कथा से पहले
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्। वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥
श्रीरामरक्षा स्तोत्र
अर्थ:जिनकी गति मन जैसी तेज़ और वेग पवन जैसा है, जो इंद्रियों को जीतने वाले और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं — उन पवनपुत्र, वानर-सेना के प्रमुख, श्रीराम के दूत की मैं शरण लेता हूँ।
हनुमान जी को कलियुग में ‘जागृत देव’ माना जाता है। राजस्थान में प्रेम से उन्हें ‘बालाजी’ कहते हैं। उनकी कथा केवल बल की नहीं — विनम्रता, सेवा और भक्ति की कथा है। इतने शक्तिशाली होकर भी वे स्वयं को सदा ‘राम का दास’ ही कहते रहे।
जन्म, सूर्य को फल समझना और नाम ‘हनुमान’
पुराणों में कथा आती है कि माता अंजना पहले स्वर्ग की अप्सरा पुंजिकस्थला थीं, जो एक शाप के कारण वानर-कुल में जन्मीं। उनका विवाह वानरराज केसरी से हुआ। संतान की कामना से अंजना ने कठोर तप किया। पवनदेव की कृपा और भगवान शिव के अंश से उन्हें एक तेजस्वी पुत्र मिला। इसीलिए हनुमान जी को ‘पवनपुत्र’, ‘केसरीनंदन’ और ‘आंजनेय’ कहा जाता है। कई ग्रंथ उन्हें भगवान शिव का ग्यारहवाँ रुद्र-अवतार मानते हैं — चालीसा में भी उन्हें ‘संकर सुवन’ कहा गया है। उत्तर भारत की परंपरा में उनका जन्मोत्सव चैत्र पूर्णिमा को मनाया जाता है।
एक सुबह बालक को बहुत भूख लगी। उगता हुआ लाल सूरज उन्हें पका हुआ मीठा फल लगा। बस, वे उछले और आकाश में उड़ चले! उसी दिन राहु सूर्य को ग्रसने आ रहा था। बालक ने राहु को भी कोई खिलौना समझकर पकड़ना चाहा। घबराया राहु इंद्र के पास भागा। इंद्र ने ऐरावत पर आकर बालक पर वज्र चला दिया। वज्र बालक की ठोड़ी, यानी ‘हनु’ पर लगा और वे मूर्छित होकर धरती पर गिर पड़े। ठोड़ी पर लगी इसी चोट के कारण उनका नाम पड़ा — ‘हनुमान’।
जुग सहस्र जोजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू॥
श्री हनुमान चालीसा — गोस्वामी तुलसीदास
अर्थ:हज़ारों योजन दूर स्थित सूर्य को आपने मीठा फल समझकर निगल लिया था।
पुत्र को मूर्छित देखकर पवनदेव दुखी होकर रूठ गए और संसार में वायु का बहना रोक दिया। सब प्राणी तड़पने लगे। तब ब्रह्मा जी सब देवताओं के साथ आए, बालक को फिर से चेतना दी, और देवताओं ने उन्हें वरदान दिए। इंद्र ने कहा कि अब वज्र भी इन्हें हानि नहीं पहुँचा सकेगा — इसी से उनका शरीर वज्र जैसा हुआ और वे ‘वज्रांग’, यानी ‘बजरंग’ कहलाए। सूर्यदेव ने अपना तेज दिया और विद्या सिखाने का वचन दिया। वरुण, यम और ब्रह्मा जी ने भी उन्हें अभय और बल के वरदान दिए।
बालक हनुमान बड़े नटखट थे। ऋषियों के आश्रम में ऊधम मचाते — कभी कमंडल उलट देते, कभी यज्ञ की सामग्री बिखेर देते। तब ऋषियों ने प्रेम-भरा शाप दिया — “तुम्हें अपनी शक्तियाँ भूल जाएँगी, और जब कोई याद दिलाएगा तभी याद आएँगी।” यही ‘शाप’ आगे चलकर रामायण में बड़े काम आया।
सूर्यदेव से शिक्षा और श्रीराम से मिलन
सूर्यदेव ने गुरु बनकर हनुमान जी को शास्त्र पढ़ाए। सूर्य कभी रुकते नहीं, इसलिए कहते हैं कि हनुमान जी उनके रथ की ओर मुख करके उलटे चलते हुए पढ़ते रहे, और थोड़े ही समय में वेद, व्याकरण और सब शास्त्रों के ज्ञाता बन गए। इसीलिए चालीसा में उन्हें ‘बिद्यावान गुनी अति चातुर’ कहा गया है। शिक्षा पूरी होने पर वे किष्किंधा के राजकुमार सुग्रीव के मंत्री और मित्र बने। बड़े भाई बालि के डर से सुग्रीव ऋष्यमूक पर्वत पर रहते थे।
