- कब
- हर महीने कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि, अमावस्या को, जब चंद्रमा दिखाई नहीं देता। सोमवार को पड़ने वाली सोमवती अमावस्या और शनिवार को पड़ने वाली शनैश्चरी अमावस्या विशेष मानी जाती हैं।
- पूजनीय
- पितृ देव (पूर्वज), भगवान विष्णु और पीपल वृक्ष
अगली तिथियाँ
- 9नवंबर कार्तिक अमावस्यासोमवार · दीपावली 8 नवंबर को
- 8दिसंबर मार्गशीर्ष अमावस्यामंगलवार
- 7जनवरी पौष अमावस्यागुरुवार
- 6फ़रवरी मौनी अमावस्या (माघ अमावस्या)शनिवार
- 8मार्च फाल्गुन अमावस्यासोमवार · सोमवती अमावस्या
- 6अप्रैल चैत्र अमावस्यामंगलवार
- 6मई वैशाख अमावस्यागुरुवार
- 4जून ज्येष्ठ अमावस्याशुक्रवार · वट सावित्री व्रत और शनि जयंती
- 4जुलाई आषाढ़ अमावस्यारविवार
- 2अगस्त श्रावण अमावस्यासोमवार · सोमवती और हरियाली अमावस्या
- 31अगस्त भाद्रपद अमावस्यामंगलवार · पिठोरी अमावस्या
- 30सितंबर आश्विन अमावस्यागुरुवार · सर्व पितृ अमावस्या 29 सितंबर; इसी दिन नवरात्रि घटस्थापना
अगली तिथि के लिए पंडित जी से पूछें।
पूरा पंचांग देखेंअमावस्या व्रत और पितृ-पूजन का महत्व
अमावस्या की रात चंद्रमा दिखाई नहीं देता। हमारी परंपरा में यह तिथि पितरों, यानी हमारे पूर्वजों की मानी गई है। जिन माता-पिता, दादा-दादी और पूर्वजों के कारण हमारा जीवन है, उन्हें श्रद्धा से याद करना, जल-तिल से तर्पण करना और उनके नाम पर दान देना इस दिन का मुख्य कर्म है।
मान्यता है कि पितरों के प्रसन्न रहने से घर में सुख-शांति, संतान-सुख और उन्नति बनी रहती है। पितृ-पूजन का सबसे सुंदर अर्थ है कृतज्ञता: हम अकेले नहीं हैं, हमारे पीछे पीढ़ियों का प्रेम और आशीर्वाद है।
अमावस्या को पवित्र नदियों में स्नान, पीपल के पेड़ की पूजा और संध्या को दीपदान का भी बड़ा महत्व है। पीपल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का वास माना गया है। इस दिन किया गया दान, विशेषकर भूखे को भोजन, बहुत पुण्यकारी माना जाता है।
अंधेरी रात भीतर झाँकने का समय भी है। इस दिन मौन, जप और ध्यान करने से मन शांत होता है। दीपावली भी कार्तिक मास की अमावस्या को ही आती है, यानी सबसे अंधेरी रात को सबसे अधिक दीपक जलाने का पर्व।
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। संभव हो तो पवित्र नदी में स्नान करें, नहीं तो नहाने के पानी में थोड़ा गंगाजल मिला लें।
- सूर्य देव को जल अर्पित करें और हाथ में जल-अक्षत लेकर अमावस्या व्रत और पितृ-पूजन का संकल्प लें।
- दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें और अपने पितरों का श्रद्धा से स्मरण करें।
- लोटे में जल लें, उसमें काले तिल और थोड़े फूल डालें। हाथ में कुश रखकर पितरों का नाम लेते हुए, अँगूठे और तर्जनी के बीच से जल धीरे-धीरे गिराएँ। इसे तर्पण कहते हैं। जिनके नाम याद न हों, उनके लिए ‘सभी पितरों के लिए’ कहकर जल दें।
- पीपल के पेड़ की जड़ में जल और थोड़ा दूध चढ़ाएँ, कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करें और प्रणाम करें।
- पितरों के निमित्त सात्त्विक भोजन बनाएँ। उसमें से पहले गाय, कौए और कुत्ते के लिए भोजन निकालें।
