॥ वार्षिक व्रत-पर्व ॥ पितृ देव (पूर्वज); अर्यमा पितरों के स्वामी माने जाते हैं

श्राद्ध (पितृ पक्ष)

पूर्वजों को श्रद्धा से याद करने के 16 दिन — तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन और पंचबलि से पितरों का आशीर्वाद।

कब
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के लगभग 16 दिन — ‘पितृ पक्ष’ या ‘श्राद्ध पक्ष’ (प्रायः सितंबर-अक्टूबर)। जिस तिथि को पूर्वज का देहांत हुआ हो, पितृ पक्ष की उसी तिथि को उनका श्राद्ध होता है। आश्विन अमावस्या ‘सर्वपितृ अमावस्या’ कहलाती है। इसके अलावा हर वर्ष देहांत की तिथि (बरसी) पर भी श्राद्ध किया जाता है।
पूजनीय
पितृ देव (पूर्वज); अर्यमा पितरों के स्वामी माने जाते हैं

अगली तिथियाँ

  1. 16सितंबर पितृ पक्ष आरंभगुरुवार · पूर्णिमा श्राद्ध 15 सितंबर
  2. 29सितंबर सर्व पितृ अमावस्याबुधवार
पूरा पंचांग देखें

श्राद्ध (पितृ पक्ष) का महत्व

‘श्राद्ध’ शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है — जो कुछ श्रद्धा से पितरों के लिए किया जाए, वही श्राद्ध है। शास्त्र मानते हैं कि हर मनुष्य पर तीन ऋण होते हैं — देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण। माता-पिता और पूर्वजों ने हमें जीवन, संस्कार और सब कुछ दिया; श्राद्ध उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का तरीका है।

मान्यता है कि पितृ पक्ष में पितर (पूर्वज) सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के घर आते हैं और उनके दिए जल, तिल और अन्न से तृप्त होकर आशीर्वाद देते हैं — परिवार में सुख-शांति, संतान-सुख और उन्नति का।

अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्। पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्॥

श्रीमद्भगवद्गीता 10.29

अर्थ:(भगवान कहते हैं) मैं नागों में अनंत (शेषनाग) हूँ, जलचरों में वरुण हूँ, पितरों में अर्यमा हूँ और नियम-पालन करने वालों में यमराज हूँ।

श्राद्ध का सबसे सुंदर पक्ष है ‘पंचबलि’ — इसमें भोजन का भाग गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं और चींटियों के लिए निकाला जाता है। यहाँ ‘बलि’ का अर्थ है भोजन का भाग, किसी जीव की हत्या नहीं। यानी पूर्वजों को याद करते हुए हम हर जीव के प्रति करुणा सीखते हैं।

श्राद्ध डर से नहीं, प्रेम से कीजिए। ‘पितर नाराज़ हो जाएँगे’ — यह भाव ठीक नहीं। जो माता-पिता जीवन भर हमारे लिए जिए, वे देह छोड़ने के बाद भी हमारा भला ही चाहते हैं। ‘पितृ दोष’ के नाम पर घबराने की ज़रूरत नहीं — उसका सही अर्थ और सरल उपाय ‘पितृ दोष का सच’ पृष्ठ पर बताए गए हैं। और याद रखिए — सबसे बड़ा श्राद्ध है जीवित माता-पिता और बुज़ुर्गों की सेवा।

पूजा सामग्री

  • काले तिल
  • कुश (दर्भ) — कुश की पवित्री (अंगूठी) अनामिका उँगली में पहनने के लिए
  • जौ और चावल
  • गंगाजल मिला शुद्ध जल, तांबे का लोटा, थाली या परात
  • सफ़ेद फूल और चंदन
  • पिंड के लिए: जौ या चावल का आटा, तिल, घी, शहद, दूध
  • पत्तल या पत्ते (पंचबलि के लिए)
  • पितरों की पसंद का सात्त्विक भोजन — विशेषकर खीर, पूड़ी और सब्ज़ी
  • धूप और घी का दीपक
  • दान के लिए वस्त्र, अन्न और दक्षिणा

