॥ साप्ताहिक व्रत ॥ संतोषी माता (और माता लक्ष्मी)

शुक्रवार व्रत (संतोषी माता)

संतोष, परिवार की सुख-शांति और मनोकामना-पूर्ति के लिए संतोषी माता का व्रत। गुड़-चने का प्रसाद, और पूरे दिन खटाई से परहेज़।

कब
हर शुक्रवार। संतोषी माता का व्रत प्रायः 16 शुक्रवार के संकल्प से रखा जाता है और 17वें शुक्रवार को उद्यापन होता है। कई परिवारों में शुक्रवार को माता लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है।
पूजनीय
संतोषी माता (और माता लक्ष्मी)
संबंधित ग्रह
शुक्र ग्रह

शुक्रवार व्रत (संतोषी माता) का महत्व

संतोषी माता का नाम ही उनका संदेश है: संतोष। कहा जाता है कि संतोष सबसे बड़ा धन है। जिस मन में संतोष है, वहाँ ईर्ष्या, लालच और कलह नहीं टिकते। लोक-मान्यता में संतोषी माता को भगवान श्री गणेश की पुत्री माना जाता है।

यह व्रत परिवार में सुख-शांति, पति-पत्नी के प्रेम, परदेस गए परिजनों की कुशलता, रोज़गार, घर के क्लेश के अंत और मनोकामना-पूर्ति के लिए किया जाता है। इस व्रत की सबसे बड़ी सुंदरता इसकी सरलता है। थोड़ा-सा गुड़ और चना, एक कलश जल और सच्चा मन, बस इतना ही चाहिए।

शुक्रवार शुक्र ग्रह का दिन भी है। शुक्र सुख-सुविधा, दांपत्य, प्रेम, सौंदर्य और कला के कारक माने जाते हैं। इसीलिए कई घरों में शुक्रवार को माता लक्ष्मी की पूजा की जाती है, ताकि घर में समृद्धि और मधुरता बनी रहे।

इस व्रत का सबसे प्रसिद्ध नियम है: उस दिन खटाई न खाना, न किसी को खिलाना। कथा में भी यही नियम टूटने पर कष्ट और फिर विधि से पालन करने पर सुख लौटने की बात आती है।

पूजा सामग्री

  • संतोषी माता का चित्र
  • जल से भरा कलश
  • गुड़ और भुने चने (कटोरी में)
  • लाल या पीले फूल
  • अक्षत, रोली, हल्दी
  • लाल चुनरी
  • घी का दीपक, धूप, कपूर
  • नारियल (वैकल्पिक)
  • चौकी और उस पर बिछाने का कपड़ा

व्रत और पूजा की विधि

  1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और घर को साफ़-सुथरा रखें।
  2. हाथ में जल-अक्षत लेकर 16 शुक्रवार (या जितने का संकल्प हो) व्रत का संकल्प लें।
  3. चौकी पर संतोषी माता का चित्र रखें। उसके पास जल से भरा कलश स्थापित करें और कलश पर गुड़-चने से भरी कटोरी रखें।
  4. माता को रोली-हल्दी का तिलक करें, फूल, अक्षत और चुनरी अर्पित करें। घी का दीपक और धूप जलाएँ।
  5. हाथ में थोड़ा गुड़-चना लेकर संतोषी माता की व्रत कथा पढ़ें या सुनें। घर के सदस्य भी साथ बैठें।
  6. कथा के बाद “जय संतोषी माता” बोलते हुए आरती करें।
  7. हाथ का गुड़-चना गाय को खिला दें। कलश के गुड़-चने का प्रसाद सबमें बाँटें।
  8. कलश का जल पूरे घर में छिड़कें और बचा हुआ जल तुलसी के पौधे में डाल दें।
  9. दिन में एक बार सात्त्विक भोजन करें। भोजन में कोई भी खट्टी चीज़ न हो।
  10. दिन भर मन में संतोष रखें। किसी से ईर्ष्या, शिकायत या कलह न करें।

नियम: क्या करें, क्या न करें

क्या खाएँ

  • गुड़-चने का प्रसाद
  • दिन में एक बार सात्त्विक भोजन (बिना खटाई के)
  • दूध, मीठे फल

क्या न खाएँ

  • हर तरह की खटाई: इमली, नींबू, कच्चा आम, अचार, खट्टा दही या छाछ, खट्टे फल
  • प्याज़, लहसुन, मांस, मदिरा

अन्य नियम

  • परंपरा में उस दिन घर के दूसरे सदस्य भी खटाई नहीं खाते और न किसी को खिलाते हैं।
  • घर में कलह न करें, मन में संतोष रखें।
  • परिवार के सदस्यों, विशेषकर घर की बहुओं और बेटियों के साथ प्रेम और सम्मान का व्यवहार करें। यही इस व्रत की कथा की असली सीख है।

मंत्र

देवी स्तुति

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके। शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

अर्थ:हे सब मंगलों में मंगलमयी, कल्याण करने वाली, सब कामनाएँ पूरी करने वाली, शरण देने वाली, तीन नेत्रों वाली गौरी नारायणी माता! आपको नमस्कार है। यह स्तुति माँ के हर रूप की वंदना है।

