- कब
- कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी (पूर्णिमांत; अमांत पंचांग में आश्विन कृष्ण चतुर्थी — दिन वही), प्रायः अक्टूबर-नवंबर में, दशहरे के लगभग 9-10 दिन बाद। व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रहता है; चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खुलता है। चंद्रोदय का समय अपने शहर के पंचांग से देखें।
- पूजनीय
- माता पार्वती (चौथ माता/करवा माता), शिव जी, गणेश जी और चंद्रदेव
- संबंधित ग्रह
- चंद्र ग्रह
करवा चौथ का महत्व
करवा चौथ सुहागिन स्त्रियों का प्रमुख व्रत है, जो पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और दांपत्य जीवन में प्रेम के लिए रखा जाता है। ‘करवा’ मिट्टी का टोंटी वाला छोटा घड़ा है और ‘चौथ’ यानी चतुर्थी। इसी करवे से चंद्रमा को अर्घ्य दिया जाता है।
इस दिन शिव-पार्वती, गणेश जी, कार्तिकेय जी और चौथ माता (करवा माता) की पूजा होती है। माता पार्वती अखंड सौभाग्य का प्रतीक हैं। राजस्थान में चौथ माता की पूजा का विशेष महत्व है — सवाई माधोपुर के पास चौथ का बरवाड़ा में चौथ माता का प्रसिद्ध मंदिर है।
आजकल बहुत से पति भी पत्नी के साथ यह व्रत रखते हैं — सच कहें तो यह व्रत एक-दूसरे के प्रति प्रेम और सम्मान का पर्व है। सास द्वारा बहू को दी जाने वाली ‘सरगी’ और बहू द्वारा सास को दिया जाने वाला ‘बायना’ इस व्रत को पूरे परिवार का उत्सव बना देते हैं।
कुँवारी कन्याएँ भी अच्छे वर की कामना से यह व्रत रखती हैं; कई जगह वे चंद्रमा की जगह तारों को अर्घ्य देती हैं।
पंडित जी से सुनिए
पूजा सामग्री
व्रत और पूजा की विधि
- सूर्योदय से पहले सरगी खाएँ — सास या घर की बड़ी स्त्री द्वारा दी गई फल, मेवे, मिठाई और फेनी। पर्याप्त पानी पी लें।
- स्नान करके व्रत का संकल्प लें: ‘मैं अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य के लिए करवा चौथ का व्रत रखूँगी।’
- दिन भर निर्जला — या स्वास्थ्य के अनुसार जल-फल लेकर — व्रत रखें। सोलह शृंगार करें और मेहंदी लगाएँ।
- शाम को (परंपरा अनुसार) पूजा-स्थल पर चौथ माता का चित्र लगाएँ और शिव-पार्वती तथा गणेश जी की स्थापना करें।
- करवे में जल (या गेहूँ/चावल) भरें, उस पर मौली बाँधें, रोली से स्वस्तिक बनाएँ और ढक्कन पर मिठाई रखें।
- अड़ोस-पड़ोस की स्त्रियाँ मिलकर बैठें और करवा चौथ की कथा सुनें। कथा के समय हाथ में अक्षत या गेहूँ के दाने रखें।
- कथा के बाद कई जगह थालियाँ आपस में घुमाने (फेरी) की परंपरा है। फिर रोली, अक्षत, फूल, दीपक और भोग से पूजा करें।
- सास या घर की बड़ी स्त्री को बायना (मिठाई, मठरी, वस्त्र) देकर पैर छूकर आशीर्वाद लें।
- चंद्रोदय होने पर चंद्रमा को करवे से जल का अर्घ्य दें, रोली-अक्षत चढ़ाएँ, और छलनी में दीपक रखकर पहले चाँद और फिर पति को देखें।
- पति के हाथ से जल पीकर और मिठाई खाकर व्रत खोलें, फिर सात्त्विक भोजन करें।