व्रत और पूजा की विधि

  1. श्राद्ध की तिथि पर सुबह स्नान करके स्वच्छ — हो सके तो सफ़ेद — वस्त्र पहनें। श्राद्ध प्रायः पुत्र या पौत्र करता है; बेटा न हो तो परिवार का कोई भी सदस्य — पत्नी, बेटी, भाई या भतीजा — पंडित जी के मार्गदर्शन में श्रद्धा से श्राद्ध कर सकता है।
  2. दोपहर का ‘कुतप काल’ (लगभग 11:30 से 12:30 के बीच) श्राद्ध के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। बहुत सुबह या सूर्यास्त के बाद श्राद्ध नहीं किया जाता।
  3. दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें — दक्षिण पितरों की दिशा मानी जाती है। अनामिका उँगली में कुश की पवित्री पहनें।
  4. हाथ में जल, तिल और कुश लेकर संकल्प लें — अपना नाम, गोत्र और जिन पूर्वज का श्राद्ध कर रहे हैं, उनका नाम लेकर।
  5. तर्पण: अंजलि में जल, काले तिल और कुश लेकर अंगूठे और तर्जनी के बीच के भाग (पितृ तीर्थ) से धीरे-धीरे जल छोड़ें। हर पूर्वज का नाम और गोत्र लेकर ‘तृप्यताम्’ (तृप्त हों) कहते हुए तीन-तीन अंजलि जल दें। ठीक मंत्र और उच्चारण पंडित जी से लें।
  6. पिंडदान: जौ या चावल के आटे में तिल, घी, शहद और दूध मिलाकर गोल पिंड बनाएँ और कुश पर रखकर पूर्वजों को अर्पित करें। पिंडदान की पूरी विधि विस्तृत है — इसे पंडित जी के साथ करना उत्तम है।
  7. भोजन बनाएँ — पूर्वजों की पसंद का सात्त्विक भोजन, विशेषकर खीर। भोजन बनाते समय मन शांत और पवित्र रखें।
  8. पंचबलि: भोजन से पाँच भाग निकालें — गाय के लिए (गो-बलि), कुत्ते के लिए (श्वान-बलि), कौए के लिए (काक-बलि), देवताओं के लिए (देव-बलि) और चींटियों के लिए (पिपीलिका-बलि)।
  9. ब्राह्मण भोजन: एक या तीन ब्राह्मणों को — या सामर्थ्य न हो तो किसी ज़रूरतमंद को — आदर से भोजन कराएँ, वस्त्र और दक्षिणा देकर पैर छूकर विदा करें।
  10. अंत में परिवार के सब सदस्य पूर्वजों को प्रणाम करें, उनके अच्छे गुणों और यादों को साझा करें, और फिर स्वयं भोजन करें।
  11. जिन पूर्वजों की तिथि याद न हो, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या को करें। गया जी (बिहार) में पिंडदान का विशेष महत्व माना गया है।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • सात्त्विक भोजन — खीर, पूड़ी, मौसमी सब्ज़ियाँ, दाल
  • श्राद्ध के दिन ब्राह्मण भोजन और पंचबलि के बाद ही परिवार भोजन करे

क्या न खाएँ

  • मांस, मछली, अंडा और मदिरा
  • श्राद्ध के भोजन में प्याज़ और लहसुन
  • श्राद्ध के भोजन में कुछ अन्य वस्तुएँ भी परंपरा से वर्जित मानी जाती हैं — अपने परिवार और पंडित जी से पूछ लें

अन्य नियम

  • पितृ पक्ष स्मरण का समय है — इन दिनों विवाह, गृह प्रवेश जैसे शुभ कार्य और बड़ी नई ख़रीदारी आमतौर पर नहीं की जाती
  • श्राद्ध करने वाले उस दिन संयम रखते हैं — कई परिवार बाल-दाढ़ी न कटवाने का नियम भी मानते हैं
  • क्रोध, कलह और झूठ से बचें; घर आए किसी भूखे को ख़ाली हाथ न लौटाएँ
  • जीवित माता-पिता और बुज़ुर्गों की सेवा — यह हर दिन का श्राद्ध है

मंत्र

पितृ नमन मंत्र

ॐ पितृदेवताभ्यो नमः

अर्थ:सब पितृ-देवताओं (पूर्वजों) को नमस्कार है।

जप: तर्पण और पूजा में 11 बार; पितृ पक्ष में रोज़ 1 माला भी कर सकते हैं।

स्वधा मंत्र

ॐ सर्वेभ्यः पितृभ्यः स्वधा नमः

अर्थ:सब पितरों के लिए यह अर्पण (स्वधा) है; उन्हें नमस्कार। जैसे देवताओं को आहुति देते समय ‘स्वाहा’ कहा जाता है, वैसे ही पितरों के लिए ‘स्वधा’ कहा जाता है।

जप: तर्पण में जल अर्पित करते समय।

व्रत-कथा

कर्ण और पितृ पक्ष की लोक-कथा

पितृ पक्ष से जुड़ी एक बहुत प्रसिद्ध लोक-कथा महाभारत के महान दानी कर्ण की है। कर्ण ने जीवन भर दान दिया — कहते हैं, उनके द्वार से कोई ख़ाली हाथ नहीं लौटा। उन्होंने अपने कवच-कुंडल तक इंद्र को दान कर दिए थे।

महाभारत के युद्ध में देह त्यागने के बाद कर्ण की आत्मा स्वर्ग पहुँची। वहाँ उन्हें भोजन के समय थाली में सोना, चाँदी और रत्न परोसे गए। कर्ण चकित हुए और देवराज इंद्र से पूछा — ‘मैं भूखा हूँ; सोना कैसे खाऊँ? मुझे भोजन क्यों नहीं मिल रहा?’