जप: पूजा के आरंभ और अंत में 1 या 3 बार

माला / बोलकर जाप
लक्ष्मी मंत्र

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः

अर्थ:‘श्रीं’ बीजाक्षर सहित माता महालक्ष्मी को नमस्कार।

जप: शुक्रवार को 1 माला (108 बार), स्फटिक या कमलगट्टे की माला से

माला / बोलकर जाप
शुक्र बीज मंत्र

ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

अर्थ:बीजाक्षरों सहित शुक्र देव को नमस्कार। यह शुक्र ग्रह की शांति का मंत्र है।

जप: रोज़ 1 माला; पूरा अनुष्ठान 16,000 जप, पंडित जी के मार्गदर्शन में

माला / बोलकर जाप
व्रत-कथा

संतोषी माता की व्रत कथा: छोटी बहू का धैर्य

एक बुढ़िया के सात बेटे थे। छह बेटे कमाते थे और सबसे छोटा बेटा कुछ नहीं कमाता था। बुढ़िया छह बेटों को प्रेम से भोजन कराती और सबसे छोटे बेटे को उनकी थालियों का बचा हुआ जूठा भोजन दे देती। भोले बेटे को यह बात पता नहीं थी।

एक दिन उसकी पत्नी ने उससे कहा, “तुम्हें जूठन खिलाई जाती है।” उसे विश्वास नहीं हुआ। अगली बार वह सिरदर्द का बहाना करके रसोई में लेट गया और छिपकर देखा। सचमुच, भाइयों का बचा हुआ भोजन ही उसकी थाली में परोसा गया। उसका मन टूट गया। उसने निश्चय किया कि वह परदेस जाकर कमाएगा और अपने पाँव पर खड़ा होगा।

जाने से पहले वह गौशाला में काम कर रही अपनी पत्नी से मिला। उसने निशानी के रूप में अपनी अंगूठी दी और कहा, “मैं परदेस जा रहा हूँ। भगवान ने चाहा तो कमाकर लौटूँगा।” पत्नी की आँखों में आँसू थे, पर उसने हिम्मत से विदा किया।

परदेस में उसे एक सेठ के यहाँ नौकरी मिल गई। उसकी ईमानदारी और मेहनत से सेठ बहुत प्रसन्न हुआ और कुछ समय में उसे अपने व्यापार में साझेदार बना लिया। वह धनवान हो गया, पर काम में ऐसा उलझा कि घर और पत्नी की सुध भूल गया।

उधर ससुराल में छोटी बहू के कष्ट बढ़ते गए। सास और जेठानियाँ उससे घर का सारा काम करवातीं, जंगल से लकड़ियाँ मँगवातीं, और खाने को भूसे की रोटी तथा पीने को नारियल के खोल में पानी देतीं। वह सब कुछ चुपचाप सहती रही।

एक दिन लकड़ियाँ लेने जाते समय उसने देखा कि कुछ स्त्रियाँ मिलकर संतोषी माता का व्रत कर रही हैं। उसने विनम्रता से पूछा, “बहनों, यह कौन-सा व्रत है और इससे क्या फल मिलता है?” स्त्रियों ने बताया, “यह संतोषी माता का व्रत है। इसमें शुक्रवार को थोड़ा गुड़ और चना लेकर, कलश रखकर कथा सुनते हैं। उस दिन खटाई न खाते हैं, न खिलाते हैं। 16 शुक्रवार के बाद उद्यापन करते हैं। माता की कृपा से दुख दूर होते हैं और मनोकामना पूरी होती है।”

छोटी बहू ने लकड़ियाँ बेचकर थोड़ा गुड़-चना खरीदा, माता के मंदिर में जाकर प्रार्थना की और श्रद्धा से व्रत शुरू कर दिया। कुछ ही शुक्रवार बीते थे कि परदेस से पति का पत्र आया, फिर पैसे भी आने लगे। जेठानियाँ ताने देने लगीं, पर बहू ने मंदिर जाकर माता से कहा, “माँ, मुझे पैसा नहीं चाहिए। मुझे अपना सुहाग चाहिए, मेरे पति घर लौट आएँ।”

माता प्रसन्न हुईं। उन्होंने परदेस में उसके पति को स्वप्न में दर्शन देकर कहा, “तेरी पत्नी बहुत कष्ट में है। घर लौट जा।” पति बोला, “माँ, सेठ का हिसाब-किताब और माल बाकी है, कैसे जाऊँ?” माता ने कहा, “सुबह स्नान करके दीपक जलाकर बैठ जाना, सब काम अपने आप बन जाएगा।” सचमुच अगले ही दिन सारा माल बिक गया, हिसाब पूरा हो गया और वह धन लेकर घर की ओर चल पड़ा।