उधर रावण सीता जी का हरण कर चुका था। श्रीराम और लक्ष्मण उन्हें ढूँढते हुए ऋष्यमूक पर्वत के पास पहुँचे। धनुष-बाण लिए दो वीरों को देखकर सुग्रीव डर गए कि कहीं बालि ने तो नहीं भेजा। उन्होंने हनुमान जी को भेजा। हनुमान जी ब्राह्मण का वेश धरकर आए और विनम्रता से परिचय पूछा। जैसे ही श्रीराम ने अपना नाम बताया, हनुमान जी ने अपने प्रभु को पहचान लिया और उनके चरणों में गिर पड़े। आँखों से प्रेम के आँसू बह चले। श्रीराम ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया।
हनुमान जी दोनों भाइयों को अपने कंधों पर बिठाकर सुग्रीव के पास ले गए। अग्नि को साक्षी मानकर श्रीराम और सुग्रीव की मित्रता हुई। श्रीराम ने बालि के अन्याय का अंत किया और सुग्रीव को राज्य मिला। फिर वानरों की टोलियाँ चारों दिशाओं में सीता जी की खोज में निकलीं। श्रीराम ने अपनी अँगूठी हनुमान जी को दी — उन्हें भरोसा था कि यह काम हनुमान ही करेंगे।
समुद्र-लंघन, सीता-सुधि और लंका-दहन
दक्षिण दिशा में गई टोली अंगद और जाम्बवंत के साथ समुद्र-तट पर पहुँची। गिद्धराज संपाती ने बताया कि सीता जी सौ योजन दूर लंका में हैं। इतना विशाल समुद्र कौन लाँघे? सब चुप थे। हनुमान जी भी एक ओर शांत बैठे थे — ऋषियों के शाप के कारण उन्हें अपनी शक्ति याद ही नहीं थी। तब बूढ़े जाम्बवंत ने उन्हें याद दिलाया —
कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥
रामचरितमानस, किष्किंधा कांड
अर्थ:हे तात! संसार में ऐसा कौन-सा कठिन काम है जो तुमसे न हो सके?
इतना सुनते ही हनुमान जी को अपना बल याद आ गया। उनका शरीर पर्वत जैसा विशाल हो गया। उन्होंने महेंद्र पर्वत से छलाँग लगाई और आकाश में उड़ चले। रास्ते में मैनाक पर्वत ने विश्राम का आग्रह किया, पर हनुमान जी ने उसे हाथ से छूकर प्रणाम किया और आगे बढ़ गए —
हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड
अर्थ:हनुमान जी ने मैनाक को हाथ से छुआ, फिर प्रणाम करके कहा — श्रीराम का काम किए बिना मुझे विश्राम कहाँ!
फिर नागमाता सुरसा ने परीक्षा ली। हनुमान जी ने बुद्धि से अति छोटा रूप बनाया, उसके मुख में जाकर बाहर निकल आए, और सुरसा ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। छाया पकड़कर खींचने वाली राक्षसी सिंहिका का अंत करके वे लंका पहुँचे। रात में सूक्ष्म रूप धरकर पूरी लंका में सीता जी को खोजा और अंत में अशोक वाटिका में उन्हें पाया। पेड़ पर छिपकर उन्होंने पहले राम-कथा सुनाई, फिर श्रीराम की अँगूठी सीता जी के सामने रख दी। सीता जी का दुखी मन खिल उठा और उन्होंने आशीर्वाद दिया —
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू॥
रामचरितमानस, सुंदरकांड
अर्थ:बेटा! तुम कभी बूढ़े न होओ, अमर रहो, गुणों के भंडार बनो, और श्री रघुनाथ जी तुम पर बहुत कृपा करें।
फिर हनुमान जी ने अशोक वाटिका के फल खाए, पेड़ उखाड़े और रावण के पुत्र अक्षयकुमार का अंत किया। मेघनाद ने ब्रह्मास्त्र चलाया तो ब्रह्मा जी का मान रखते हुए वे स्वयं बंध गए और रावण के दरबार में पहुँचे। वहाँ निर्भय होकर उन्होंने रावण को सीता जी को लौटाने की सलाह दी। क्रोधित रावण ने उनकी पूँछ में आग लगवा दी — और उसी आग से हनुमान जी ने सोने की लंका जला दी! समुद्र में पूँछ बुझाकर वे सीता जी से निशानी के रूप में चूड़ामणि लेकर लौटे और श्रीराम को सीता जी का समाचार दिया।
लक्ष्मण जी के लिए संजीवनी
युद्ध में मेघनाद की शक्ति से लक्ष्मण जी मूर्छित हो गए। पूरी सेना में शोक छा गया। लंका के वैद्य सुषेण ने बताया कि यदि सूर्योदय से पहले हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से संजीवनी बूटी आ जाए, तो लक्ष्मण जी बच सकते हैं। एक ही रात में इतनी दूर जाकर लौटना — यह काम हनुमान जी के सिवा कौन करता?