- बादलों के कारण चाँद न दिखे, तो पंचांग में दिए चंद्रोदय समय पर चंद्रमा की दिशा में अर्घ्य देकर व्रत खोला जा सकता है; कई परिवार शिव जी के मस्तक पर विराजमान चंद्रमा को अर्घ्य देते हैं।
नियम: क्या करें, क्या न करें
क्या खाएँ
- सूर्योदय से पहले सरगी: फल, सूखे मेवे, मिठाई, फेनी, दूध
- व्रत खोलने के बाद सात्त्विक भोजन
क्या न खाएँ
- दिन में अन्न और जल — निर्जला व्रत में (स्वास्थ्य के अनुसार जल-फल लेने की छूट लें)
- इस दिन प्याज़-लहसुन वाला तामसिक भोजन
- मांस, मदिरा और नशा
अन्य नियम
- दिन भर मन प्रसन्न रखें; कलह और कटु वचन से बचें
- व्रत खोलते समय पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान और धन्यवाद करें — यही इस व्रत का भाव है
- जो पति साथ में व्रत रखें, वे भी यही नियम मानें
- इस दिन से जुड़ी अलग-अलग पारिवारिक मान्यताएँ हैं — घर की बड़ी स्त्रियों से अपनी परंपरा पूछ लें
मंत्र
जय जय गिरिबरराज किसोरी। जय महेस मुख चंद चकोरी॥ जय गजबदन षडानन माता। जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
अर्थ:हे पर्वतराज हिमालय की पुत्री, आपकी जय हो! महादेव के मुख-रूपी चंद्रमा को चकोर की तरह निहारने वाली, आपकी जय हो! हे गणेश जी और कार्तिकेय जी की माता, जगत की जननी, बिजली जैसी कांति वाली, आपकी जय हो। (रामचरितमानस, बालकांड — सीता जी द्वारा गौरी-पूजन)
जप: पूजा में 3 या 11 बार।
ॐ सोमाय नमः
अर्थ:चंद्रदेव (सोम) को नमस्कार है।
जप: अर्घ्य देते समय 3 बार।
वीरावती की कथा
प्राचीन समय में एक साहूकार के सात बेटे और एक बेटी थी, जिसका नाम वीरावती था। सात भाइयों की इकलौती बहन होने के कारण वह सबकी लाडली थी। भाई उसे इतना प्यार करते थे कि उसे भूखा देखना भी उन्हें सहन नहीं होता था।
वीरावती का विवाह हुआ। विवाह के बाद पहली करवा चौथ पर वह मायके आई हुई थी। उसने भाभियों के साथ बड़े उत्साह से निर्जला व्रत रखा। पर दिन ढलते-ढलते भूख-प्यास से वह बेहाल हो गई और मुरझाकर बैठ गई।
शाम को भाई घर लौटे तो बहन की यह दशा देखकर व्याकुल हो गए। उन्होंने उससे भोजन करने को कहा, पर वीरावती बोली — ‘चाँद निकलने से पहले मैं व्रत नहीं तोड़ सकती।’ बहन का दुख भाइयों से देखा नहीं गया, और उन्होंने एक उपाय सोचा।
सबसे छोटा भाई दूर एक पीपल के पेड़ पर चढ़ गया और छलनी की ओट में एक दीपक जला दिया। दूर से देखने पर ऐसा लगता था मानो चाँद निकल आया हो। भाइयों ने आकर कहा — ‘बहन, देखो, चाँद निकल आया! अर्घ्य देकर भोजन कर लो।’ भोली वीरावती ने उसे सच मान लिया, ‘चाँद’ को अर्घ्य दिया और भोजन करने बैठ गई।
पहला कौर तोड़ा तो उसमें बाल निकला। दूसरे कौर पर छींक आ गई। तीसरा कौर उठाया ही था कि ससुराल से समाचार आया कि उसके पति अचानक मूर्च्छित होकर गिर पड़े हैं और उनके प्राण संकट में हैं।
