॥ वार्षिक व्रत-पर्व ॥ अहोई माता (माता पार्वती का एक रूप) और स्याहु माता

अहोई अष्टमी

संतान की लंबी आयु और मंगल के लिए माताओं का व्रत — अहोई माता का पूजन, स्याहु माला और शाम को तारों को अर्घ्य।

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कब
कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (पूर्णिमांत; अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण अष्टमी — दिन वही), प्रायः करवा चौथ के चार दिन बाद और दीपावली से लगभग आठ दिन पहले। व्रत सूर्योदय से शाम को तारे निकलने (कई परिवारों में चंद्रोदय) तक रहता है।
पूजनीय
अहोई माता (माता पार्वती का एक रूप) और स्याहु माता

अगली तिथियाँ

  1. 22अक्टूबर अहोई अष्टमीशुक्रवार
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अहोई अष्टमी का महत्व

अहोई अष्टमी माताओं का व्रत है, जो संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए रखा जाता है। इस दिन अहोई माता की पूजा होती है, जिन्हें माता पार्वती का ही एक रूप माना जाता है। दीवार पर गेरू से अहोई माता, स्याहु (साही) और उसके बच्चों का चित्र बनाया जाता है, या बाज़ार में मिलने वाला चित्र लगाया जाता है।

शाम को तारे निकलने पर उन्हें अर्घ्य देकर व्रत खोला जाता है। मान्यता है कि जैसे आकाश में अनगिनत तारे सदा चमकते रहते हैं, वैसे ही संतान का जीवन भी उज्ज्वल और लंबा हो।

यह व्रत केवल बेटे के लिए नहीं है — बेटा हो या बेटी, हर संतान के मंगल के लिए माँ यह व्रत रखती है। संतान की कामना करने वाली स्त्रियाँ भी यह व्रत श्रद्धा से रखती हैं।

अहोई की कथा एक और गहरी बात सिखाती है — हर जीव की संतान उतनी ही प्यारी होती है जितनी हमारी। अनजाने में हुई भूल का भी सच्चे पश्चाताप और सेवा से प्रायश्चित होता है।

पूजा सामग्री

  • अहोई माता का चित्र — दीवार पर गेरू से बनाया हुआ या कागज़ का
  • स्याहु माला (चाँदी के मोती या दाने पिरोई माला — परंपरा अनुसार)
  • जल से भरा करवा या लोटा
  • रोली, अक्षत, मौली, दूध और चावल
  • दीपक और धूप
  • भोग: पुए, हलवा, पूड़ी, मीठी मठरी
  • सिंघाड़े और मौसमी फल (कई जगह)
  • बायना: मिठाई, मठरी और कुछ दक्षिणा (सास को देने के लिए)

व्रत और पूजा की विधि

  1. सुबह स्नान करके संतान के मंगल के लिए व्रत का संकल्प लें।
  2. दीवार पर गेरू से अहोई माता का चित्र बनाएँ — साथ में स्याहु (साही) और उसके बच्चे। या बाज़ार का चित्र लगाएँ।
  3. दिन भर निर्जला या — स्वास्थ्य के अनुसार — फलाहार व्रत रखें।
  4. शाम को सूर्यास्त के बाद पूजा करें: चित्र के पास जल से भरा करवा रखें, रोली-अक्षत और दूध-चावल चढ़ाएँ, दीपक जलाएँ।
  5. हाथ में गेहूँ के सात दाने लेकर अहोई माता की कथा सुनें।
  6. स्याहु माला की पूजा करके उसे गले में पहनें। परंपरा अनुसार इसमें संतान के जन्म या विवाह पर नया मोती जोड़ा जाता है।
  7. पुए, हलवा और पूड़ी का भोग लगाएँ, बायना निकालकर सास या घर की बड़ी स्त्री को दें और पैर छूकर आशीर्वाद लें।
  8. आकाश में तारे दिखने पर करवे के जल से तारों को अर्घ्य दें और संतान के मंगल की प्रार्थना करें। कई परिवारों में चंद्रोदय पर चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है — अपनी परंपरा मानें।
  9. फिर बच्चों को आशीर्वाद देकर, जल पीकर व्रत खोलें।
  10. करवे का जल दीपावली के दिन घर में छिड़कने या बच्चों के स्नान के जल में मिलाने की सुंदर परंपरा भी कई घरों में है।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • जो फलाहार रखें: फल और दूध
  • व्रत खोलने के बाद भोग का प्रसाद और सात्त्विक भोजन

