख उसकी पड़ोसन से देखा नहीं जाता था। वह सोचने लगी, “यह मेरी ही गाय के गोबर से आँगन लीपती है और इतनी सुखी है!” ईर्ष्या में उसने अगले रविवार अपनी गाय को घर के भीतर बाँध दिया, ताकि बुढ़िया को गोबर न मिले।
उस रविवार बुढ़िया को गोबर नहीं मिला। वह आँगन नहीं लीप सकी और उसका मन बहुत दुखी हुआ। उसने सोचा, “जब आँगन ही शुद्ध नहीं हुआ, तो भोग कैसे लगाऊँ?” उस दिन उसने न भोजन बनाया, न भोग लगाया, और भूखी-प्यासी ही सो गई।
रात को सूर्य देव ने उसे स्वप्न में दर्शन दिए और पूछा, “माता, आज तुमने भोजन क्यों नहीं बनाया?” बुढ़िया ने सारी बात बता दी। सूर्य देव मुस्कुराए और बोले, “तुम्हारी सच्ची श्रद्धा से मैं प्रसन्न हूँ। मैं तुम्हें ऐसी गाय देता हूँ जो तुम्हारे सारे दुख दूर कर देगी। पर याद रखना, रविवार को भूखी मत रहना। नियम से मेरा व्रत करना और भोजन करना।”
सुबह जब बुढ़िया उठी, तो उसने देखा कि आँगन में एक सुंदर गाय अपने बछड़े के साथ बँधी है। बुढ़िया ने प्रेम से उसकी सेवा की। अगले दिन उस गाय ने गोबर किया और वह सोने का था! बुढ़िया चकित रह गई।
पड़ोसन ने भी यह देख लिया। अब वह रोज़ सुबह बुढ़िया के उठने से पहले चुपके से सोने का गोबर उठा ले जाती और उसकी जगह अपनी गाय का गोबर रख जाती। भोली बुढ़िया को कुछ पता नहीं चला। तब सूर्य देव ने लीला की। एक शाम ज़ोर की आँधी चली और बुढ़िया ने गाय को घर के भीतर बाँध लिया। अगली सुबह उसने भीतर सोने का गोबर देखा, तो सारी बात समझ गई। अब वह गाय को रोज़ भीतर ही बाँधने लगी।
पड़ोसन की ईर्ष्या और बढ़ गई। वह राजा के दरबार में गई और बोली, “महाराज, मेरी पड़ोस की बुढ़िया के पास ऐसी गाय है जो सोने का गोबर देती है। ऐसी गाय तो राजमहल में होनी चाहिए।” लालच में आकर राजा ने सिपाही भेजे और गाय मँगवा ली।
बुढ़िया बहुत रोई। वह दिन भी रविवार था। उसने अन्न ग्रहण नहीं किया और सारा दिन सूर्य देव से प्रार्थना करती रही। उधर राजमहल में गाय ने गोबर किया, पर सोने का नहीं। साधारण गोबर से सारा महल भर गया और राजा परेशान हो उठा।
उसी रात सूर्य देव ने राजा को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “राजन, यह गाय मैंने उस बुढ़िया को उसकी भक्ति के फल के रूप में दी थी। इसे उसे लौटा दो, इसी में तुम्हारा भला है।” राजा की आँखें खुल गईं। सुबह होते ही उसने बुढ़िया को सम्मान के साथ बुलाया, गाय लौटाई, बहुत-सा धन देकर उससे क्षमा माँगी और ईर्ष्यालु पड़ोसन को उसकी करनी के लिए फटकार लगाई।
इसके बाद राजा ने पूरे राज्य में घोषणा करवाई कि सब लोग रविवार का व्रत करें। कथा आती है कि उस दिन से उस राज्य के लोग स्वस्थ, सुखी और समृद्ध रहने लगे। जैसे सूर्य देव ने बुढ़िया की श्रद्धा का मान रखा, वैसे ही वे सब भक्तों पर कृपा करें।
कथा का सार: सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती, और ईर्ष्या या लालच से किसी का सुख छीना नहीं जा सकता।
सूर्य को अर्घ्य देने का सही तरीका
- समय: सूर्योदय के बाद का पहला घंटा सबसे उत्तम माना जाता है, जब सूर्य की किरणें कोमल हों।
- पात्र: तांबे का लोटा सबसे अच्छा माना गया है। पीतल या स्टील का लोटा भी चल सकता है।
- दिशा: पूर्व की ओर मुख करके खड़े हों। जल ऐसी जगह गिराएँ जहाँ पैरों पर छींटे न पड़ें। किसी गमले, क्यारी या पौधे में गिराना सबसे अच्छा है।
- धारा: लोटे को छाती की ऊँचाई तक उठाकर पतली धारा में जल गिराएँ और धारा के बीच से सूर्य को देखें।
- सावधानी: तेज़ धूप में सूर्य को सीधे घूरें नहीं, आँखों को नुकसान हो सकता है। केवल जल की धारा से होकर कोमल दर्शन करें।
- भाव: अर्घ्य के बाद आँखें बंद करके कुछ पल कृतज्ञता से खड़े रहें। नए दिन, स्वास्थ्य और जीवन के लिए धन्यवाद दें।
उद्यापन
जितने रविवार का संकल्प लिया हो, वे पूरे होने पर अगले रविवार को उद्यापन करें। उस दिन सूर्य देव की विशेष पूजा करें और सूर्य मंत्र से हवन करवाएँ।
- सामर्थ्य के अनुसार ब्राह्मण या ज़रूरतमंद परिवारों को भोजन कराएँ।
- लाल वस्त्र, गेहूँ, गुड़, तांबे का पात्र और दक्षिणा दान करें।
- उद्यापन की विधि और हवन के लिए पंडित जी से सलाह ले सकते हैं।
सावधानी
इस व्रत में परंपरा से नमक नहीं खाया जाता। जिनका ब्लड प्रेशर कम रहता हो, जिन्हें चक्कर आते हों, या जो डायबिटीज़ या किसी नियमित दवा पर हों, वे डॉक्टर की सलाह से सेंधा नमक या फलाहार के साथ व्रत करें। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ और बुज़ुर्ग केवल अर्घ्य और पूजा से भी व्रत कर सकते हैं। दवा कभी न छोड़ें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।