इंद्र ने उत्तर दिया — ‘कर्ण, तुमने जीवन भर सोना-चाँदी और धन का दान किया, इसलिए यहाँ वही तुम्हें मिल रहा है। पर तुमने कभी अपने पितरों के लिए अन्न और जल का दान नहीं किया, उनका श्राद्ध नहीं किया।’

कर्ण दुखी होकर बोले — ‘मुझे तो अपने पूर्वजों के बारे में पता ही नहीं था। जन्म के समय ही मैं अपनी माता से अलग हो गया था; मुझे अपने कुल का ज्ञान ही कहाँ था?’ कर्ण की बात में सच्चाई थी।

तब इंद्र (कुछ कथाओं में यमराज) ने कर्ण को अनुमति दी कि वे लगभग पंद्रह दिन के लिए पृथ्वी पर लौटें और अपने पूर्वजों के लिए श्रद्धा से तर्पण और अन्न-जल का दान करें। कर्ण पृथ्वी पर आए, अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया, ब्राह्मणों और ज़रूरतमंदों को भोजन कराया और फिर स्वर्ग लौटे। तब उन्हें स्वर्ग में अन्न-जल मिला।

लोक-मान्यता है कि वही दिन पितृ पक्ष कहलाए। इस कथा का संदेश बहुत सीधा है — धन का दान बड़ा है, पर जिनके कारण हम हैं, उन्हें याद करना और भूखे को अन्न देना उससे भी बड़ा।

यह महाभारत के मूल ग्रंथ की कथा नहीं, बल्कि पीढ़ियों से कही जाने वाली लोक-कथा है — इसका भाव ही इसका सार है।

किस तिथि को किसका श्राद्ध

सामान्य नियम है — जिस तिथि को पूर्वज का देहांत हुआ हो (चाहे कृष्ण पक्ष हो या शुक्ल पक्ष), पितृ पक्ष की उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाए। इसके साथ कुछ विशेष तिथियाँ भी हैं:

  • पूर्णिमा श्राद्ध (भाद्रपद पूर्णिमा): जिनका देहांत पूर्णिमा को हुआ हो। इसी दिन से पितृ पक्ष आरंभ होता है।
  • प्रतिपदा से चतुर्दशी तक: देहांत की तिथि के अनुसार।
  • नवमी (मातृ नवमी): माता, दादी और उन सुहागिन स्त्रियों का श्राद्ध, जिनका देहांत पति के रहते हुआ हो।
  • द्वादशी: संन्यासियों और साधु-संतों का श्राद्ध।
  • चतुर्दशी: जिनकी मृत्यु दुर्घटना, शस्त्र या किसी अकाल कारण से हुई हो।
  • सर्वपितृ अमावस्या: जिनकी तिथि ज्ञात न हो, या जिनका श्राद्ध किसी कारण छूट गया हो — इस दिन सब पितरों का श्राद्ध किया जाता है।

बहुत छोटी आयु में देहांत होने पर श्राद्ध के नियम अलग होते हैं, और कुछ परिवारों में अपनी विशेष परंपराएँ होती हैं। किसी भी उलझन में पंडित जी से पूछ लें।

पं. बजरंगलाल दधीच जी श्राद्ध-कर्म, तर्पण और पिंडदान विधि-विधान से करवाते हैं। तिथि या विधि को लेकर कोई प्रश्न हो तो निःसंकोच पूछें।

सावधानी

श्राद्ध में उपवास अनिवार्य नहीं है — श्राद्ध करने वाले प्रायः ब्राह्मण भोजन और पंचबलि के बाद ही भोजन करते हैं। बीमार, बुज़ुर्ग, गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग समय पर दवा और हल्का आहार लेते रहें — पितर अपनी संतान को कष्ट में नहीं देखना चाहते। दवा कभी न छोड़ें। विधि में भूल हो जाए तो क्षमा-प्रार्थना करें; श्राद्ध का सार श्रद्धा है, डर नहीं।

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।