- कब करवाते हैं
- पंचांग के अनुसार विवाह के शुभ मुहूर्त में। परंपरा में खरमास और चातुर्मास में विवाह सामान्यतः नहीं होते; देवउठनी एकादशी के बाद से विवाह का समय शुरू माना जाता है।
- अनुमानित समय
- मुख्य वैवाहिक विधि (फेरों सहित) लगभग 2 से 4 घंटे; पूरे विवाह की रस्में कुछ दिनों में
- कहाँ
- आपके यहाँ या सालासर में; परिवार की उपस्थिति ज़रूरी
- दक्षिणा
- इच्छा अनुसार
विवाह संस्कार क्यों करवाते हैं
विवाह केवल दो लोगों का नहीं, दो परिवारों का मिलन है। शास्त्रों में इसे गृहस्थ आश्रम का द्वार कहा गया है, जहाँ पति-पत्नी धर्म, कर्तव्य और प्रेम में एक-दूसरे के साथी बनते हैं। अग्नि को साक्षी मानकर लिए गए वचन इस रिश्ते को पवित्र बनाते हैं।
वैदिक विवाह की मुख्य विधियाँ हैं: कन्यादान, पाणिग्रहण, अग्नि के फेरे और सप्तपदी। मान्यता है कि सप्तपदी के सात क़दम साथ चलने के बाद वर-वधू जीवनसाथी बन जाते हैं। बाक़ी रस्में, जैसे हल्दी, मेहंदी और भात, परिवार और समाज की सुंदर लोक-रीतियाँ हैं, जो हर क्षेत्र में थोड़ी अलग होती हैं।
मङ्गलं भगवान् विष्णुः मङ्गलं गरुडध्वजः। मङ्गलं पुण्डरीकाक्षः मङ्गलायतनो हरिः॥
परंपरागत मंगल श्लोक
अर्थ:भगवान विष्णु मंगलमय हैं, गरुड़ ध्वज वाले प्रभु मंगलमय हैं, कमल-नयन भगवान मंगलमय हैं; श्रीहरि मंगल के धाम हैं। वे इस नए जीवन को मंगलमय करें।
कब ज़रूरत नहीं
विवाह के लिए केवल गुण-मिलान के अंकों से रिश्ता न तोलें, और मांगलिक जैसे शब्दों से डरकर अच्छे रिश्ते न छोड़ें। दिखावे और कर्ज़ लेकर बड़े आयोजन की ज़रूरत नहीं; विधि-विधान से सादा विवाह भी पूरा संस्कार है। दहेज के लेन-देन से दूर रहें; यह क़ानूनन भी अपराध है।
पूजा में क्या-क्या होता है
- कुंडली मिलान और पंचांग से विवाह का मुहूर्त निकाला जाता है।
- लग्न-पत्रिका लिखी जाती है और गणेश पूजन से विवाह के कार्य शुरू होते हैं।
- मंडप स्थापना, हल्दी और मातृका पूजन, परिवार की रीति के अनुसार।
- बारात का स्वागत, तोरण और द्वार-पूजा, फिर वरमाला।
- मंडप में गणेश-गौरी पूजन, कलश, नवग्रह पूजन और संकल्प।
- कन्यादान: कन्या के माता-पिता श्रद्धा से कन्या का हाथ वर को सौंपते हैं।
- पाणिग्रहण: वर वधू का हाथ थामकर जीवन भर साथ निभाने की प्रतिज्ञा करता है।
- लाजा होम (धान की खील की आहुति) और अग्नि के फेरे; उत्तर भारत में सामान्यतः सात फेरे होते हैं।
- सप्तपदी: सात क़दम साथ चलना, और वधू द्वारा वर से सात वचन लेना।
- सिंदूरदान और मंगलसूत्र पहनाना; ध्रुव तारे की तरह अटल रिश्ते का आशीर्वाद।
- बड़ों और ब्राह्मणों का आशीर्वाद।
- परिवार की रीति के अनुसार विदाई।
सामग्री
परिवार की तैयारी
- मुहूर्त का समय सबसे ज़रूरी है; बारात और रस्में समय पर हों, इसका ध्यान दोनों परिवार रखें।
- परंपरा में कन्यादान करने वाले माता-पिता कन्यादान तक व्रत रखते हैं; स्वास्थ्य के अनुसार निर्णय लें।
- दोनों परिवार पहले से तय कर लें कि कौन-सी लोक-रीतियाँ होंगी, ताकि मंडप में भ्रम न हो।
- वर-वधू विधि के समय मंत्रों का अर्थ समझें; पंडित जी सरल हिंदी में समझा सकते हैं।
- दिखावे से अधिक विधि और आशीर्वाद पर ध्यान रखें।
सवाल-जवाब
विवाह में कितने फेरे होते हैं?
उत्तर भारत में सामान्यतः अग्नि के सात फेरे होते हैं। कुछ समुदायों में रीति अलग होती है; आपके परिवार की रीति के अनुसार विधि की जाती है।
सात वचन क्या होते हैं?
सप्तपदी के समय वधू वर से वचन लेती है, जैसे धर्म-कर्म में साथ रहना, एक-दूसरे के परिवार का सम्मान करना और घर-गृहस्थी की ज़िम्मेदारी मिलकर निभाना। रीति के अनुसार शब्द थोड़े बदलते हैं, पर भाव यही रहता है।
कोर्ट मैरिज हो चुकी है, क्या बाद में वैदिक विवाह हो सकता है?
हाँ। क़ानूनी पंजीकरण और वैदिक संस्कार दोनों अलग हैं; कई जोड़े बाद में शुभ मुहूर्त में विधि से विवाह संस्कार करवाते हैं।
कुंडली में मांगलिक दोष हो तो क्या विवाह नहीं हो सकता?
हो सकता है। मांगलिक दोष के कई परिहार (अपवाद) होते हैं, और कई बार दोनों कुंडलियों में ही इसका संतुलन होता है। पूरी कुंडली देखकर ही निर्णय लें; डर से अच्छा रिश्ता न छोड़ें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।