वीरावती रोती-बिलखती ससुराल की ओर दौड़ी। रास्ते में उसे माता पार्वती (कुछ कथाओं में इंद्राणी) मिलीं। उन्होंने स्नेह से कहा — ‘बेटी, तुम्हारे भाइयों ने तुम्हें छल से नकली चाँद दिखाया था। अधूरे व्रत में भोजन करने से यह संकट आया है। पर तुम्हारा मन सच्चा है। अब पूरे वर्ष हर महीने की चौथ का व्रत श्रद्धा से करो और अगली करवा चौथ का व्रत पूरे विधि-विधान से करो — तुम्हारा सुहाग फिर खिल उठेगा।’
वीरावती ने पति की सेवा करते हुए पूरे साल हर चतुर्थी का व्रत नियम से किया। अगली करवा चौथ पर उसने निर्जला व्रत रखा, कथा सुनी, सच्चे चंद्रमा को अर्घ्य दिया और माता से अपने सुहाग की प्रार्थना की। उसकी श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न होकर करवा माता ने आशीर्वाद दिया — उसके पति स्वस्थ होकर उठ बैठे। दोनों ने लंबा, सुखी जीवन बिताया।
तभी से यह कथा करवा चौथ के दिन कही-सुनी जाती है, और व्रत पूरा होने पर — असली चाँद देखकर — ही व्रत खोला जाता है।
कथा का संदेश डराना नहीं है। भाइयों का प्रेम सच्चा था, पर छल गलत था; और वीरावती की सच्ची निष्ठा ने संकट को भी हरा दिया। किसी कारण व्रत अधूरा रह जाए, तो क्षमा-प्रार्थना करें — माँ भाव देखती हैं।
दूसरी कथा: पतिव्रता करवा
करवा चौथ से जुड़ी एक और लोक-कथा है। एक नदी के किनारे करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री अपने पति के साथ रहती थी।
एक दिन पति नदी में स्नान कर रहे थे, तभी एक मगरमच्छ ने उनका पैर पकड़ लिया। पति की पुकार सुनकर करवा दौड़ी आई। उसने कच्चे सूत के धागे से मगरमच्छ को बाँध दिया — कहते हैं, उसके सतीत्व के बल से मगरमच्छ हिल भी न सका।
फिर करवा यमराज के पास पहुँची और बोली कि इस मगरमच्छ को दंड दीजिए और मेरे पति को जीवनदान दीजिए। यमराज ने पहले मना किया, पर करवा की दृढ़ निष्ठा और तेज के आगे उन्हें झुकना पड़ा। मगरमच्छ को दंड मिला और करवा के पति को लंबी आयु का वरदान।
मान्यता है कि तभी से सुहागिनें करवा माता से प्रार्थना करती हैं — ‘हे करवा माता, जैसे आपने अपने सुहाग की रक्षा की, वैसे ही हमारे सुहाग की भी रक्षा करना।’
उद्यापन
करवा चौथ का व्रत विवाह के बाद हर वर्ष किया जाता है। कई परिवारों में विवाह के कुछ वर्ष बाद इसका उद्यापन होता है, जिसमें सुहागिनों (कई जगह 13) को भोजन कराकर सुहाग सामग्री और बायना दिया जाता है। उद्यापन की रीत हर परिवार में अलग है — घर की बड़ी स्त्रियों या पंडित जी से पूछकर करें।
सावधानी
निर्जला व्रत शरीर पर भारी पड़ सकता है। गर्भवती या स्तनपान कराने वाली माताएँ, बीमार, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़, ब्लड प्रेशर, किडनी या नियमित दवा वाले लोग जल और फल लेकर व्रत रखें और डॉक्टर की सलाह लें — व्रत का फल श्रद्धा से मिलता है, शरीर को कष्ट देने से नहीं। दवा कभी न छोड़ें। सरगी में पानी और पौष्टिक चीज़ें लें, और चक्कर, घबराहट या कमज़ोरी लगे तो तुरंत पानी पी लें।
यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।