- कब करवाते हैं
- मृत्यु के बाद यथाशीघ्र अंत्येष्टि; फिर 10 दिनों तक दशगात्र की क्रियाएँ, 11वें-12वें दिन एकादशाह और सपिंडीकरण, 13वें दिन तेरहवीं; उसके बाद हर वर्ष बरसी और पितृ पक्ष में श्राद्ध। कुल की रीति के अनुसार दिन थोड़े बदल सकते हैं।
- अनुमानित समय
- अंत्येष्टि उसी दिन; बाद की क्रियाएँ 13 दिनों में, कुल की रीति के अनुसार
- कहाँ
- आपके यहाँ या सालासर में; परिवार की उपस्थिति ज़रूरी
- दक्षिणा
- इच्छा अनुसार
अंत्येष्टि, तेरहवीं और श्राद्ध कर्म क्यों करवाते हैं
अंत्येष्टि सोलह संस्कारों में अंतिम संस्कार है। इसके दो अर्थ हैं: जाने वाले को सम्मान और प्रेम से विदा करना, और पीछे रह गए परिवार को सँभालना। 13 दिनों की क्रियाएँ शोक को धीरे-धीरे स्वीकार करने, साथ बैठकर प्रार्थना करने और समाज का सहारा पाने का समय देती हैं।
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा- न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
श्रीमद्भगवद्गीता 2.22
अर्थ:जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र उतारकर नए वस्त्र पहन लेता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
इन दिनों कई परिवार गरुड़ पुराण या गीता का पाठ करवाते हैं। इसका उद्देश्य डराना नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के बारे में समझ देना और मन को शांति देना है।
मृत्यु के बाद के कर्म डर से नहीं, प्रेम और कृतज्ञता से किए जाते हैं। किसी भी क्रिया के बारे में संदेह हो, तो पंडित जी से शांति से पूछिए।
कब ज़रूरत नहीं
कर्मकांड के नाम पर शोक में डूबे परिवार पर भारी ख़र्च या दिखावे का बोझ डालना शास्त्र का भाव नहीं है। सामर्थ्य के अनुसार सादगी से की गई क्रिया भी पूरी है, और ‘ऐसा न किया तो आत्मा भटकेगी’ जैसी डराने वाली बातों पर ध्यान न दें।
पूजा में क्या-क्या होता है
- देहांत के बाद शरीर को धरती पर कुश या चटाई पर लिटाया जाता है; परंपरा में मुख में गंगाजल और तुलसी दल रखा जाता है।
- स्नान कराकर नए वस्त्र पहनाए जाते हैं; चंदन और फूल-माला अर्पित की जाती है, और अर्थी तैयार होती है।
- शवयात्रा ‘राम नाम सत्य है’ के साथ श्मशान तक जाती है।
- चिता पर रीति के अनुसार पिंडदान होता है, फिर मुखाग्नि दी जाती है। मुखाग्नि पुत्र या परिवार का कोई निकट सदस्य देता है; आजकल कई परिवारों में बेटियाँ भी यह कर्म करती हैं।
- सामान्यतः तीसरे दिन अस्थि-संचय होता है, और अस्थियाँ गंगा जी या किसी पवित्र नदी में विसर्जित की जाती हैं।
- दस दिनों तक दशगात्र के पिंड और जल-तर्पण होते हैं, और घर में दीपक जलाया जाता है।
- 11वें और 12वें दिन एकादशाह और सपिंडीकरण की क्रियाएँ होती हैं।
- 13वें दिन तेरहवीं होती है: ब्राह्मण भोजन, दान और शोक-निवृत्ति; रीति के अनुसार पगड़ी की रस्म भी।
- वर्ष पूरा होने पर बरसी (वार्षिक श्राद्ध), और फिर हर वर्ष पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण।
सामग्री
परिवार की तैयारी
- मृत्यु प्रमाण-पत्र जैसे ज़रूरी कागज़ समय पर बनवा लें; आगे बहुत-से कामों में इनकी ज़रूरत पड़ती है।
- परिवार के बुज़ुर्गों और बच्चों का विशेष ध्यान रखें; शोक में सबका मन टूटा होता है।
- शोक के दिनों में सादा, सात्त्विक भोजन रखें।
- क्रियाओं का क्रम और दिन कुल की रीति से तय होते हैं; जो समझ न आए, पंडित जी से पूछें।
- दिखावे के बजाय सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धा से कर्म करें।
सवाल-जवाब
क्या बेटी मुखाग्नि दे सकती है?
आजकल कई परिवारों में बेटियाँ भी मुखाग्नि और अंतिम कर्म करती हैं। भाव और श्रद्धा सबसे बड़ी है; अपने परिवार की सहमति और रीति के अनुसार निर्णय लें।
गरुड़ पुराण का पाठ क्यों होता है?
परंपरा में 13 दिनों में कई परिवार गरुड़ पुराण सुनते हैं। इसका उद्देश्य डराना नहीं, बल्कि जीवन-मृत्यु के बारे में समझ देना और कर्तव्य याद दिलाना है। चाहें तो गीता का पाठ भी किया जा सकता है।
पातक (सूतक) में क्या नहीं करते?
मृत्यु के बाद परिवार में कुछ दिनों का पातक माना जाता है, जिसमें मंदिर-पूजा और शुभ कार्य नहीं किए जाते। कितने दिन का पातक है, यह कुल की रीति पर निर्भर करता है।
दूर रहने वाले परिवार श्राद्ध कैसे करें?
पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण की पूरी विधि इस वेबसाइट के ‘श्राद्ध’ पृष्ठ पर लिखी है। अपनी स्थिति में क्या संभव है, यह पंडित जी से पूछ लें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।