क्या न खाएँ

  • दिन में अन्न (परंपरा अनुसार)
  • मांस, मदिरा और तामसिक भोजन

अन्य नियम

  • कथा की स्मृति में इस दिन मिट्टी खोदने का काम (खुरपी-कुदाल) न करने की परंपरा है — इसका भाव है कि अनजाने में भी किसी जीव को कष्ट न पहुँचे
  • बच्चों को डाँटने-मारने से बचें; घर में प्रेम का वातावरण रखें
  • सामर्थ्य हो तो किसी ज़रूरतमंद बच्चे को भोजन या कपड़े दें

मंत्र

माता पार्वती का नाम मंत्र

ॐ पार्वत्यै नमः

अर्थ:माता पार्वती को — जो अहोई माता के रूप में पूजी जाती हैं — नमस्कार है।

जप: पूजा में 11 या 108 बार।

देवी प्रार्थना

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ:हे सब मंगलों का भी मंगल करने वाली, कल्याणमयी, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी — आपको नमस्कार है। (दुर्गा सप्तशती)

जप: पूजा के अंत में 3 बार।

माला / बोलकर जाप पंडित जी से जाप करवाएँ
व्रत-कथा

अहोई माता की कथा

बहुत समय पहले एक गाँव में एक साहूकार रहता था। उसका भरा-पूरा परिवार था। दीपावली से कुछ दिन पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए साहूकार की पत्नी जंगल में मिट्टी लेने गई।

वह खुरपी से मिट्टी खोद रही थी कि अनजाने में खुरपी वहाँ बनी एक माँद में जा लगी। उस माँद में स्याहु (साही) के छोटे-छोटे बच्चे थे। खुरपी लगने से एक बच्चे की मृत्यु हो गई। यह देखकर साहूकारनी का मन बहुत दुखी हुआ और वह पछताती हुई, भारी मन से घर लौटी।

कथा आती है कि इसके बाद उसके परिवार पर एक के बाद एक दुख आते गए और उसे अपनी संतान का वियोग सहना पड़ा। वह दिन-रात दुखी रहने लगी।

एक दिन उसने गाँव की बड़ी-बूढ़ी स्त्रियों को अपनी व्यथा सुनाई और बताया कि मिट्टी खोदते समय उससे अनजाने में स्याहु के बच्चे की मृत्यु हो गई थी। बड़ी स्त्रियों ने कहा — ‘तुमने अपनी भूल सच्चे मन से मान ली है, इससे तुम्हारा आधा दोष तो वैसे ही धुल गया। अब तुम कार्तिक कृष्ण अष्टमी को अहोई माता का व्रत करो — दीवार पर स्याहु और उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजा करो और सच्चे मन से क्षमा माँगो।’

साहूकारनी ने वैसा ही किया। उसने पूरी श्रद्धा से व्रत रखा, स्याहु माता से क्षमा माँगी और जीवों की सेवा करने लगी। हर वर्ष वह यह व्रत करती रही।

उसके पश्चाताप, सेवा और सच्ची श्रद्धा से अहोई माता प्रसन्न हुईं। माता की कृपा से उसकी गोद फिर भर गई और उसकी संतानें सुखी, स्वस्थ और दीर्घायु हुईं। कथा के कुछ रूपों में बताया जाता है कि माता की कृपा से उसकी संतानों को फिर से जीवन मिला।

एक दूसरी प्रचलित कथा में साहूकार की बेटी, सुरही गाय की सेवा और स्याहु माता के आशीर्वाद का प्रसंग आता है — उसमें भी सेवा, विनम्रता और क्षमा से ही संकट दूर होता है।

तभी से माताएँ अपनी संतान के मंगल के लिए अहोई अष्टमी का व्रत रखती हैं और दीवार पर स्याहु और उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजती हैं — यह याद रखने के लिए कि हर माँ का दुख एक जैसा होता है, चाहे वह किसी भी जीव की माँ हो।

कथा का संदेश: भूल किसी से भी हो सकती है। उसे सच्चे मन से स्वीकार करना, पश्चाताप करना और सेवा से उसका प्रायश्चित करना — यही धर्म है। यह कथा डराने के लिए नहीं, करुणा सिखाने के लिए है।

उद्यापन

संतान के जन्म या विवाह वाले वर्ष में अहोई अष्टमी का उद्यापन करने की परंपरा है। इसमें भोग और उपहार सास या घर की बड़ी स्त्रियों को देकर आशीर्वाद लिया जाता है और स्याहु माला में नया मोती जोड़ा जाता है। विधि हर परिवार में अलग है — घर की बड़ी स्त्रियों या पंडित जी से पूछ लें।

सावधानी

दिन भर का व्रत है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ (जो अक्सर यही व्रत रखना चाहती हैं), बीमार, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाली स्त्रियाँ जल और फल लेकर व्रत रखें और डॉक्टर से सलाह लें। दवा कभी न छोड़ें। आपका स्वस्थ रहना ही बच्चों के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है।

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।