- किसी ब्राह्मण या ज़रूरतमंद को आदर से भोजन कराएँ या अन्न-वस्त्र-दक्षिणा दान करें।
- व्रत रखने वाले दिन में एक बार सात्त्विक भोजन करें।
- संध्या को पीपल के नीचे और घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाएँ। कई परिवारों में दक्षिण दिशा में पितरों के लिए एक दीपक जलाने की परंपरा है।
- रात को भगवान विष्णु का स्मरण करें, ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ का जप करें और पितरों की शांति की प्रार्थना करें।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- दिन में एक बार सात्त्विक भोजन
- फल, दूध
क्या न खाएँ
- मांस, मदिरा और हर नशा
- प्याज़, लहसुन
- तामसिक भोजन
अन्य नियम
- घर में कलह और कटु वचन से बचें, बड़ों का आदर करें।
- इस दिन किसी भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है।
- पितरों को याद करते समय मन में डर नहीं, प्रेम और कृतज्ञता रखें।
- मौन और जप के लिए यह दिन बहुत उत्तम है।
मंत्र
ॐ पितृदेवताभ्यो नमः
अर्थ:सभी पितृ देवताओं, यानी हमारे पूर्वजों को नमस्कार।
जप: तर्पण के समय और संध्या को 11 या 108 बार
मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे। अग्रतः शिवरूपाय वृक्षराजाय ते नमः॥
अर्थ:जिसकी जड़ में ब्रह्मा, बीच में विष्णु और ऊपरी भाग में शिव का रूप है, उस वृक्षों के राजा पीपल को नमस्कार है।
जप: पीपल की परिक्रमा करते समय
साल की विशेष अमावस्याएँ
- सोमवती अमावस्या: जब अमावस्या सोमवार को पड़े। सुहागिनें पति की लंबी आयु के लिए पीपल की पूजा करती हैं और परिक्रमा करती हैं, कई जगह 108 परिक्रमा की परंपरा है।
- शनैश्चरी (शनि) अमावस्या: जब अमावस्या शनिवार को पड़े। इस दिन शनिदेव की पूजा, सरसों के तेल का दान और हनुमान चालीसा का पाठ विशेष माना जाता है।
- मौनी अमावस्या: माघ मास की अमावस्या। इस दिन मौन रहकर स्नान, जप और दान करने की परंपरा है।
- हरियाली अमावस्या: श्रावण मास की अमावस्या। इस दिन पेड़ लगाने और प्रकृति की पूजा का महत्व है।
- वट सावित्री अमावस्या: ज्येष्ठ मास की अमावस्या, जब सुहागिनें वट (बरगद) की पूजा करती हैं।
- सर्वपितृ अमावस्या: आश्विन मास की अमावस्या, पितृ पक्ष का अंतिम दिन। जिन पितरों की तिथि याद न हो, उनका श्राद्ध इसी दिन होता है।
- दीपावली: कार्तिक मास की अमावस्या, माता लक्ष्मी के पूजन का महापर्व।
पितरों से जुड़े विशेष कर्म, जैसे श्राद्ध, पिंडदान या नारायण बलि, विधि-विधान से ही होते हैं। इनके लिए पंडित जी से सलाह लें। पितृ पक्ष के श्राद्ध की पूरी जानकारी श्राद्ध पृष्ठ पर है।
सावधानी
अमावस्या पर कठोर उपवास आवश्यक नहीं है। तर्पण, दान और दीपदान ही मुख्य कर्म हैं। बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग सामान्य सात्त्विक भोजन करते हुए भी पूरी श्रद्धा से पितृ-पूजन कर सकते हैं। दवा कभी न छोड़ें। नदी में स्नान करते समय गहरे पानी से दूर रहें और दीपक जलाते समय आग से सावधानी रखें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।