कथा से पहले
होली से एक रात पहले होलिका-दहन होता है। उस आग के पीछे एक छोटे-से बालक की बड़ी भक्ति की कथा है — भक्त प्रह्लाद की। यह कथा बताती है कि सच्चे भरोसे के आगे सबसे बड़ा अहंकार भी नहीं टिकता।
हिरण्यकशिपु का अहंकार
दैत्यराज हिरण्यकशिपु का भाई हिरण्याक्ष भगवान विष्णु के वराह अवतार के हाथों मारा गया था। तभी से हिरण्यकशिपु विष्णु को अपना शत्रु मानने लगा। अमर होने की इच्छा से उसने वर्षों तक कठोर तप किया।
ब्रह्मा जी प्रसन्न हुए तो उसने चतुराई से वरदान माँगा — “मुझे न कोई मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में; न घर के भीतर, न बाहर; न धरती पर, न आकाश में; और न किसी अस्त्र से, न शस्त्र से।” वरदान मिलते ही वह स्वयं को अमर समझने लगा। उसने तीनों लोक जीत लिए और घोषणा कर दी — “अब मैं ही भगवान हूँ। मेरे राज्य में विष्णु का नाम कोई नहीं लेगा।”
बालक प्रह्लाद की भक्ति
उसी हिरण्यकशिपु के घर प्रह्लाद का जन्म हुआ। कहते हैं, जब हिरण्यकशिपु तप करने गया था, तब देवर्षि नारद ने उसकी गर्भवती पत्नी कयाधु को अपने आश्रम में शरण दी थी और वहीं भगवान की कथाएँ सुनाई थीं। गर्भ में ही प्रह्लाद ने वह भक्ति सुन ली थी।
गुरुकुल में गुरु उसे राजनीति और दैत्य-नीति पढ़ाते, पर प्रह्लाद अपने साथी बच्चों को भगवान का नाम सिखाता। एक दिन पिता ने प्यार से गोद में बिठाकर पूछा — “बेटा, अब तक जो पढ़ा, उसमें सबसे अच्छी बात क्या लगी?” प्रह्लाद ने बड़े भोलेपन से भक्ति के नौ रूप गिना दिए —
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥
श्रीमद्भागवत 7.5.23
अर्थ:भगवान की कथा सुनना, उनके गुण गाना, उनका स्मरण करना, चरणों की सेवा, पूजा, वंदना, दास-भाव, मित्र-भाव और स्वयं को पूरी तरह उन्हें सौंप देना — ये भक्ति के नौ रूप (नवधा भक्ति) हैं।
यह सुनकर हिरण्यकशिपु आग-बबूला हो गया। उसने गुरुओं को डाँटा और प्रह्लाद को ‘सुधारने’ का आदेश दिया। पर प्रह्लाद ने विनम्रता से इतना ही कहा — “पिताजी, भगवान तो सबके भीतर हैं — आपके भीतर भी।”
यातनाएँ और होलिका-दहन
जब समझाने से बात न बनी, तो हिरण्यकशिपु ने अपने ही बेटे को मरवाने के उपाय शुरू कर दिए — ऊँचे पहाड़ से गिरवाया, मतवाले हाथियों के आगे डलवाया, विषैले सर्प छुड़वाए, भोजन में विष दिलवाया। पर हर बार प्रह्लाद ‘नारायण-नारायण’ कहता रहा, और हर बार भगवान ने उसकी रक्षा की।
अंत में हिरण्यकशिपु की बहन होलिका आगे आई। उसे वरदान था — कई कथाओं में आता है कि उसे एक ऐसी चादर मिली थी — कि आग उसे नहीं जला सकती। फाल्गुन पूर्णिमा की रात बड़ी चिता सजाई गई। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई। पर भगवान की लीला देखिए — होलिका जल गई और प्रह्लाद ‘हरि’ का नाम लेता हुआ सकुशल बाहर आ गया। कहते हैं, वह चादर उड़कर प्रह्लाद पर आ गई थी।
इसीलिए हर साल फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका-दहन होता है — अहंकार, द्वेष और बुराई को जलाने का प्रतीक। अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है — भक्ति की जीत की ख़ुशी में, सब भेद भुलाकर गले मिलने के लिए।
नृसिंह भगवान का प्रकट होना
क्रोध से काँपता हिरण्यकशिपु तलवार लेकर प्रह्लाद के सामने खड़ा हुआ — “कहाँ है तेरा भगवान? क्या इस खंभे में भी है?” प्रह्लाद ने शांत स्वर में कहा — “हाँ पिताजी, वे सब जगह हैं — इस खंभे में भी।” हिरण्यकशिपु ने ज़ोर से खंभे पर प्रहार किया।
खंभा फटा, और भीषण गर्जना के साथ भगवान नृसिंह प्रकट हुए — आधा शरीर मनुष्य का, आधा सिंह का; यानी न मनुष्य, न पशु। समय था संध्या का — न दिन, न रात। उन्होंने हिरण्यकशिपु को महल की देहरी पर — न भीतर, न बाहर — अपनी जाँघों पर रखा — न धरती, न आकाश — और अपने नखों से — न अस्त्र, न शस्त्र — उसका अंत कर दिया। ब्रह्मा जी का वरदान भी सत्य रहा, और अधर्म का अंत भी हुआ।
नृसिंह भगवान का क्रोध देखकर देवता भी पास जाने से डर रहे थे। तब छोटा-सा प्रह्लाद निडर होकर आगे आया और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगा। भगवान का क्रोध शांत हो गया। उन्होंने प्रह्लाद को प्रेम से गोद में उठा लिया और वर माँगने को कहा। प्रह्लाद ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा — माँगा तो बस अपने पिता के उद्धार का वर। भगवान ने प्रसन्न होकर वह भी दिया। आगे चलकर प्रह्लाद धर्मात्मा राजा बने। वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को नृसिंह जयंती इसी दिन की याद में मनाई जाती है।
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्। नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युमृत्युं नमाम्यहम्॥
श्री नृसिंह मंत्र (प्रचलित)
अर्थ:जो उग्र हैं, वीर हैं, महाविष्णु हैं, तेज से प्रज्वलित हैं, जिनका मुख सब ओर है, जो भयंकर होकर भी कल्याणकारी हैं और मृत्यु की भी मृत्यु हैं — उन नृसिंह भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।
यह कथा क्या सिखाती है
सच्चा भरोसा डिगता नहीं। एक छोटा-सा बालक, सबसे शक्तिशाली राजा के सामने भी शांत और निडर रहा — क्योंकि उसका भरोसा पक्का था।
अहंकार का अंत तय है। वरदान की सारी चतुराई भी हिरण्यकशिपु को बचा न सकी। भगवान रास्ता निकाल ही लेते हैं।
घृणा नहीं, करुणा। जिस पिता ने इतने कष्ट दिए, प्रह्लाद ने उसी के उद्धार का वर माँगा। होली पर रंगों के साथ मन का मैल भी धोइए।
कथा के बाद आरती
श्री जगदीश जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
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