उधर माता ने बहू को संकेत दिया, “तेरा पति आ रहा है। लकड़ियों के तीन गट्ठर बनाना: एक मंदिर के पास रखना, एक नदी किनारे, और एक सिर पर रखकर घर जाना। घर पहुँचकर ज़ोर से कहना, ‘लो सासूजी, लकड़ियों का गट्ठर लो, भूसे की रोटी दो, नारियल के खोल में पानी दो। आज मेहमान कौन आया है?’” बहू ने वैसा ही किया। उसी समय घर पहुँचे पति ने यह सब सुन लिया और माँ से पूछा। सच्चाई सामने आ गई। बेटे को बहुत दुख हुआ। वह पत्नी को लेकर अलग घर में रहने लगा और दोनों सुख से रहने लगे।

16 शुक्रवार पूरे हुए तो बहू ने उद्यापन की तैयारी की और जेठानियों के बच्चों को भोजन पर बुलाया। जेठानी ने ईर्ष्या में बच्चों को सिखा दिया कि भोजन के बाद खटाई माँगना। बच्चों ने खीर-पूरी खाकर खटाई माँगी। बहू ने मना किया तो उन्होंने पैसे माँगे, और भोली बहू ने पैसे दे दिए। बच्चे उन पैसों से इमली खरीदकर खा आए। इस तरह व्रत का नियम टूट गया और कुछ ही दिनों में बहू के पति पर एक झूठा आरोप लगा और राजा के सिपाही उसे पकड़ ले गए।

बहू दौड़ी-दौड़ी माता के मंदिर गई और रोकर क्षमा माँगी। माता ने कहा, “बेटी, उद्यापन में भूल हुई है। फिर से विधि से उद्यापन कर। इस बार बच्चों को पैसे नहीं, फल देना, और खटाई का ध्यान रखना।” बहू ने वैसा ही किया। उद्यापन पूरा होते ही पति निर्दोष सिद्ध होकर घर लौट आया। आगे चलकर उनके घर सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और घर में सदा सुख-शांति बनी रही।

कथा आती है कि जो भी इस व्रत को श्रद्धा और नियम से करता है, संतोषी माता उसके घर से क्लेश दूर करती हैं और उसकी मनोकामना पूरी करती हैं।

कथा का सार: धैर्य और संतोष हर कष्ट से पार लगा देते हैं। और घर की बहू-बेटी को कष्ट देने वाले घर में कभी सुख नहीं टिकता।

शुक्रवार को माता लक्ष्मी की सरल पूजा

जो लोग संतोषी माता का व्रत नहीं रखते, वे भी शुक्रवार को माता लक्ष्मी की सरल पूजा कर सकते हैं। यह घर में समृद्धि, मधुरता और स्वच्छता का संकल्प है।

  1. शाम को घर की अच्छी तरह सफ़ाई करें। मान्यता है कि लक्ष्मी स्वच्छ और शांत घर में वास करती हैं।
  2. पूजा-स्थान पर माता लक्ष्मी का चित्र रखें और घी का दीपक जलाएँ।
  3. कमल या लाल-गुलाबी फूल, अक्षत, रोली और इत्र अर्पित करें।
  4. सफ़ेद मिठाई, खीर या मिश्री का भोग लगाएँ।
  5. ‘ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः’ की एक माला जप करें।
  6. “ॐ जय लक्ष्मी माता” से आरती करें और प्रसाद बाँटें।
  7. घर की स्त्रियों का सम्मान करें और किसी कन्या या ज़रूरतमंद स्त्री को सफ़ेद मिठाई या वस्त्र दें।

उद्यापन

16 शुक्रवार पूरे होने पर 17वें शुक्रवार को उद्यापन किया जाता है। उस दिन संतोषी माता की विधिवत पूजा करें, कथा सुनें और आरती करें।

  • परंपरा के अनुसार आठ बालकों को प्रेम से भोजन कराया जाता है। भोजन में खीर, पूरी और चने की सब्ज़ी बनाई जाती है।
  • भोजन में और भोजन के बाद किसी को भी खटाई न दें।
  • दक्षिणा में बच्चों को पैसे न दें, बल्कि फल, मिठाई या कोई उपहार दें, ताकि वे उन पैसों से खटाई न खरीद लें। यह नियम कथा से ही आया है।
  • सामर्थ्य के अनुसार दान करें और विधि के लिए पंडित जी से सलाह ले सकते हैं।

सावधानी

यह व्रत सरल है, फिर भी बीमार, गर्भवती व स्तनपान कराने वाली माताएँ, बुज़ुर्ग और डायबिटीज़ या नियमित दवा वाले लोग फलाहार या एक समय सादे भोजन के साथ ही व्रत करें और डॉक्टर की सलाह लें। गुड़ की मात्रा का ध्यान डायबिटीज़ वाले लोग विशेष रूप से रखें। दवा कभी न छोड़ें।

पूजा के अंत में आरती

श्री लक्ष्मी जी की आरती, पूरे पाठ और PDF के साथ।

आरती पढ़ें

यह जानकारी शास्त्र और परंपरा पर आधारित है; ग्रंथ का नाम हर मंत्र के साथ लिखा है। कहीं कोई त्रुटि दिखे तो WhatsApp पर बताइए।