हनुमान जी उड़ चले। रास्ते में रावण के भेजे मायावी कालनेमि ने साधु बनकर उन्हें रोकना चाहा, पर हनुमान जी ने उसकी चाल पहचान ली। द्रोणगिरि पहुँचे तो बूटी पहचान में न आई। समय कम था, इसलिए उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया! लौटते समय अयोध्या के पास नंदीग्राम में भरत जी ने उन्हें कोई राक्षस समझकर बाण चला दिया। हनुमान जी ‘राम-राम’ कहते हुए नीचे आ गिरे। भरत जी ने पहचाना, बहुत पछताए, और उन्हें फिर से प्रभु के काम के लिए विदा किया।
सूर्योदय से पहले हनुमान जी पर्वत लेकर पहुँच गए। सुषेण ने बूटी दी और लक्ष्मण जी उठ बैठे। श्रीराम ने हनुमान जी को गले से लगा लिया —
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई॥
श्री हनुमान चालीसा — गोस्वामी तुलसीदास
अर्थ:श्री रघुनाथ जी ने आपकी बहुत प्रशंसा की और कहा — तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो।
आगे जब अहिरावण श्रीराम और लक्ष्मण को पाताल ले गया, तब भी हनुमान जी ने ही उन्हें छुड़ाया। युद्ध में विजय के बाद सीता जी को सबसे पहले जीत का समाचार देने भी वही गए।
चिरंजीवी हनुमान और सालासर के बालाजी
अयोध्या में श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ। एक लोक-कथा कहती है कि सीता जी ने हनुमान जी को मोतियों की माला दी, और वे एक-एक मोती तोड़कर देखने लगे। किसी ने कारण पूछा तो बोले — “जिसमें मेरे राम नहीं, वह मेरे किस काम का?” और कहते हैं, उन्होंने अपना हृदय खोलकर दिखाया — उसमें श्रीराम और सीता जी विराजमान थे।
जब श्रीराम अपने धाम लौटने लगे, तो हनुमान जी ने साथ चलने के बजाय पृथ्वी पर रहना माँगा — “जब तक संसार में आपकी कथा कही जाएगी, तब तक मैं यहीं रहूँ और उसे सुनता रहूँ।” श्रीराम ने यह वरदान दिया। इसीलिए हनुमान जी चिरंजीवी हैं, और माना जाता है कि जहाँ भी राम-कथा होती है, वहाँ हनुमान जी किसी-न-किसी रूप में सुनने अवश्य आते हैं।
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥
प्रचलित पौराणिक श्लोक
अर्थ:अश्वत्थामा, राजा बलि, वेदव्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य और परशुराम — ये सातों चिरंजीवी (सदा जीवित रहने वाले) माने गए हैं।
यही भरोसा सालासर की आत्मा है। मान्यता है कि सच्चे मन से पुकारने वाले भक्त की बात बालाजी ज़रूर सुनते हैं — जैसे उन्होंने अपने परम भक्त मोहनदास जी महाराज की पुकार सुनी और असोटा के खेत से चलकर सालासर आ विराजे। आज भी दूर-दूर से भक्त यहाँ आते हैं — कोई मनोकामना लेकर नारियल बाँधता है, कोई धन्यवाद देने लौटता है।
बालाजी का संदेश वही है जो उनकी पूरी कथा का है: बल हो तो विनम्र रहो, बुद्धि हो तो सेवा में लगाओ, और हर काम को ‘राम-काज’ समझकर पूरे मन से करो।
यह कथा क्या सिखाती है
अपनी शक्ति पहचानिए। स्वयं हनुमान जी को भी जाम्बवंत की याद दिलाने की ज़रूरत पड़ी। कभी-कभी हमें भी कोई अपना चाहिए जो कहे — ‘तुम यह कर सकते हो।’ अपने बच्चों के लिए आप वही जाम्बवंत बनिए।
बल के साथ विनम्रता। समुद्र लाँघने वाले, लंका जलाने वाले, पर्वत उठाने वाले हनुमान जी ने कभी अहंकार नहीं किया — हर जीत का श्रेय श्रीराम को दिया।
जो काम हाथ में लिया, उसे पूरा कीजिए। ‘राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम’ — सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है।
कथा के बाद आरती
श्री हनुमान जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।
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